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सेना-नागरिक आमने-सामने

बीते कुछ बरसों में राजनीति ने ऐसा माहौल बना दिया है कि एक ओर सैनिकों की वाहवाही होती है, दूसरी ओर उन्हें मौत के मुंह में धकेला जा रहा है| एक ओर उनके बलिदान के किस्से सुनाए जाते हैं, दूसरी ओर उन्हें सुविधाओं के लिए तरसना पड़ रहा है| अपनी मांगों के लिए प्रदर्शन करना पड़ता है और सच्चाई उजागर करने पर दंडित भी होना पड़ता है| जय जवान, जय किसान का नारा जिस देश में बुलंद किया जाता रहा हो, वहां सेना और जनता एक-दूसरे के आमने-सामने क्यों आ गए? आखिर राजनीति का यह कैसा दांव है कि सेना और जनता दोनों को शक के कटघरे में खड़ा होना पड़ा है? ये सवाल जम्मू-कश्मीर के शोपियां में पिछले हफ्ते घटी घटना से उठ रहे हैं| दरअसल पिछले हफ्ते सेना के 30 ट्रकों का काफिला दक्षिण कश्मीर के शोपियां जिले से होकर गुजर रहा था| 10 राइफल्स के सैनिकों का काफिला मूवमेंट के लिए बालपुरा से निकला था| इस बात की जानकारी पर 200 पत्थरबाज इकट्ठा हो गए| और सेना के काफिले से अलग हुए जवानों को पत्थरबाजों ने घेर लिया| हालात को काबू करने के लिए जवानों ने हवा में फायरिंग की थी, लेकिन पत्थरबाजों के समीप आने पर आत्मरक्षा में जवानों ने गोली चला दी और तीन लोग मारे गए| इस घटना पर राज्य पुलिस ने सेना के मेजर और जवानों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई, जिसके बाद सेना ने भी एक काउंटर एफआईआर दर्ज कराई है| अब इस पर राजनीति शुरु हो गई है| प्रधानमंत्री तो बड़े और संवेदनशील मुद्दों पर चुप ही रहते हैं| रक्षा मंत्री भी अब तक चुप हैं| लेकिन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने एक चैनल को दिए साक्षात्कार में कहा कि हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वातावरण अनुकूल हो और तनाव में वृद्धि न करें| हालांकि उन्होंने स्वीकार किया कि पूरे टकराव ने बहुत मुश्किल स्थिति बनाई है| उन्होंने जोर देकर कहा कि जब जम्मू और कश्मीर में आतंकवादी हमले होते हैं और लोगों को निशाना बनाया जाता है, तो सेना उनको बचाती है| उन्होंने कहा कि केंद्र, राज्य सरकार, और मीडिया, सभी की यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है कि सेना और लोगों के बीच संघर्ष नहीं हो|

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अब यह देखने वाली बात है कि वित्त मंत्री ने जो कहा, उससे उनकी सरकार कितना इत्तेफाक रखती है| वैसे इस बात में कोई दो राय नहींहै कि सेना ने आम जनता की रक्षा का जिम्मा बीते 70 बरसों में बखूबी निभाया है| जनता ने भी सेना के इस जज्बे का, उसकी बहादुरी, उसकी शहादत का हमेशा सम्मान किया है| जिन राज्यों में अफ्स्पा है, वहां से जरूर कई बार सेना की कुछ ज्यादतियों के प्रकरण हुए, मानवाधिकार हनन पर आवाजें उठीं, सैन्य बल के बेजा इस्तेमाल का विरोध हुआ| इन सबके बावजूद देश भर में सेना और सैनिकों के लिए प्रशंसा और आदर का भाव बना ही रहा| लेकिन बीते कुछ बरसों में राजनीति ने ऐसा माहौल बना दिया है कि एक ओर सैनिकों की वाहवाही होती है, दूसरी ओर उन्हें मौत के मुंह में धकेला जा रहा है| एक ओर उनके बलिदान के किस्से सुनाए जाते हैं, दूसरी ओर उन्हें सुविधाओं के लिए तरसना पड़ रहा है| अपनी मांगों के लिए प्रदर्शन करना पड़ता है और सच्चाई उजागर करने पर दंडित भी होना पड़ता है| पिछले साल नौ जनवरी को बीएसफ जवान तेज बहादुर यादव ने जम्मू में सीमा रेखा पर तैनाती के दौरान खराब खाना मिलने का आरोप लगाते हुए सोशल मीडिया पर एक वीडियो पोस्ट किया था| सीएजी की एक रिपोर्ट पिछले साल 21 जुलाई को संसद में पेश की गई थी| जिसमें भारतीय सेना और सुरक्षा तैयारियों पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई थी| भारतीय सेना लड़ाकू विमान, राइफल्स, हथियार, बुलेट-प्रूफ जैकेट्स,  मिसाइल्स, हेलिकॉप्टर्स और युद्धपोतों की कमी की गहरी समस्या से जूझ रही है| मोदी सरकार के साढ़े तीन सालों के कार्यकाल में जम्मू-कश्मीर में आतंकी घटनाएं भी बढ़ी और 2 सौ से ज्यादा सैनिकों की मौत भी हुई| पिछले महीने ही संसद में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री ने बताया कि जनवरी, 2017 से 14 दिसंबर तक जम्मू-कश्मीर में हुई 337 आतंकी घटनाओं में कुल 318 लोगों की मौत हुई| इस दौरान जम्मू-कश्मीर पुलिस और सेना के 75 जवान शहीद हुए, जबकि आतंकी हमले के दौरान 40 आम नागरिकों की भी जान गई| जान चाहे आम नागरिककी जाए, या सैनिक की, होते सभी इंसान ही है| इसलिए चिंता का विषय यह होना चाहिए कि इन बेजा मौतों को कैसे रोका जाए? पर इस चिंता में राजनीतिक हित गुम हो जाएंगे| इसलिए सेना और नागरिकों को ही आमने-सामने किया जा रहा है| कश्मीर में पत्थरबाजों का एक नया खौफ खड़ा कर दिया गया है| इनके बारे में बातें इस तरह होती हैं मानो ये दूसरे ग्रह से आए प्राणी हैं, जो धरती का सुख-चैन छीन रहे हैं| राजनेता यह क्यों नहींसोचते कि आखिर उनकी कौन सी नीतियों ने कश्मीरी युवाओं के हाथों में पत्थर थमा दिए| इन लोगों में किस बात की नाराजगी है, जो ये सुरक्षाबलों पर ही पत्थर फेंकते हैं और बदले में गोली खाने तैयार रहते हैं| मोदी सरकार के कार्यकाल में कश्मीर समस्या सुलझने की जगह और उलझ चुकी है| यहां के हालात न सैनिकों के लिए अच्छे हैं, न जनता के लिए| और दोनों के मन में एक-दूसरे के लिए संदेह खड़ा कर दिया गया है| सैनिकों पर पत्थर फेंकना गलत है और उतनी ही गलत यह बात भी है कि सेना किसी को मानव ढाल की तरह इस्तेमाल करे या पत्थर का जवाब गोली से दे|

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