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महिला आरक्षण विधेयक- लम्बी छुट्टी में…

प्रभाकर चैबे

बजट सत्र के अपने सम्बोधन में राष्ट्रपति जी महिला आरक्षण विधेयक पर कुछ बोलेंगे, ऐसी उम्मीद थी| लेकिन वे कुछ बोले नहीं| यह विधेयक किस खाने में ठूंसकर रख दिया गया है, यह तक पता नहीं| राष्ट्रपति जी ने महिला सशक्तिकरण की बात की- कहा कि मेरी सरकार महिला तुष्टिकरण की नीति पर नहीं चलती, वह महिला सशक्तिकरण पर विश्वास करती है| इस संदर्भ में तीन तलाक के खिलाफ बनाए जा रहे कानून का उदाहरण दिया| सवाल उठता है कि क्या महिला आरक्षण विधेयक महिला तुष्टिकरण है या महिला सशक्तिकरण है| राष्ट्रपति जी ने महिला आरक्षण विधेयक की बात क्यों नहीं की, यह रहस्य है और श्यह रहस्य जाने कोऊ-कोऊ||||  हमारी आज की राजनीति के लिए महिला आरक्षण विधेयक सत्यनारायण की कथा में पहनी जाने वाली धोती की तरह हो गई है- कथा के समय निकालो, पहनों और फिर सेंतकर रख दो| आगे जब कभी कुछ कबूलेंगे तो फिर सत्यनारायण की कथा कहलाएंगे तब धोती निकालेंगे| महिला आरक्षण विधेयक और राम मंदिर निर्माण का वायदा एक-सा नहीं है| राम मंदिर निर्माण की कसम वोट दिलाती है| महिला आरक्षण विधेयक इतना शक्तिशाली व जन लुभावन नहीं है| राष्ट्रपति जी ने अपने उद्बोधन में इस पर कुछ नहीं कहा जबकि भाजपा और कांग्रेस दोनों बड़े दल महिला आरक्षण विधेयक के समर्थक हैं| महिला आरक्षण विधेयक का समर्थन दोनों दल करते हैं| महिला फेडरेशन की सीपीएम की नेता के नेतृत्व में तमाम राजनीतिक दलों की महिलाओं ने महिला विधेयक पास कराने के समर्थन में आंदोलन किया| अब भाजपा सत्ता में है, पूर्ण बहुमत में हैं तब महिला आरक्षण विधेयक पर एकदम मौन हैं, ओंठ सी लिए हैं| कांग्रेस भी कोई आवाज नहीं उठा रही| महिला आरक्षण विधेयक की याद हो आई, एक समय यह मीडिया में छाया रहनेवाला समाचार हुआ करता था- अब मीडिया भी भूल गया- मीडिया का एक वर्ग तो जय-जय में लग गया है| महिला आरक्षण विधेयक पास क्यों नहीं हुआ, यह सवाल अपनी जगह अब दूसरा खड़ा हो गया है कि इसकी चर्चा अचानक बंद क्यों हो गई? क्या इस विधेयक को श्नगर निकाला दे दिया गया है- राजनीतिक दलों की बस्ती उनके सरोकार से बाहर कर दिया गया है| भाजपा और कांग्रेस दोनों इसके प्रति कटिबद्ध रहे, कुछ छोटे-क्षेत्रीय दलों ने जरूर विरोध किया था|

