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70 साल में देश में कुछ न होने का सर्टिफिकेट बांट रहे

प्रभाकर चैबे 

महाभारत में एक प्रसंग है| एक विद्वान ऋषि पुत्र तथा दूसरे विद्वान ऋषि पुत्र के बीच शास्त्रार्थ रखा जाता है और इसका निर्णायक पहले ऋषि पुत्र के पिता को बनाया जाता है| एक अन्य विद्वान ऋषि इस पर अपनी राय रखते हैं कि हे ऋषिवर आप पर बड़ा दायित्व आन पड़ा है| यहां आपकी निष्पक्षता की भी परीक्षा हो रही है| और आपके ज्ञान व सत्य पर अडिग रहने की चुनौती आ खड़ी हुई है| ज्ञानी ऋषि कहते हैं कि हे ऋषिवर! जो सत्य को जानता है लेकिन छिपाता है अथवा जो सत्य को जानता है और अर्द्धसत्य बोलता है| जो सत्य को जानता है लेकिन चुप रहता है| सत्य का उद्घाटन करने के स्थान पर वह पक्षपात करता है| हे ऋषि! ऐसों के लिए दंड का प्रावधान है| यह प्रसंग इसलिए याद आया एक ओर भाजपा लगातार यह कहती रहती है कि इन 70 सालों में कुछ नहीं हुआ| कांग्रेस ने कुछ नहीं किया| केवल भ्रष्टाचार किया| हर सभा, चर्चा में भाजपा प्रवक्ता ऐसा ही कहता है जबकि उसे मालूम है कि 70 सालों में विकास के कई काम हुए हैं|  इन 70 सालों में देश की जनता आधुनिक युग में आ चुकी है| 1987 में ही तात्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी प्राय: हर सभा में, साक्षात्कार में कहते कि अब देश 21वीं सदी में जा रहा है- 21वीं सदी की ओर देख रहा है| शायद राजीव गांधी ने ही पहली बार नई सदी में प्रवेश की बात कही थी और जनता में उत्साह भरा था| बहरहाल यह आगे की बात है| देश में इतिहास को तीन खंडों में बांटकर उसका समग्र अध्ययन किया जा सकता है| एक हिस्सा आजादी से पहले का मतलब 1947 के पूर्व का भारत| जो बड़ी-बड़ी बातें करते हैं उन्हें यह मालूम है कि 1947 में भारत के लोगों की औसत उम्र 27 वर्ष थी- जब देश आजाद हुआ| आज 75 वर्ष है| यह उन्हें पता है लेकिन सत्य को छिपाते हैं और एक ही पहाड़ा रटते हैं कि 70 सालों में कुछ नहीं हुआ|  इस संदर्भ में कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर के लेख की ये पंक्तियां याद हो रही हैं| 1941 में अपनी मृत्यु से तीन माह पूर्व कवि ने एक लेख लिखा था-अंग्रेज जाएंगे| उन्हें जाना होगा| लेकिन जाने से पहले घोर गरीबी, बीमारी, निरक्षरता छोड़ जाएंगे| यही हुआ| प्रथम प्रधानमंत्री पं| नेहरू 1952 के चुनाव में हर सभाओं में कहते कि आपने आजादी की लड़ाई में हमारा साथ दिया| आपके साथ मिलकर आजादी की लड़ाई लड़ी गई| अब गरीबी, अशिक्षा, बीमारी के खिलाफ लड़ने साथ आइए| आजाद होते ही देश ने साक्षरता पर विशेष ध्यान दिया और गांव-गांव में प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र खोले गए- इसमें लालटेन किताब व एक शिक्षक रहते|

कभी-कभी यह सुनकर हंसी आती है कि कुछ लोग कहते हैं कि 70 सालों में कुछ नहीं हुआ|  जानबूझ कर तथ्यों को छिपाने की कोशिश है यह| आजादी में देश को बीमारी और गरीबी से लड़ने की चुनौती थी| प्लेग, डायरिया, हैजा जैसी जानलेवा बीमारियों से मुक्त होने देश ने सुनियोजित प्रयास शुरू किया-चेचक पर विजय पाने लगातार प्रयास किये गए- गांव-गांव में चेचक-विरोधी, टीका अभियान शुरू किया गया| घातक रूप में जो कुछ बीमारियां होती थीं वे इतिहास बन गई हैं| आज की एकदम नई पीढ़ी को उसके खतरे के बारे में पता भी न होगा| तो