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बड़ी खबर: उत्तराखंड में हर माह औसतन तीन हाथियों की मौत

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चिंता का बड़ा कारण ये कि यदि गजराज की मौत का सिलसिला इसी तरह चलता रहा तो यहां हाथियों का लिंगानुपात गड़बड़ाते देर नहीं लगेगी. इस सालतब तक मरे हाथियों में 17 नर थे. प्रदेश में हाथियों का लिंगानुपात एक नर पर चार मादाओं का है.

बाघों की लगातार मौत ने तो पेशानी पर बल डाले ही हुए थे, अब हाथियों की भी एक के बाद एक मौत की घटनाओं ने चिंता  बढ़ा दी है. विभागीय आंकड़ों को ही देखें तो 2001 से अब तक 355 हाथियों की जान गई है. इनमें 129 मादा 218 नर शामिल हैं, जबकि आठ हाथियों के कंकाल बरामद हुए. इस वर्ष के वक्फे में सर्वाधिक 32 हाथियों की मौत हुई.

सूरतेहाल सवाल उठ रहा कि राज्य में राजाजी  कार्बेट टाइगर रिजर्व के साथ ही 11 वन प्रभागों में 6643.5 वर्ग किमी में पसरे हाथियों की पनाहगाह में ऐसा क्या हो गया, जो इनकी एक के बाद एक मौत हो रही है. चिंता की बड़ी वजह ये भी है कि मृत हाथियों में 17 नर  15 मादा हैं. इनमें से सात की जान हादसों में गई, जबकि एक की करंट से. दो हाथी टे्रन से कटकर मरे, जबकि चार की मौत की वजह आपसी प्रयत्न बताया गया. स्वाभाविक  अन्य कारणों से भी हाथियों की मौत हुई.

इस सबके मद्देनजर महकमा अब गजराज की सुरक्षा को लेकर अधिक सतर्कता बरतने जा रहा है. प्रमुख वन संरक्षक वन्यजीव एवं मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक डीवीएस खाती के मुताबिक हाथियों की सुरक्षा के मद्देनजर दोनों टाइगर रिजर्व  वन प्रभागों के जंगल से लगे इलाकों में अधिक सतर्कता बरतने को बोला गया है. उन इलाकों पर विशेष निगाह रखने के आदेश दिए गए हैं, जिनसे अक्सर गजराज गुजरते हैं. वहां वनकर्मियों की नियमित गश्त के आदेशदिए गए हैं. साथ ही इसकी मॉनीटरिंग भी प्रारंभ कर दी गई है.

राज्य में हाथी

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गणना वर्ष————संख्या

2017———–1839

2015———–1779

2012———–1559

2008———–1346

2005———–1510

2003———–1582

17 वर्ष में मृत हाथी

वर्षवार मौत का आंकड़ा

वर्ष————-संख्या

2017———–32

2016———–29

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2015———–19

2014———–29

2013———–27

2012———–07

2011———–25

2010———–10

2009———–23

2008———–26

2007———–14

2006———–16

2005———–19

2004———–16

2003———–15

2002———–24

2001———–24

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