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नीति आयोग की समीक्षा तो करनी होगी

प्रेम शर्मा

योजना आयोग को समाप्त कर नीति आयोग बनाया गया| नए भारत की भावना और बदले हुए डायनेमिक्स को प्रतिबिंबित करते हुए, शासन और नीति की संस्थाओं को नई चुनौतियों के अनुरूप बनाना होगा और उन्हें हर हाल में भारत के संविधान के मूल सिद्धांतों, हमारी सभ्यता एवं इतिहास से अर्जित ज्ञान तथा आज के सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक संदर्भ पर निर्मित करना होगा| भारत और इसके नागरिकों की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए शासन में संस्थागत सुधार और डायनेमिक नीतिगत परिवर्तनों की आवश्यकता है, जो अभूतपूर्व परिवर्तन के बीज बो सकें और फिर उसे बनाए रखें| इस बदलते समय को ध्यान में रखते हुए, भारत सरकार ने अब तक के योजना आयोग के स्थान पर नीति आयोग इस आशय से किया गया था कि भारत के लोगों की आकांक्षाओं को बेहतर तरीके से पूरा किया जा सके| नीति आयोग के गठन से पहले, मुख्यमंत्रियों, विशेषज्ञों, अर्थशास्त्रियों और आम जनता के साथ ‘‘ मेरी सरकार’’ के जरिए व्यापक विचार-विमर्श किया गया था| नीति आयोग के मुख्य उदेश्यों मेसेक्टर और स्ट्रैटेजीस के साथ राज्य के सक्रिय सहयोग से देश के विकास से संबंधित लक्ष्यों की साझी परिकल्पना को प्राथमिकता देना| इस तरह नीति आयोग प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों के ‘राष्ट्रीय एजेंडा’ के फ्रेमवर्क को गतिशीलता प्रदान करना|मजबूत राज्य से ही मजबूत राष्ट्र का निर्माण होता है इस बात को मानते हुए ही राज्यों के साथ निरंतर चलने वाले ढ़ांचागत सहयोग पहलों और मेकेनिज्म के माध्यम से साझे संघवाद का पोषण करना| ग्रामीण स्तर से शुरू करते हुए धीरे-धीरे उच्च स्तरों तक विश्वसनीय योजनाओं के निर्माण के मैकेनिज्म को विकसित करना|आर्थिक स्ट्रैटेजी और नीति में विशेषरूप से ध्यान दिए जाने वाले क्षेत्रों को सुनिश्चित करना जहां राष्ट्रीय सुरक्षा हित शामिल हैं| समाज के उन वर्गों पर विशेष ध्यान देना जिन्हें आर्थिक विकास का पर्याप्त लाभ नहीं मिला है|दृ स्ट्रैटेजिक और दीर्घावधि नीतियों, पहलों और कार्यक्रमों के फ्रेमवर्क का निर्माण करना और उसकी दक्षता की प्रगति की निगरानी करना| फीडबैक और निगरानी से सीख लेकर उन्हें जरूरत के अनुसार सुधार करते हुए मध्यावधि नई पहलों में प्रयोग में लाना| शैक्षणिक और नीति अनुसंधान संस्थान सहित राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय थिंक टैंक के प्रमुख स्टेक-होल्डर्स के बीच साझेदारी को बढ़ाना और सलाह देना| राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों, पेशेवरों और अन्य पार्टनरों के समूहों के माध्यम से उद्यम सहयोग व्यवस्था के ज्ञान को नया रूप देना|विकास एजेंडा के कार्यान्वयन को गति प्रदान करने के लिए इंटर-सेक्टर और इंटर-डिपार्टमेंटल से जुड़े मुद्दों के समाधान के लिए प्लेटफार्म मुहैया