Wednesday , April 25 2018
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युवा ही बदलेंगे कश्मीर की हवा

संतोष कुमार भार्गव

जम्मू-कश्मीर आतंकवाद के चलते दशकों से जब-तब सुर्खियों में रहता आया है| लेकिन बीते दिनों एक ऐसी घटना हुई, जो गुमराह होकर आतंकवादी संगठनों की गिरफ्त या प्रभाव में आ चुके युवकों को नई राह दिखा सकती है| कुछ दिन पहले लश्कर-ए-तैयबा में शामिल हुए कॉलेज छात्र और फुटबॉलर अरशिद माजिद खान ने सुरक्षा बलों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया| यों तो अफवाह उड़ाने और तनाव फैलाने में सोशल मीडिया की भूमिका किसी से छिपी नहीं है, पर इस मामले में उसका एक बहुत सकारात्मक इस्तेमाल देखने में आया| सोशल मीडिया पर अपनी मां और पिता की घर लौटने की अपील वाला वीडियो देखने के बाद बीस वर्षीय अरशिद ने आधी रात को सेना के शिविर में पहुंचकर आत्मसमर्पण कर दिया| सामान्य जीवन में अपने इकलौते बेटे की वापसी से माता-पिता को कितनी खुशी हुई होगी, सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है| अरशिद और उसके परिवार की जिंदगी तबाह होने से बच गई यह संतोष का विषय तो है ही, इस वाकये ने यह भी दिखाया है कि जम्मू-कश्मीर में स्थायी शांति का एक शांतिपूर्ण रास्ता भी हो सकता है| यह भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं कि अरशिद के आत्मसमर्पण की सराहना करते हुए सेना ने मुख्यधारा में उसकी सुगम वापसी का भरोसा दिलाया है| दक्षिण कश्मीर में मानवीय स्पर्श के साथ लोगों से संपर्क बनाने में जुटे मेजर जनरल बीएस राजू ने कहा है कि अरशिद पर कोई आरोप नहीं लगाया जाएगा, उसे अपने करियर और अपनी खेल-प्रतिभा को निखारने का पूरा मौका दिया जाएगा| यह आश्वासन कीमती है, क्योंकि एक बार हिंसा का रास्ता पकड़ लेने के बाद वापसी आसान नहीं होती| गुमराह हुए युवक को लगता है कि वह लौट भी आए, तो पुलिस या सुरक्षा बल उसे जीने नहीं देंगे| बीएस राजू ने यह भी कहा है कि आतंकवाद से जुड़ने के बाद भले ही कुछ युवाओं ने छोटे-मोटे अपराध किए हों, मैं उन्हें आश्वस्त करता हूं कि उनके प्रति नरम रुख रखा जाएगा| जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भी अरशिद की वापसी पर खुशी जताई है| दूसरी तरफ लश्कर-ए-तैयबा ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा है कि अरशिद की मां के अनुरोध को देखते हुए उसे जाने दिया गया| अगर मान लें कि लश्कर का दावा सही है, यानी आत्मसमर्पण करने के अरशिद के फैसले की जानकारी उसे थी, फिर भी उसने न अड़ंगा लगाया न कोई खतरा पैदा किया, तब भी कई सवाल उठते हैं| बाकी उन मांओं की फिक्र लश्कर को क्यों नहीं है, जिनके बच्चों को वह आतंकवाद का प्रशिक्षण देकर मरने के लिए छोड़ देता है? आखिर दूसरे किशोर या युवक भी अपने माता-पिता की रजामंदी से तो लश्कर में शामिल नहीं हुए होंगे! उनके परिवार भी रोये-बिलखे होंगे, उनके लौट आने की दुआ करते होंगे, और अगर वे सचमुच किसी दिन लौट आएं, तो उन्हें बेहद खुशी होगी| बहरहाल, लश्कर से उनके मुक्त हो पाने की उम्मीद करना, लश्कर के इतिहास को देखते हुए, बेकार है| पर हमें सोचना होगा कि घाटी के लोगों का भरोसा कैसे जीता जाए| इस साल के स्वाधीनता दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री ने कहा था कि कश्मीर समस्या का हल न गोली से निकलेगा न गाली से, हल निकलेगा कश्मीरियों को गले लगाने से| विडंबना यह है कि उनकी पार्टी के ही बहुत-से लोग इससे विपरीत भाषा बोलते रहे हैं| केंद्र सरकार घाटी के हालात सामान्य करने की दिशा में तेजी से दीर्घगामी ठोस उपायों की दिशा में काम कर रही है| कुछ दिन पहले कश्मीर में एक संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में एक अधिकारी ने कहा था कि जो युवा आतंकी संगठनों में शामिल हैं, वे वापस मुख्यधारा में शामिल हो सकते हैं| सेना द्वारा उन्हें परेशान नहीं किया जाएगा| यदि कश्मीर के भटके हुए बाकी युवा भी उस रास्ते को छोड़ दें, तो आतंक पर यह एक जोरदार प्रहार होगा तथा कश्मीर में शांति स्थापित हो सकेगी| दूसरी ओर सेना द्वारा चलाए जा रहे मिशन ऑलआउट में कई खूंखार आतंकियों को मारा जा चुका है| इन आतंकियों में बहुत से कश्मीर तथा