पूर्व में कांग्रेस व भाजपा दोनों दल यह दलील दुहराते रहे हैं कि महिला आरक्षण विधेयक जोर जबरदस्ती से या केवल बहुमत के आधार पर नहीं लाया जाएगा और न ही इस तरीके से पारित कराया जाएगा| दोनों दल अन्य दलों के साथ आम राय बनाने की बात करते रहे| कहते इस पर आम राय बनाने की कोशिश की जा रही है| यह बहानेबाजी है- उनसे पूछा जाए कि वे गम्भीर हैं अथवा नहीं| कुछ दल महिला आरक्षण विधेयक चाहते रहे हैं तो कुछ दल उसे इसी रूप में पारित करने के पक्षधर हैं| आम राय की बात करना महिला विधेयक को टालना है| इस पर इस तरह की कोई आम राय नहीं बन सकती- कुछ दल तो महिलाओं को तैंतीस प्रतिशत आ्रक्षण देने के  ही खिलाफ हैं| अतः भाजपा को अब क्योंकि वह पूर्ण बहुमत में है अपनी राजनीतिक इच्छा शक्ति का परिचय देना होगा, कांग्रेस तो साथ है ही अतरू उसे अब महिला आरक्षण विधेयक पारित करा लेना चाहिए| महिला आरक्षण विधेयक पेश करने में ही रोड़े अटकाए जाते रहे हैं- विधेयक की प्रतियां फाड़ी जाती रहीं हैं| जितना वक्त इस विधेयक को लाने में लग गया उससे कम वक्त में तो देश का संविधान पास कर दिया गया था| भाजपा को अब पहल करनी चाहिए| लगता है राजनीतिक दल केवल दिखावा कर रहे हैं| वास्तव में महिलाओं को आरक्षण मिले यह नहीं चाहते| महिला को राष्ट्रपति बना देना, प्रधानमंत्री बना देना पंचायतों में आरक्षण की व्यवस्था कर देना ही महिला आरक्षण की मूलभावना को पूरा करने वाले कदम नहीं हैं| महिलाओं की नीति बनाने वाली संस्था में तैंतीस प्रतिशत स्थान मिले, यह हो| यह होने नहीं दे रही यह पुरुषवादी व्यवस्था,  पुरुषवादी राजनीति करनेवालों का दोहरा चरित्र सामने आ रहा है| जो विधेयक के वर्तमान स्वरूप में रद्दोबदल चाहते हैं वे इसे टालना चाहते हैं और जो चाहते हैं कि महिला आरक्षण विधेयक पारित हो वे मन से नहीं चाहते|||| उनके शरीर पर चिपकी राख को जरा कुरेदा जाए तो सामने आएगा- महिला आरक्षण विधेयक का विरोध|||| महिलाएं 33 प्रतिशत आरक्षण मांग रही हैं- पुरुषों से| मतलब उन्हें 33 प्रतिशत आरक्षण देना पुरुषों की मर्जी पर है जैसे श्ये साड़ी खरीद लूं|||| पूछती है, उसी तरह कह रही है कि 33 प्रतिशत आरक्षण दे दो| पुरुष कभी नहीं देंगे| देंगे ही नहीं| इसी तरह समय कटेगा, कटते चलेगा और एक समय आएगा कि महिला आरक्षण ही भुला दिया गया होगा-अन्य विषयों पर गहन मंथन शुरू करा दिया जाएगा|  वंचितों में भी वंचित स्त्री है| वह आज भी मांगने की स्थिति में ही रखी गई है| महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण के सवाल पर सपा नेता मुलायम सिंह यादव ने उन दिनों जो तर्क रखे वे आज तक गूंज रहे हैं और उसी समय लग गया था कि महिला आरक्षण विधेयक पारित नहीं होने दिया जाएगा| मुलायम सिंह जी ने कहा था कि महिलाओं को आरक्षण देना सदन या राजनीति को ही नेतृत्वहीन कर देना है| इसका क्या अर्थ- क्या यह कि नेतृत्व क्षमता केवल पुरुष में होती है|