कराना|स्टेट-आफ-दा-आर्ट्स रिसोर्स सेंटर का निर्माण करना जो सतत और समान विकास में स्टेक-होल्डर्स तक इसका प्रसार करने में सर्वोत्तम तरीकों और सुशासन में सहायता करना|कार्यक्रमों और पहलों के कार्यान्वयन का सक्रिय मूल्यांकन और निगरानी करना जिसमें जरूरत के संसाधनों की पहचान इस तरह से की जाए जहां सफलता और डिलीवरी के विस्तार की संभावनाएं हों|कार्यक्रमों और पहलों के कार्यान्वयन में क्षमता निर्माण और प्रौद्योगिकी के नवीनीकरण पर ध्यान देना| राष्ट्रीय विकास एजेंडा के निष्पादन और उल्लिखित उद्देश्यों की पूर्ति में जरूरत की अन्य गतिविधियों को शुरू करना शामिल था| रविवार को हुई नीति आयोग गवर्निंग काउंसिल की चैथी बैठक इस लिहाज से महत्वपूर्ण रही कि सरकार के मौजूदा कार्यकाल की यह संभवतः आखिरी बैठक थी| दिलचस्प है कि इस बैठक में भी लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराने की जरूरत पर ही सबसे ज्यादा जोर दिखा| यह मसला काउंसिल की पिछली बैठक में भी उठा था| प्रगति तो इसमें क्या ही होनी थी| आखिर यह एक राजनीतिक मसला है| सर्वानुमति के बिना इस पर बात आगे नहीं बढ़ सकती और ज्यादातर राजनीतिक दल इसे अव्यावहारिक बता रहे हैं| नीति आयोग इसमें इतना क्यों उलझा हुआ है, समझना कठिन है| अपने गठन से लेकर अब तक नीति आयोग ने अब तक क्या किया इसकी समीक्षा तो होनी चाहिए| सरकारी तंत्र में शोध समस्याओं को टालने का एक जरिया बन जाता है| हमें ऐसी व्यवस्था नहीं चाहिए,  जिसमें योजना कोई और बनाए और उस पर कदम कोई और उठाए| बहरहाल, नीति आयोग को योजना बनाते समय कुछ खास बातों का बिंदुओं रखना होगा| पहला, ‘डेमोग्रैफिक डिविडेंड|’  योजना निर्माण में वास्तविक चुनौती यही है कि कैसे हम अपनी जनसंख्या का अधिकतम लाभ उठाएं| देश की आबादी करीब सवा अरब है, जो यकीनन बहुत बड़ी है| दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी हमारे पास है| 15 से 40 साल के बीच हमारी सबसे बड़ी कार्य-शक्ति है| इसका एक मतलब यह भी है कि चीन, अमेरिका या जापान की तुलना में हमारे पास अधिक मेहनतकश और कम रिटायर्ड लोग हैं| अब इस कामकाजी आबादी का देश के विकास में अधिकतम इस्तेमाल करना हर सरकार का दायित्व है| लेकिन फिलहाल तो रोजगार की कमी है और कौशल विकास का भी भारी अभाव है|अब तक जिस ‘डेमोग्रैफिक डिविडेंड’  की बात हो रही है|  इस लिहाज से काम हो, योजनाएं बनें, तो आने वाले समय में बड़े बदलाव देखे जा सकते हैं| हमारे पास एक ‘बोनस’ है, जो दिल को सुकून पहुंचाता है| यह बोनस है कि अगर हमारे पास अच्छी नीतियां हों,  तो पहले की तुलना में महिलाएं हमारी विकास दर बढ़ाने में बड़ी सहभागी बन सकती हैं| पितृ-सत्तात्मक समाज में यह स्थिति पहले नहीं थी, लेकिन अब लड़कियां स्कूल-कॉलेज जा रही हैं और अपनी जिंदगी का अच्छा-खासा समय शिक्षा पर दे रही हैं| ऐसे में,  वे हमारी कार्य-शक्ति को बढ़ा रही हैं| इसे ‘स्वीटेस्ट डिविडेंड’ के तौर पर देखा जा सकता है| हमारे