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अब भरेगा भारतीय आयुध का खजाना

प्रेम शर्मा

जी हाॅ लम्बे अरसे से भारतीय सेना इन दिनों गोला-बारूद की भारी कमी से जूझ रही है| सन 2017 में ,संसद में रखी गई नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक की रिपोर्ट मे कहा जा चुका है ,कोई युद्ध छिड़ने की स्थिति में सेना के पास महज 10 दिन के लिए ही पर्याप्त गोला-बारूद है| रिपोर्ट में कहा गया था कि ,कुल 152 तरह के गोला-बारूद में से महज 20 प्रतिशत यानी 31 का ही स्टॉक संतोषजनक है| जबकि 61 प्रकार के गोला बारूद का स्टॉक चिंताजनक रूप से कम पाया गया| यहां गौर करने वाली बात यह है कि ,भारतीय सेना के पास कम से कम इतना गोला-बारूद होना चाहिए, जिससे वह 20 दिनों के किसी सघन टकराव की स्थिति से निपट सके| हालांकि इससे पहले सेना को 40 दिनों का सघन युद्ध लड़ने लायक गोलाबारूद अपने वॉर वेस्टेज रिजर्व में रखना होता था| जिसे 1999 में घटा कर 20 दिन कर दिया गया था| भारत में सितंबर 2016 में कुल 152 तरह के गोलाबारूद में केवल 31 ही 40 दिनों के लिए, जबकि 12 प्रकार के गोलाबारूद 30 से 40 दिनों के लिए, वहीं 26 प्रकार के गोलाबारूद 20 दिनों से थोड़ा ज्यादा वक्त के पर्याप्त पाए गए थें| इस रिपोर्ट में साथ ही कहा गया है कि ,इस बीच विस्फोटक ,और विध्वंस उपकरणों जैसे कुछ महत्वपूर्ण हथियारों का रिजर्व सुधरा है, लेकिन बेहतर फौजी ताकत को बनाए रखने के लिए जरूरी बख्तरबंद लड़ाकू वाहनों, और तोपों के लिए गोला बारूद चिंताजनक रूप से कम पाए गए| हालांकि गोला-बारूद की यह किल्लत कोई नई नहीं है ,और पिछली यू पी ए सरकार ने इसे ध्यान में रखते हुए ,2015 तक गोलाबारूद की कमी को दूर के लिए एक रोडमैड भी बनाया था| कैग की इस रिपोर्ट में पाया गया कि ,मार्च 2013 में बने रोडमैप के बावजूद ,इन तीन वर्षों में गोलाबारूद के रिजर्व में कोई खास सुधार नहीं देखा गया| इस बाॅत पर वर्तमान सरकार का मंथन अब सार्थकता की तरफ कदम बढ़ा चुका है भले ही देर से यह कदम उठाया गया हो लेकिन इतना तय है कि अब भारत का आयुध खजाना दूसरे देशों के मुकाबले होगा| सालोे के मंथन के बाद सेना ने 15 हजार करोड़ रुपये की बड़ी परियोजना को अंतिम रूप दे दिया है| इसके तहत सेना के अहम हथियारों और टैंकों के लिए स्वेदशी गोला-बारूद निर्मित किया जाएगा| इससे न सिर्फ आयात में होने वाले विलंब से छुटकारा मिल जाएगा, बल्कि गोला-बारूद के घटते भंडार की समस्या का भी निदान हो जाएगा|आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि इस महत्वाकांक्षी परियोजना में 11 निजी कंपनियों को शामिल किया जाएगा| परियोजना के कार्यान्वयन पर सेना और रक्षा मंत्रलय के शीर्ष अधिकारी स्वयं नजर रखेंगे| इसका तात्कालिक उद्देश्य सभी अहम हथियारों के लिए इतना गोला-बारूद सुनिश्चित करना है ताकि सेना 30 दिन की लड़ाई में सक्षम हो सके| जबकि दीर्घकालिक उद्देश्य आयात पर निर्भरता घटाना है| शुरुआत में विभिन्न प्रकार के रॉकेटों, वायु प्रतिरक्षा प्रणाली, हल्की तोपों, युद्धक वाहनों, ग्रेनेड लांचरों और अन्य युद्धक हथियारों के लिए निश्चित समयसीमा के तहत गोला-बारूद का उत्पादन किया जाएगा| बाद में, कार्यक्रम कार्यान्वयन के पहले चरण के परिणाम के आधार पर उत्पादन लक्ष्यों में संशोधन किया जाएगा| सूत्रों ने संकेत दिया कि इस परियोजना की व्यापक रूपरेखा पर पिछले महीने सेना के शीर्ष कमांडरों के सम्मेलन में विचार-विमर्श किया गया था| थल सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी थल सेना के लिए हथियार और गोला-बारूद की खरीद प्रक्रिया में तेजी लाने पर जोर दे रहे हैं| वहीं, अधिकारी ने बताया, ‘गोला-बारूद का स्वदेशीकरण परियोजना दशकों में ऐसा सबसे बड़ा कदम होगा|

