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भाजपा का विकल्प बनने की कवायद में विपक्ष

राजेश माहेश्वरी

जैसे-जैसे 2019 के लोकसभा चुनाव का समय नजदीक आ रहा है वैसे-वैसे भारतीय जनता पार्टी का विकल्प तैयार करने के लिए जबर्दस्त कवायद विपक्षी दल कर रहे हैं| वही वर्तमान परिवेश में तेजी से राजनीतिक पटल पर नया राजनीतिक धुव्रीकरण उभरता नजर आ रहा है,जहां एक बार फिर से देश के राजनीतिक दल अपनी अपनी कवायद बचाने के लिये भाजपा के खिलाफ लामबंद हो रहे है, जबकि ये ही दल एक समय जब देश में कांग्रेस का राजनीतिक वर्चस्व था, तो भाजपा के साथ मिलकर कांग्रेस के खिलाफ लामबंद होते थे| इतिहास इस बात का गवाह है| इस तरह के राजनीतिक धुव्रीकरण समयानुसार यहां होता रहा है| लेकिन भाजपा के बढ़ते वर्चस्व एवं बढ़त से घबराए राजनीतिक दलों ने एक साथ आने का मन बना लिया है| कर्नाटक में कुमारी स्वामी सरकार के शपथ ग्रहण समारोह के बाद अभी हाल ही में जंतर-मंतर में मंच साझा कर विपक्ष ने देश में भाजपा का विकल्प बनने के अपने संकल्प को दोहराया है| ये अलग बात है कि देश की जनता इस गठबंधन को किस नजर से देखती है, और उसे आने वाले समय में कितना साथ देगी| वास्तव में जब से भाजपा का वर्चस्व नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश भर में उभरने लगा है तब से राजनीतिक दलों की समझ में यह बात तेजी से घर करने लगी है कि सत्ता में आना तो दूर, अलग-अलग लडकर अपनी राजनीतिक प्रतिष्ठा भी बचा पाना मुश्किल हैं| ऐसे हालात में एक होकर ही वोटों के विकेन्द्रीकरण को रोककर अपनी राजनीतिक प्रतिष्ठा बचाते हुए फिर से सत्ता के करीब पहुंचा जा सकता है| वर्ष 2019 का लोकसभा चुनाव इस तरह के राजनतिक धुव्रीकरण से अछूता नहीं रहेगा, इसका आभास अभी से उत्तर प्रदेश के हो रहे लोकसभा उपचुनाव से पूर्व देखने को मिलने लगा है जहां एक दूसरे के राजनतिक विरोधी रहे सपा एवं बसपा एक मंच पर आते दिखाई देने लगे हैं| इस तरह के उभरते हालात को देखकर यह भी कहा जाने लगा है कि यदि ये गठबंधन पूर्व में उत्तरप्रदेश के चुनाव के समय हो गये होते तो उत्तर प्रदेश में भाजपा को इतना बहुमत नहीं मिल पाता| जिस तरीके से असानी से भाजपा पूर्ण बहुमत से भी ज्यादा सीट लेकर उत्तर प्रदेश को राजनीतिक किले पर माया मुलायम के चंगुल से बाहर कर फतह हासिल कर पाई थी, दोनों के एक साथ खड़े होने से संभव नहीं था| विपक्ष में प|बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भाजपा के खिलाफ काफी मुखर है| वस्तुतः ममता बनर्जी ही उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा में एकता की सूत्रधार रही और उसका परिणाम भी अच्छा आया| देश में तेजी से भाजपा के खिलाफ राजनीतिक पटल पर एक नया धुव्रीकरण बनता नजर आ रहा है जहां एक बार फिर से एक दूसरे के राजनीतिक विरोधी रहे राजनीतिक दल लामबंद हो रहे हैं| द्रेश में जिन उम्मीदों के साथ नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केन्द्र में सत्ता परिवर्तन हुआ था, वे उम्मीदें कहीं से भी पूरी होती नजर नहीं आ रहीं हैं| बेरोजगार युवा पीढ़ी आज भी रोजगार के लिये भटक रही है| रोजगाार देने वाले संसाधन इस सरकार ने एक भी सृजित नहीं किये| कई विभाग में पदें खाली है, जो अभी तक नहीं भरे गये| बैंकों में खुले खाते अर्थ के अभाव में अल्प बैंलेंश होने के कारण बैंक की देनदारियां चुकाने में ही खाली होते जा रहे हैं| किसानों की फसलों का उचित दाम मिलने के कम आसार नजर नहीं आ रहे है| महंगाई व बेरोजगारी बढ़ती जा रही है| इस तरह के उभरते हालात आगामी चुनावों में भाजपा के लिये नुकसानदायक साबित हो सकते हैं| भाजपा के सहयोगी आंध्र प्रदेश में टीडीपी ने भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है| परंतु वह कांग्रेस के साथ कतई हाथ नहीं मिलाएगा| उसी तरह महाराष्ट्र में शिवसेना भाजपा के खिलाफ लगातार बयान दे रही है लेकिन वह भी कांग्रेस के साथ नहीं जाएगी| फिलहाल भारतीय जनता पार्टी विन विन की स्थिति में है| 21 राज्यों में उसका शासन है इसलिए उसके पास अभी विपक्ष के खिलाफ एक बार फिर मजबूत होने का वक्त है| इसमें शक नहीं कि अगले चुनाव में भाजपा को विपक्ष की कड़ी चुनौती मिलेगी| एक तरफ विपक्ष गोलबंद होने की कोशिश कर रहा है वहीं भारतीय जनता पार्टी फिलहाल उत्तर प्रदेश एवं बिहार उपचुनाव में अपनी हार पर मंथन करके नयी रणनीति पर काम कर रही है| दलितों का साधने के लिये मोदी सरकार ने एससी-एसटी एक्ट में विशेष बदलाव किये हैं| भाजपा भी विपक्ष की काट तेजी से खोजने में जुटी है| अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश भाजपा कार्यसमिति की दो दिवसीय बैठक में भाजपा ने 2019 के रोड मैप का खाका खींचा| पार्टी का फोकस दलित और पिछड़े वोट बैंक पर है| हाल ही में राज्यसभा में उपसभापति पद के चुनाव में विपक्ष को पटखनी देने के बाद से मोदी सरकार का मनोबल बढ़ा हुआ है|