पास कोयला का अकूत भंडार है,  जिसका खनन और ढुलाई की जा सकती है| लेकिन इसकी राह में कई समस्याएं हैं|देश मे ऊर्जा क्षेत्र में भी धीमा सुधार और वितरण की समस्या है| देश में जमीन और पानी बड़ी समस्या बनकर उभरा है| अगर विकास दर ऊंची हो,  तो मांग और आपूर्ति के बीच का अंतर काफी बड़ा हो जाएगा| यही नहीं, कृषि के लिए कम पानी उपलब्ध होगा, शहरीकरण बढ़ रहा होगा और अनियंत्रित औद्योगीकरण भी हो सकता है| ऐसे में, जलापूर्ति के क्षेत्र में बड़ी चुनौतियां आएंगी| खासकर आंध्र प्रदेश,  गुजरात, हरियाणा, पंजाब, तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में पानी की किल्लत होने की भारी आशंका है| जहां तक जमीन का सवाल है|  तो देश में कृषि योग्य जमीन का विस्तार भी रुक गया है और जमीन की मांग बस शहरों में रह गई है, गांवों में नहीं| एक तरह से ऊपयोगी जमीनों का अभाव-सा है और ऊपर से सारा मामला जमीन को लेने का उठता रहता है| बेकार जमीन हैं,  लेकिन यह नहीं कहा जाता कि वहां जाकर उद्योग-धंधे स्थापित किए जाएं| दूसरी तरफ, बाजार जमीन का भाव तय करता है, किसान नहीं| इसलिए भूमि-नीति भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है| दिक्कत यह है कि न सिर्फ नीति आयोग बल्कि खुद यह सरकार भी पांच साल के पैमाने को अपने लिए निरर्थक मानती है| 2014 में अपने आगमन के साथ ही नरेंद्र मोदी सरकार ने यह चर्चा शुरू कर दी थी कि योजना आयोग को समाप्त कर उसकी जगह कोई नई एजेंसी बनाई जाए| 1 जनवरी 2015 को भारत सरकार के एक पॉलिसी थिंक टैंक के रूप में नीति (नैशनल इंस्टीट्यूशन फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया) आयोग गठित कर दिया गया| 8 फरवरी 2015 को इसकी पहली बैठक हुई|कहा गया था कि यह आयोग 15 साल का रोडमैप, सात साल का विजन डॉक्युमेंट और तीन साल का एक्शन प्लान तैयार करेगा| आयोग की गवर्निंग काउंसिल की सालाना बैठक भी नियमित तौर पर होती रही| लेकिन भारत के नीतिगत ढांचे में नीति आयोग की कोई ठोस भूमिका आज भी रेखांकित नहीं हो पाई है| गवर्निंग काउंसिल की इस चैथी बैठक में भी प्रधानमंत्री ने ‘न्यू इंडिया 2022’ का अपना विजन पेश किया| उस समय तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य रखा गया है| सरकार का कार्यकाल बीतने जा रहा है, लेकिन उसका यह आला नीति निकाय चार साल आगे का सपना दिखा रहा है| चुनावों से तो खैर योजना आयोग का भी कोई नाता नहीं रहता था, लेकिन पंचवर्षीय योजनाओं के जरिए उसकी एक ठोस भूमिका देश के सामने बनी रहती थी| नीति आयोग ऐसी किसी भी भूमिका से परे है| एक शीर्ष संस्था के बारे में इतनी जल्दी किसी निष्कर्ष तक पहुंच जाना उचित नहीं है| लेकिन उस पर लगने वाले सरकारी धन का उपयोग सिर्फ प्रचारात्मक आंकड़ेबाजी और महीन बौद्धिक कताई के लिए नहीं किया जा रहा है, इस बारे में कुछ अंदाजा लगाने के लिए चार साल का वक्त उतना कम भी नहीं है|

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