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सरकारी दिशानिर्देशों के अनुसार, भारतीय सेना से दो मोर्चों के लिए तैयार रहने की उम्मीद की जाती है जिसमें एक ही समय चीन एवं पाकिस्तान से युद्ध की आशंका शामिल है| कश्मीर में जारी अराजकता को भी इसमें जोड़ लिया जाए तो कुल मिला कर यह ढाई मोर्चों का संघर्ष बन जाता है|विभिन्न हथियारों के लिए गोला-बारूद का उत्पादन करने वाली 15000 करोड़ रुपये की परियोजना को मंजूरी स्वागतयोग्य है| इस परियोजना की घोषणा इसलिए उल्लेखनीय है, क्योंकि इसके तहत निजी क्षेत्र के सहयोग से घरेलू स्तर पर ही गोला-बारूद का उत्पादन किया जाएगा| इस परियोजना का एक अरसे से इंतजार किया जा रहा था, क्योंकि ऐसी खबरें आ रही थीं कि टैंकों एवं अन्य हथियारों के लिए जितनी मात्र में गोला-बारूद होना चाहिए था उतना आयुध भंडारों में नहीं है| इसे लेकर सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ चिंता भी जता रहे थे| केवल इतना ही पर्याप्त नहीं कि इस चिंता का समाधान होने जा रहा है| आवश्यकता इस बात की है कि रक्षा जरूरतों के मामले में आत्मनिर्भर होने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ा जाए| यह ठीक नहीं कि इसे लेकर जब-तब घोषणाएं तो होती रहती हैं, लेकिन जमीन पर अपेक्षित गति से काम होते हुए नहीं दिखता| रक्षा जरूरतों के मामले में सरकार की ओर से चाहे जैसे दावे क्यों न किए जाएं, इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि सेना पर्याप्त उपकरणों एवं आधुनिक हथियारों से लैस नहीं नजर आती| आज जब प्रतिरक्षा के मोर्चे पर तकनीक का महत्व कहीं अधिक बढ़ गया है तब फिर सेनाओं के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की जरूरत है| इसमें दो राय नहीं कि फिलहाल सेनाओं का आधुनिकीकरण उस गति से नहीं हो पा रहा है जिस गति से दुनिया के प्रमुख देशों में हो रहा है| आज जब भारत अपनी गिनती दुनिया के चुनिंदा राष्ट्रों में कर रहा है तब फिर उसकी सेना की क्षमता भी विश्व स्तर की होनी चाहिए|रक्षा जरूरतों को पूरा करने के मामले में इस पर भी गंभीरता से ध्यान देने का यह सही समय है कि विभिन्न हथियारों एवं उपकरणों का निर्माण स्वदेश में ही करने की जो परियोजनाएं शुरू की गई थीं वे सही गति से आगे क्यों नहीं बढ़ पा रही हैं? इस मामले में इस तथ्य से कोई इन्कार नहीं कर सकता कि ऐसी कई परियोजनाएं आवश्यकता से अधिक लंबी खिंच रही हैं और फिर भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रही हैं| किसी को इस पर गौर करना ही चाहिए कि रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन अर्थात डीआरडीओ कसौटी पर खरा क्यों नहीं उतर पा रहा है? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि भारत मिसाइल और अंतरिक्ष तकनीक में तो दुनिया को चमत्कृत करने वाली उपलब्धियां हासिल कर रहा है, लेकिन हथियारों एवं रक्षा उपकरणों के मामले में कोई मिसाल कायम नहीं कर पा रहा है| भारत सरीखे देश के लिए यह सम्मानजनक स्थिति नहीं कि उसकी गिनती दुनिया के सबसे बड़े हथियार आयातक देश के रूप में होती रहे| यह सही है कि रक्षा जरूरतों के मामले में रातों-रात आत्मनिर्भर नहीं हुआ जा सकता, लेकिन अब समय आ गया है कि इस मामले में कोई लक्ष्य तय किया जाए और उसे एक निश्चित समय में पूरा भी किया जाए|

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