2014 में भाजपा ने अपने दम पर बहुमत हासिल किया था (लोकसभा की कुल 543 सीटों में 282 सीटें जीतकर), पर उसकी वोट हिस्सेदारी महज 31 फीसदी ही थी| इतनी कम वोट हिस्सेदारी के साथ किसी भी पार्टी ने कभी इतनी ज्यादा सीटें नहीं जीती थीं, इससे पहले सबसे कम वोट हिस्सेदारी के साथ किसी एक पार्टी ने बहुमत हासिल किया था तो वह 1967 में कांग्रेस थी, जब उसने कुल डाले गए वैध मतों के 40|8 फीसदी के साथ 28 3 सीटें जीती थीं| ज्यादा दिलचस्प बात यह है कि भाजपा और कांग्रेस की मिलाकर कुल वोट हिस्सेदारी महज 50 फीसदी से कुछ ही ज्यादा थी, जिसका मतलब है कि आधे वोट किसी दूसरी पार्टी के लिए थे| अगर दो बड़े गठबंधनों की कुल संयुक्त वोट शेयर को लिया जाए तो एनडीए को 38|5 फीसदी जबकि यूपीए को महज 23 फीसदी से कुछ कम वोट मिले थे| इसके बाद भी कुल तकरीबन 39 फीसदी वोट मोटे तौर पर एनडीए की वोट हिस्सेदारी के बराबर-अन्य पार्टियों की झोली में गए थे| लिहाजा कागजों पर तो यूपीए और दूसरी पार्टियों का साथ आना 2019 में मोदी के विशालकाय काफिले को रोक सकता है| यही नहीं, 2014 में भाजपा की 31 फीसदी वोट हिस्सेदारी पांच राज्यों (गुजरात, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तराखंड) में उसे मिले 50 फीसदी वोटों का और अन्य चार राज्यों में उसे मिले 40 फीसदी से ज्यादा वोटों का नतीजा थी| वहीं पांच साल पहले, जब विपक्ष बिखरा हुआ था, उसने इन 304 सीटों में से 140 सीटें जीती थीं| इनमें भी 71 सीटें (कुल 80 में से) अकेले उत्तर प्रदेश में थीं| अगर सपा और बसपा 2014 में साथ मिलकर लड़ी होतीं, तो वे उत्तर प्रदेश में भाजपा की सीटों को 30 से भी नीचे ले आतीं| गोरखपुर, फूलपुर और कैराना के नतीजे खुद बयान करते हैं कि आगे भाजपा के लिए क्या होने वाला है| हालांकि आंकड़े भाजपा की मुश्किल का इशारा कर रहे हैं, पर सियासत महज गुणा-भाग से कहीं ज्यादा है| इसका बहुत कुछ मतलब केमिस्ट्री भी है और फिलहाल कोई एक नेता नहीं है जो बिखरे हुए विपक्ष को एकजुट कर सके| वर्तमान में विपक्षी एकता का सारा दारोमदार ममता बनर्जी, बिहार में लालू प्रसाद, झारखंड में हेमंत सोरेन, ओडिशा में नवीन पटनायक एवं महाराष्ट्र में शरद पवार पर है| लेकिन विपक्ष के तमाम एकजुटता के प्रयास के बावजूद यह कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जनता की मन की बात कहकर उन्हें लुभा देते हैं| देश में नरेन्द्र मोदी के खिलाफ सबसे जोरदार आवाज राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद उठाते रहे हैं लेकिन वे चारा घोटाले में होटवार जेल में बंद हैं| विपक्षी एकता की कवायद के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लगातार देश के किसानों, दलितों, पिछड़ों और महिलाओं के विकास पर फोकस कर रहे हैं| अब ये तो आने वाला समय ही बताएगा की विपक्ष भाजपा का विकल्प बनकर उभर पाता है या नहीं|

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-लेखक राज्य मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं|

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