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राफेल विमान खरीद में स्थिति साफ करे सरकार

राजेश माहेश्वरी

गुजरात में चुनावी सरगर्मियां के साथ रक्षा सौदों के विवाद की आंच तेज हो रही| मोदी सरकार की फ्रेंच कंपनी राफेल से 36 लड़ाकू विमानों की खरीद के सौदे को कांग्रेस चुनाव में हथियार बना रही है| राफेल सौदा 2014 में सत्तारूढ़ हुई मोदी सरकार का ऐसा फैसला था, जिसमें 10 साल से चली आ रही खरीद प्रक्रिया को खारिज कर लिया गया| राफेल लड़ाकू विमान को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच जमकर नोक-झोंक हो रही है, जिसमें कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने इस सौदे को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला बोला| इस सौदे पर उंगली उठाने वालों में भाजपा के ही वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा भी शुमार हैं| उल्लेखनीय हैं कि ये डील 23 सितंबर, 2016 को फ्रांस के रक्षामंत्री ज्यां ईव द्रियां और भारत के तत्कालीन रक्षामंत्री मनोहर पर्रीकर ने नई दिल्ली में साइन की थी| भारत सरकार ने 59,000 करोड़ की फ्रांस से डील की थी| डील के मुताबिक,36 राफेल फाइटर जेट विमान मिलने हैं| पहला विमान सितंबर 2019 तक मिलने की उम्मीद है और बाकी के विमान बीच-बीच में 2022 तक मिलने की उम्मीद जताई जा रही है|कांग्रेस का आरोप है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने फ्रांस की कंपनी से 58,000 करोड़ (7|8 अरब यूरो) में 36 राफेल विमान खरीदने का समझौता किया है| यह पैसा टैक्स देने वाले लोगों का कमाई का है| पार्टी ने दो समझौतों की तुलना की| उसने आरोप लगाया कि वर्ष 2012 में यूपीए सरकार ने फ्रांस से एयरक्राफ्ट खरीदने के लिए जितने में समझौता किया था| उससे तीन गुना ज्यादा पैसा देकर मोदी सरकार एयरक्राफ्ट खरीद रही है| कांग्रेस के आरोप यहीं खत्म नहीं हुए| उसने आगे कहा कि सरकार सिर्फ एक इंड्रस्टियल ग्रुप रिलायंस डिफेंस लिमिटेड को फायदा पहुंचा रही है| इस कंपनी ने फ्रांस की डसाल्ट एवियेशन के साथ मिलकर 30 करोड़ रुपये का निवेश किया है ? कांग्रेस उपाध्यक्ष इस मामले को लेकर मोदी सरकार पर हमलावार मुद्रा में हैं| राहुल गांधी ने ट्वीट कर रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण से तीन सवाल पूछे हैं| राहुल ने पैरिस में राफेल खरीदने की पीएम मोदी की घोषणा पर भी तकनीकी सवाल उठाए हैं| राहुल के अलावा सीपीएम नेता सीताराम येचुरी ने भी राफेल डील पर रक्षा मंत्री को घेरा है| राहुल ने निर्मला सीतारमण पर तंज कसते हुए कहा कि यह कितना शर्मनाक है कि आपके बॉस आपको खामोश कर रहे हैं| राहुल ने रक्षा मंत्री से पूछा कि कृपया हमें हर राफेल विमान की फाइनल कीमत बताएं| दूसरा सवाल राहुल ने पीएम मोदी से जोड़कर पूछा| कांग्रेस उपाध्यक्ष ने पूछा कि क्या पीएम ने पैरिस में राफेल विमान खरीदने की घोषणा से पहले कैबिनेट कमिटी ऑफ सिक्यॉरिटी (सीसीएस) की अनुमति ली थी| राहुल का आरोप है कि एक व्यवसायी को लाभ पहुंचाने के लिए पूरे सौदे में कथित बदलाव किये गए| इसके जवाब में किसी सरकारी प्रवक्ता की जगह एयर चीफ मार्शल वीरेंद्र सिंह धनोआ और अनिल अंबानी की ओर से सफाई पेश की जा रही है| धनोआ कह रहे हैं कि यह डील उचित कीमत पर हुई डील में विवाद जैसा कुछ नहीं है| वहीं, बीजेपी ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआइपी हेलीकॉप्टर घोटाले में संभावित पूछताछ के डर से कांग्रेस लोगों का ध्यान भटकाना चाहती है| दरअसल, राफेल सौदे को पूर्ववर्ती यूपीए सरकार ने मंजूरी दी थी, जिसमें भारत को 16 क्राफ्ट बने बनाए खरीदने थे और बाकी विमान बनाने के लिए कंपनी को वह तकनीक भारत को देनी थी| ये विमान भारत सरकार के उपक्रम हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी एचएएल द्वारा बनाए जाने थे, लेकिन यह उस वक्त अटक गया, जब फ्रांसीसी कंपनी दसॉल्ट एविएशन ने उन विमानों को प्रमाणित करने से मना कर दिया, जिसका निर्माण हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड द्वारा भारत में किया जाना था| कांग्रेस का आरोप है कि प्रधानमंत्री मोदी ने सत्ता में आने के बाद बने हुए विमानों की संख्या 36 कर दी, जबकि शेष विमान बनाने की जिम्मेदारी एचएएल से लेकर एक निजी कंपनी रिलायंस डिफेंस लिमिटेड को दे दी, जिसके मालिक अनिल अंबानी हैं| पार्टी