सरकार ने  प्रयास किया| सफलताएं भी मिलीं| भ्रष्टाचार तो हर सरकार का मेहमान बनकर आता रहा है| लेकिन कुछ नहीं हुआ| ऐसा सर्टिफिकेट बांटना कहां का न्याय है| बालिका शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया गया| जगह-जगह बालिकाओं के प्राथमिक, मिडिल व हाई स्कूल खोले गए| टी|बी| उन्मूलन कार्यक्रम को बड़ी सफलता मिली| बालिकाओं में अपने अधिकार के प्रति एक जागरूकता पैदा होने लगी थी और वे अधिकार-सम्पन्न होने की ओर बढ़ रही थीं| हर चुनाव में क्षेत्र की जनता अपने क्षेत्र में प्राथमिक, मिडिल व हाई स्कूल की मांग करती- मतलब शिक्षा के प्रति ललक बढ़ी थी| और ये कहते हैं कुछ नहीं हुआ| और हो सकता था, नहीं हुआ, यह तंत्र के अंदर की कार्यप्रणाली के कारण| पल्स पोलियो अभियान तो ऐतिहासिक रहा| देश आजाद हुआ तो देश में अनाज की भयानक कमी थी-पं| नेहरू अमेरिका से अनाज चाहते थे| अमेरिका गए भी| राष्ट्रपति ट्रूमेन से चर्चा की| लेकिन अमेरिका का उद्योग जगत अपनी शर्तें भारत पर थोपना चाहता था|  नेहरू जी वापस आ गए- खाली हाथ| अमेरिका अपने स्वार्थ के लिए भारत को नीचा दिखाना चाहता था| इसी समय देश में सामुदायिक विकास केन्द्र खोले गए- ग्रामसेवकों को ट्रेनिंग देने के लिए संस्थाएं खोली गईं- होशंगाबाद जिला स्थित पवारखेड़ा में बड़ा केन्द्र खोला गयारू यहां ट्रेक्टर चालन की भी ट्रेनिंग का केन्द्र था (अब पता नहीं) नया दौर फिल्म इसी कथावस्तु पर बनी थी| बहरहाल ब्लाक कार्यालय खोल ग्रामीण अर्थ गतिविधियों का विकेन्द्रीकरण कर प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू के अवदान को न मानो- जो गलतियां हुईं उनके सर मढ़कर छुट्टी पा लो| हर बात के लिए नेहरू की नीतियों पर प्रहार करो- आप की मर्जी जनाब| लेकिन नेहरू की विकास की अवधारणा के तहत प्राप्त एकाध उपलब्धि को तो याद कर लिया करो| नेहरू के समय ही तो देश में नदियों पर बड़े-बड़े बांध बने- जरूरत थी| आज वैश्विक पूंजीवाद नया नारा दे रहा है- नदियों को जोड़ो| पर्यावरणविद इस नीति का विरोध कर रहे हैं| देश आजाद हुआ तो सिंचाई का कितना रकबा था बाद में कितना बढ़ा यह तो देखो| देश में बार-बार अकाल पड़ता| अनाज की भारी कमी होती- किसानों का उनके उत्पाद का उचित मूल्य भी नहीं मिल रहा था| उन्हीं दिनों भारतीय खाद्य निगम की स्थापना का ऐतिहासिक कदम उठाया गया| श्रीमती इंदिरा गांधी ने ही सिक्किम को भारत का हिस्सा बनाया| और आप हैं जनाब कहते रहते हैं, पहाड़ा रटते रहते हैं कि 70 सालों में कुछ नहीं हुआ| सार्वजनिक क्षेत्र में बुनियादी उद्योग की स्थापना उन्हीं दिनों की गई| कांग्रेस राज्य में| भिलाई का इस्पात रेलपांत पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हुआ यह आज आपके समय अचानक जादुई ताकत से नहीं हो गया| इन उद्योगों को निजी क्षेत्रों में बेचने मतलब इनके कुछ हिस्से या पूरे हिस्से के विनिवेश की शुरूआत तो बाद में आनेवाली कांग्रेस की सरकारों के समय ही शुरू कर दिया गया था| नेहरू की बहुत सी जनहितकारी आर्थिक नीतियों को उनकी पार्टी ने ही त्यागा| लेकिन एनडीए प्रथम सरकार के समय तो बाकायदा विनिवेश मंत्रालय का गठन कर दिया गया था| औने-पौने दाम पर सार्वजनिक क्षेत्र में उद्योग के हिस्से बेचे जा रहे थे| इसी को शायनिंग इंडिया कह रहे थे, जनता ने इसे रिजेक्ट कर दिया| बहरहाल अभी