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यह घोर पुरुषवादी नजरिया है जो स्त्री को पीछे ही रखना चाहता है- अनुगामिनी बनी रहे- पुरुष के बताए- बनाए रास्ते पर ही चले| उन दिनों एक ऐसा भी तर्क दिया जाता रहा कि महिलाओं को आरक्षण देने वाला विधेयक  अगर पारित होता है तो इसका लाभ कुलीन वर्ग की महिलाएं ही उठाएंगी| एक और पुरुषवादी मतलब पुरुष वर्चस्वता कायम रखने वाला सुझाव आया कि अगर महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण दिया जाता है तो लोकसभा की वर्तमान सदस्य संख्या बढ़ाई जाए| मतलब पुरुष अपनी उपस्थिति, अपनी सत्ता कम नहीं करना चाहता| वह नहीं चाहता कि स्त्री उसे चैलेंस करे| तैंतीस प्रतिशत आरक्षण की बात है तो तैंतीस प्रतिशत संख्या बढ़े|मतलब अपनी थाली में से एक कौर भी पुरुष देना नहीं चाहता| उसका हिस्सा कायम रहे| इस सोच के चलते महिला आरक्षण विधेयक कैसे तो पार लगेगा| पुरुष अपना हक छोड़ना नहीं चाहता| हक छोड़ने पर उसकी शान में बट्टा लगेगा| उन दिनों यह भी सुझाव दिया गया कि तैंतीस प्रतिशत नहीं, महिलाओं को 10-20 प्रतिशत आरक्षण दे दिया जाए- मतलब स्त्री के लिए जो भी करना है वह आज भी पुरुष की मर्जी से ही होगा- पुरुष दान दे रहा हो मानो| इसका आशय यह है कि समाज में स्त्री हमेशा पुरुष की पिछलग्गू ही बनी रहे| कुछ का सुझाव था कि महिलाओं को पहले योग्य बनाया जाए| और योग्य बन गईं महिलाओं को ही सदन में लाया जाए| गजब का व्यंग्य है यह|एक तो महिलाओं को योग्य बनाने की पाठशाला कहां खोली जाएगी और उसमें पढ़ाने वाले तथा हेडमास्टर पुरुष ही होंगे क्या तो पुरुषों द्वारा प्रदत्त प्रमाणपत्र ही मान्य होगा- महिलाएं योग्य हैं, यह पुरुष तय करेंगे| तो महिलाएं राजनीति में कुशल होने का प्रमाणपत्र पुरुषों से लें| लगता है पुरुषवादी समाज राजनीति व व्यवस्था को अपने मन माफिक बनाए रखने पर तुला बैठा है| बाद में भारी-भरकम शब्दों में पुरुषवादी समाज कहेगा कि हमने महिलाओं को पूरा सम्मान दिया|हमारे यहां आज भी कुछ न कुछ तो यह माना जाता है और बुद्धि के अंदर तक धंसा हुआ है कि बचपन में स्त्री पिता के आश्रय में, विवाह होने के बाद पति के आश्रय में तथा वृद्धावस्था में पुत्र के आश्रय में रहती है- जन्म से मृत्यु तक वह पुरुष के आश्रय में ही रहेगी| नारी की इस पीड़ा को संत कवि तुलसीदास ने यूं व्यक्त किया-

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पराधीन सपनेहु सुख नाहीं| करि विचार देखो मन माही| हमारे यहां कहा गया है, कहा जाता है कि जहां स्त्री की पूजा होती है वहां देवता वास करते हैं- पढ़ने-सुनने में भला लगता है| वास्तव में स्थिति क्या है? स्त्री ने जब भी विशेष दर्जा प्राप्त किया है उसने अपने दम पर प्राप्त किया है, पुरुष की कृपा से नहीं| वैसे स्त्री भी अब ये सब समझने लगी है| उसे ऐसे लुभावने नारे आकर्षित नहीं करते| उसे अपना हक चाहिए| यूपीए सरकार ने कोशिश की कि महिला आरक्षण विधेयक पारित हो जाए, नहीं हो सका| फिर लम्बा इंटरवल हो गया है| उम्मीद थी कि भाजपा पूर्ण बहुमत में है तो विधेयक लाएगी, पास करा लेगी| लेकिन पास कराने की बात अलग, विधेयक पर एकदम मौन साध लिया गया है| कोई न कुछ पूछ रहा न कहीं कोई कुछ कह रहा- लोकसभा का 15वां कालखंड भी बीत जाएगा|

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