ने इस मामले में फ्रांसीसी कंपनी के भारतीय पार्टनर के तौर पर रिलायंस डिफेंस को गलत तरीके से चुनने का आरोप लगाया और कहा कि इस पूरी प्रक्रिया में देश के खजाने का जबरदस्त नुकसान हुआ| यूपीए सरकार ने जहां यह सौदा 10|2 अरब डॉलर में किया था, वहीं अब इस सौदे के लिए देश को कुल 30|45 अरब डॉलर देने होंगे| फ्रांसीसी अधिकारियों ने हालांकि इस मामले में कांग्रेस के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है| फ्रांसीसी दूतावास के सूत्रों ने कहा कि पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता का पालन किया गया| इस संबंध में कई तरह की अफवाहें हैं, पर हम लोगों से तथ्यों पर ध्यान देने की अपील करते हैं| उन्होंने यह भी कहा कि इस करार से भारत में रक्षा उत्पादन उद्योग का विकास होगा| वहीं अनिल अंबानी के नेतृत्व वाली रिलायंस डिफेंस लिमिटेड ने कांग्रेस से अपने आरोप वापस लेने को कहा| कंपनी ने कहा कि यदि पार्टी अपने आरोप वापस नहीं लेती है तो वह उस पर मुकदमा करेगी| इस बीच वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल बी एस धनोआ ने भी कहा है कि इसके लिए ज्यादा कीमत नहीं दी गई है| हमने अनुबंध से भी कम दाम पर 36 फ्रेंच लड़ाकू विमान राफेल के लिए मोलभाव किया| सरकार ने सौदे में बहुत अच्छा मोलभाव किया| दरअसल, प्रधानमंत्री मोदी ने फ्रांस की अपनी यात्रा से ठीक पहले अचानक घोषणा की कि भारत 126 के बजाय सिर्फ 36 विमान खरीद पाएगा| कंपनी के मूल भारतीय सहयोगी एचएएल को जंक कर दिया गया था और अनिल अंबानी कंपनी को सौंप दिया गया| सर्वविदित है कि मोदी सरकार ने एक समझौता किया है जो यूपीए सरकार द्वारा की गई बातचीत के मुकाबले ज्यादा महंगा है| दूसरी ओर अनिल अंबानी के स्वामित्व वाली रिलायंस कंपनी ने भी सफाई दी है कि उसकी सहायक कंपनी दसाल्ट रिलायंस एयरोस्पेस एक संयुक्त उद्यम है| ये दोनों निजी कंपनी के द्विपक्षीय समझौते के बाद गठित हुई| इसमें भारत सरकार की कोई भूमिका नहीं है| कंपनी का यह भी कहना है कि सरकार की 24 जून, 2016 की नीति के तहत रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी निर्माण के तहत 49 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को बिना पूर्व अनुमति के मंजूरी दी जाएगी| बोफोर्स से लेकर तमाम रक्षा सौदों को राजनीतिक हवा देने वाली भाजपा को अपने कार्यकाल में रक्षा सौदों के तौर-तरीकों, खासकर पारदर्शिता पर जरूर गौर करना चाहिए| भारत में रक्षा सौदों में रिश्वतखोरी व एजेंट की संदिग्ध भूमिका और इससे उपजे राजनीतिक विवाद काफी पुरानी समस्या है| 2013 में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल पर इटली की चॉपर कंपनी अगस्ता वेस्टलैंड से कमीशन लेने के आरोप लगे थे| अगस्ता वेस्टलैंड से भारत को 36 अरब रुपए के सौदे के तहत 12 हेलिकॉप्टर खरीदने थे| इतालवी कोर्ट में रखे गए 15 मार्च 2008 के एक नोट में इशारा किया गया था कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया इस वीआईपी चॉपर खरीद के पीछे अहम भूमिका निभा रही थीं| बोफोर्स तोप से लेकर ताबूत घोटाले और हालिया अगस्ता-वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर खरीद से जुड़े विवाद तक इसके तमाम उदाहरण हैं| मोदी सरकार ने नई रक्षा खरीद नीति में एजेंट की मान्यता के साथ उम्मीद की जा रही थी है कि रक्षा सौदों में पारदर्शिता बढ़ेगी और इनसे जुड़े राजनीतिक विवादों का सिलसिला रुकेगा| लेकिन जिस तरह राफेल विमान खरीद को लेकर सवाल उठ रहे हैं उससे चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है| मोदी सरकार का अब तक का कार्यकाल पाक-साफ है| राफेल सौदे में कांग्रेस के सवाल उठाने से मोदी सरकार की कार्यशैली पर सवालिया निशान लगा है| राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए यही बेहतर होगा कि रक्षा सौदों में पारदर्शिता अपनाई भी जाए और दिखे भी| सरकार को चाहिए कि जितनी जल्दी इस मामले में स्थिति स्पष्ट करे| इससे पहले कि एक और रक्षा सौदा आरोप-प्रत्यारोपों के काले कोहरे में घिर जाए, सरकार को चाहिए कि जल्दी ही इस मामले में दूध का दूध और पानी का पानी साफ कर दे|

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-लेखक राज्य मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं|

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