बात इसकी हो रही है कि 70 सालों में कुछ भी नहीं हुआ| अगर, कुछ भी नहीं हुआ तो आज (2018) के हर भारतीय को 1947 की तरह रहन-सहन में करना था- जिसमें सबके पास सायकल तक नहीं थी|  शहर में कुछ ही बड़े लोगों के घर बिजली थी- मतलब आज उसी अर्द्ध विकसित- सी अवस्था में पड़े रहना था| आज तो एकदम ही सारा परिदृश्य बदला हुआ है| यह क्या 2014 से 2017 के बीच हुआ? कोई जादू की छड़ी घुमा दी| जरा उन दिनों की रेल की याद कर ली जाए- जो कह रहे हैं कि कुछ नहीं हुआ उन्हें पढ़ लेना चाहिए- आजादी से पहले एक अंग्रेज लेखक ने रेल की दशा पर इंडियन रेल नाम से निबंध लिखा था जो बहुत दिनों तक पाठ्य पुस्तकों (30 के दशक में) था| हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने भी 18वीं सदी में भारतीय रेल की दशा का आर्थिक चित्रण किया है-वे बनारस से जबलपुर तक की रेलयात्रा पर रहे| एक समय-उस निबंध को पढ़े| बहरहाल 1947 के बाद मतलब देश के आऽााद होने के कई सालों तक रेल यात्रा मतलब पूरे बदन में कोयला लिपटा लेना| कभी-कभी आंखों में घुस जाता था| तो बेहतर सुविधाएं न सुरक्षा| आज स्थिति कितनी बेहतर है| क्या 2014 से ही ये हो गया| उन्हीं दिनों की सरकार ने डीजल से चलनेवाली रेल इंजिन बनवाया| धीरे-धीरे हर पांत पर डीजल इंजिन दौड़ने लगे| कोयले के इंजिन इतिहास बन गए- फिर रेलों के बिजली से चलने की घोषणा पर काम शुरू किया गया| आज रेलों में कई खामियां हैं लेकिन जो सुविधाएं हैं रेलों की जो बढ़ी हुई गति है, वह 2014 में ही नहीं मिल गए| उन दिनों की सरकारों ने इस दिशा में काफी काम किया| आज जनसंघ से नाम बदलकर भारतीय जनता पार्टी बनी| इसमें कोई गलत भी नहीं है| लेकिन याद रखने की बात यह कि जनसंघ से उसकी स्थापना के समय से पत्रकार पूछते रहे कि आपकी आर्थिक नीतियां क्या हैं? जनसंघ ने जवाब दिया नहीं| जनसंघ को छोटे व्यापारियों की पार्टी कहा जाने लगा था| जिसकी कोई आर्थिक नीति नहीं| आज भी जिन आर्थिक नीतियों पर भाजपा की केन्द्र सरकार चल रही है वह भाजपा की नहीं है- कांग्रेस से उधार ली हुई है| 1991 से जब से कांग्रेस की आर्थिक नीतियों में आर्थिक सुधार की शुरूआत आज एनडीए सरकार जिन आर्थिक सुधारों के ट्रैक पर दौड़ रही है वह डॉ| मनमोहन सिंह की नीतियां हैं| इसीलिए आज भी भाजपा यह स्पष्ट नहीं कर रही है उसकी आर्थिक नीतियां हैं क्या? वह एक दार्शनिक सा उत्तर देती है- सबका विकास सबका साथ||| मानो कोई नई बात का खुलासा कर रही है| भाजपा की आर्थिक नीतियां केवल कार्पोरेट हितैषी हैं| इसीलिए प्रधानमंत्री अपनी चुनावी सभाओं में कांग्रेस पर जमकर बरसते तो हैं लेकिन बताते नहीं कि रोजगार किस नीति के तरह पैदा होंगे|||| वैसे तो सुधार की प्रक्रिया 1987 से ही शुरू कर दी गई थी लेकिन 1991 में इसमें गति लाई गई| यह आर्थिक सुधार की नीति नेहरू की आर्थिक नीतियों से एकदम अलग रही है और डॉ| मनमोहन सिंह तथा कांग्रेस के नेतृत्व वर्ग ने पं| नेहरू की आर्थिक नीतियों को स्मरण नहीं किया कभी| भाजपा नीत एनडीए सरकार (प्रथम) बनी तो उसने इसी आर्थिक नीतियों को गले लगा लिया और सुधार की ओर बढ़ी लेकिन सिखाए दल दोबारा नहीं चढ़ते की कहावत की तरह एनडीए प्रथम की सरकार फेल हो गई| यद्यपि उसने केन्द्र में विनिवेश मंत्रालय खोल दिया था- सब बेचना है|

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