कश्मीर के बाहर से आए हुए थे| अब तक सेना द्वारा करीब दो सौ आतंकियों को मारा जा चुका है| इस अभियान को और तेज करने की जरूरत है| पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकियों के अलावा पिछले एक वर्ष में 88 स्थानीय युवा आतंकी समूहों में शामिल हुए हैं| ऐसे में जरूरी है कि अलगाववाद तथा पाकिस्तान समर्थित जारी आतंकवाद से निपटने की रणनीति में युवाओं को मुख्यधारा में लाने का प्रयास भी महत्वपूर्ण हो| निश्चित ही यह कार्य सुरक्षाबलों की कार्रवाई के जरिये नहीं किया जा सकता है| इसके लिए घाटी के लोगों में सरकार और उसकी पहलों के प्रति विश्वास बढ़ाने की जरूरत है| मां की भावनात्मक अपील से प्रभावित होकर फुटबॉल खिलाड़ी से आतंकियों के गिरोह में शामिल हुए माजिद खान के समर्पण की घटना शांति प्रयासों के लिए बड़ी उम्मीद है| पत्थरबाजी के लिए आरोपित युवाओं पर से मामले हटाने जैसी पहलों से कश्मीरी परिवारों को भी सुकून मिलेगा| सामूहिक डर से परेशान समुदाय उकसावे का आसान शिकार हो जाते हैं और उन्हें हिंसक रास्ता अपनाने से भी भय नहीं लगता है| कश्मीर इसी त्रासदी को भोग रहा है, जहां हिंसा-प्रतिहिंसा के लंबे दौर ने शांति और विकास की संभावनाओं को कुंद कर दिया है| पाकिस्तान ने हाफिज सईद जैसे आतंकी को रिहाई देकर तथा मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय पाबंदी से बचाकर फिर यह संकेत दिया है कि वह भारत को परेशान करने की अपनी पुरानी नीति से बाज नहीं आयेगा| प्रधानमंत्री द्वारा लाल किले की प्राचीर से दिये गये ‘गले लगाने के संदेश’और वार्ताकार शर्मा द्वारा सकारात्मक माहौल तैयार करने के लिए किये जा रहे प्रयासों से गतिरोध खत्म करने की उम्मीद जगी है| यह जरूर है कि आतंकवाद के प्रति कठोर रवैया रखा जाना चाहिए, लेकिन आम नागरिकों के साथ लगाव तभी बन सकता है, जब हम उन्हें यह भरोसा दिलायें कि आजादी के नाम पर हिंसा और अराजकता से कुछ नहीं मिलनेवाला है तथा शासन-प्रशासन के स्तर पर उनकी रोजमर्रा के जीवन को अच्छा बनाने के लिए सरकार प्रतिबद्ध है| घाटी के युवाओं को भी आंतकी संगठनों के मंसूबों को समझना होगा| आंतकी संगठन भोले-भाले नौजवानों को कट्टरता की तालीम देकर अपनी दहशतगर्दी को मजहब की खिदमत बताते हैं और नौजवान इनके गुमराहियों के शिकार होकर गुनाहगार बन बैठते हैं| चलो अगर यह आतंकवादी गैर इस्लाम वालों को खुद का दुश्मन बताते हैं, तो उन बहकने वाले नौजवानों को जानना चाहिए कि ये सिर्फ गैर इस्लाम के दुश्मन नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत और खुद अपने मजहब के भी दुश्मन हैं| वरना ये मिस्र के मस्जिद पर हमला क्यों करते? पाकिस्तान की दरगाह पर हमला क्यों करते? यह न तो मजहब जानते हैं, न ही इंसानियत| इनकी फितरत सिर्फ खूनखराबा है| एक कश्मीरी युवा जेहादी रास्तों को छोड़कर मुख्यधारा से जुड़ रहा है| आशा है कि इसके आने वाले समय में दूरगामी परिणाम होंगे| जो कश्मीरी युवा आज जेहाद की राह पर निकल चुके हैं, वे चाहें तो इस मामले से प्रेरणा ले सकते हैं| जेहादी कांटे निकल जाने से कश्मीर एक बार फिर धरती का स्वर्ग बन जाएगा| इसके लिए राज्य व केंद्र सरकार को मिलकर कोई ठोस रणनीति बनानी होगी| केंद्र सरकार ने आतंकियों को समाप्त करने के लिए जो आपरेशन ऑलआउट चलाया है, उसके सकारात्मक परिणाम सामने आने लगे हैं| इसी का नतीजा है कि घाटी में आतंकी वारदातें काफी हद तक कम हुई हैं और अब तक कई खूंखार आतंकी मारे जा चुके हैं| उसी प्रकार समर्पण करने वाले आतंकियों को मुख्यधारा में जोड़ने की नीति बनानी होगी| जम्मू-कश्मीर की सरकार को चाहिए कि इन गुमराह युवाओं के लिए एक ठोस नीति बनाए, ताकि आतंकियों को मुख्यधारा में जोड़ा जा सके| अगर इस दिशा में किए जाने वाले ये प्रयास सफल होते हैं, तो घाटी में आतंक को ज्यादा बढ़ावा नहीं मिलेगा तथा वहां फिर से शांति स्थापित हो पाएगी| युवा ही परिवर्तन का कारण बनते हैं| आशा की जानी चाहिए कि घाटी के भटके युवा शीघ्र ही मुख्यधारा में शामिल होंगे|

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-मान्यताप्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं|

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