Tuesday , October 23 2018
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कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी के ऊपर उठा बड़ा सवाल

क्या कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी अपने ऊपर लगे पप्पू का दाग धो पाएंगे? राहुल खुद मानते हैं कि वह पप्पू नहीं हैं. उन्हें बीजेपी  आरएसएस ने पैसा खर्च करके पप्पू बनाया है. इसके पीछे उनका तर्क है कि पॉलिटिक्स में आने के दिन से ही बीजेपी  आरएसएस को उनके भविष्य का एहसास हो गया था, इसलिए सबने दुष्प्रचार करके पप्पू बना दिया. कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष का दावा है कि दिसंबर 2018 तक वह पप्पू की छवि को तोड़ देंगे, लेकिन म प्र , छत्तीसगढ़, राजस्थान में कांग्रेस के फैसला ने एक बार फिर सवाल को मौजूं बना दिया है. सवाल है कि क्या राहुल गांधी पप्पू के दाग को धो पाएंगे?

क्या था निर्णय?
 प्र विधानसभा चुनाव में साझेदारी के लिए कांग्रेस पार्टी की पहली पसंद बीएसपी थी. कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2018  में पहली बार कांग्रेस पार्टी की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी  बीएसपी प्रमुख मायावती की मंच से दिखी केमिस्ट्री ने एक नया फ्लेवर दिया. इसके बाद से बीजेपी को सत्ता से उखाड़ फेकने के लिए बनने वाले महागठबंधन में मायावती  बीएसपी धुरी की तरह दिखाई देने लगी. यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी  राहुल गांधी के आदेश के बाद म प्र , छत्तीसगढ़  राजस्थान के नेताओं ने बीएसपी के साथ साझेदारी की आसार को टटोलना प्रारम्भ किया. कोशिश भी हुए, सोनिया  राहुल ने हस्तक्षेप भी किया, लेकिन अंतत: साझेदारी नहीं हो पाया. बताते हैं अंतिम समय में कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी प्रदेश कांग्रेस पार्टी के नेताओं की राय के साथ जाना उचित समझा  बीएसपी पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी से अलग होती चली गई.

क्यों नहीं हो पाया गठबंधन
राजस्थान में प्रदेश कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष सचिन पायलट का उत्साह हिलोरे मार रहा है. वह राज्य में कांग्रेस पार्टी की गवर्नमेंट के सत्ता में आने के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त हैं. प्रचंड बहुमत से 2013 में राजस्थान की सत्ता में लौटी वसुंधरा राजे गवर्नमेंट के विरूद्ध जबरदस्त गवर्नमेंट विरोधी लहर है. वहीं कांग्रेस पार्टी के नेताओं का मानना है कि बीएसपी का राजस्थान में असर बहुत सीमित है. साझेदारी के लिए 200 विधानसभा वाले राजस्थान में कम से कम 15 सीटें देनी पड़ेंगी. इसका कोई औचित्य नहीं है.कांग्रेस पार्टी महासचिव अशोक गहलोत, वरिष्ठ नेता सीपी जोशी समेत अन्य की राय को मानते हुए कांग्रेस ने प्रदेश के नेताओं के साथ जाना उचित समझा. जबकि बीएसपी कांग्रेस के राजस्थान में साझेदारी करने के बहुत ज्यादा संवेदनशील थी.

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छत्तीसगढ़  म प्र में कांग्रेस पार्टी बीएसपी के साथ साझेदारी की इच्छुक थी. छत्तीसगढ़ को लेकर कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता पीएल पुनिया का राजनीतिक गणित एक आकार ले रहा था. लेकिन इस बीच अजीत जोगी ने बीएसपी प्रमुख से मुलाकात की. जोगी की पार्टी के बीएसपी प्रमुख ने अच्छा इशारा दे दिया. बीएसपी प्रमुख मायावती का पॉलिटिक्स का एक अंदाज है. वह किसी के हाथ में अपनी गर्दन नहीं देती. 90 के दशक से पॉलिटिक्स में दबाव झेलते हुए मायावती को इस कला में महारत हासिल है. उन्हें चिकोटी काटना भी आता है. लिहाजा उन्होंने यह कहते हुए अजीत जोगी के साथ साझेदारी करना उचित समझा कि राज्यों में राजनीतिक दल अपना हित देखें  लोकसभा चुनाव में महागठबंधन जैसी अवधारणा पर जो दिया जाना अच्छा रहेगा. इसी क्रम में मायावती हरियाणा में इनेलो के साथ तालमेल कर चुकी थी. हालांकि छत्तीसगढ़ में रमन सिंह गवर्नमेंट के विरूद्ध चल रहे जबरदस्त गवर्नमेंट विरोधी लहर के कारण कांग्रेस पार्टी ने इसे सरलता से स्वीकार कर लिया.

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बारी म प्र की. राहुल गांधी इसके लिए संवेदनशील थे. उनकी सलाह पर म प्र कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष कमलनाथ ने मायावती से पिछले हफ्ते बातचीत की. बीएसपी के वरिष्ठ नेता सतीश चंद्र मिश्र से कांग्रेस पार्टी के अन्य नेता वार्ता करते रहे. बीएसपी प्रमुख से भी चर्चा हुई. बीएसपी की मांग कोई 50 सीट की थी. कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष राहुल 30 सीट तक बीएसपी को देने पर सहमत थे. बीएसपी का मप्र में कुल वोट बैंक सात फीसदी के करीब का है. पिछले चुनाव में उसे चार सीटें मिली थी. 10 सीट पर उसके उम्मीदवार के वोट 30 हजार से अधिक थे. लेकिन बीएसपी जिन सीटों को मांग रही थी, उसके लिए म प्र कांग्रेस पार्टी के नेता सहमत नहीं हो पाए. अंतत: यहां भी कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने न चाहते हुए प्रदेश कांग्रेस पार्टी के साथ जाना उचित समझा. तालमेल नहीं हो पाया.

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राहुल गांधी पप्पू हैं?

सवाल फिर उठकर खड़ा हो गया. राहुल गांधी पप्पू हैं? फैसला नहीं ले पाते. तभी बीएसपी के साथ कांग्रेस पार्टी का तालमेल नहीं हो पाया. यह सवाल कांग्रेस के मुख्यालय 24 अकबर रोड पर लोगों की जुबान पर उठा. दीन दयाल उपाध्याय मार्ग स्थित बीजेपी मुख्यालय में उठा. वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव भी कहते हैं कि राहुल गांधी में वो क्षमता नहीं दिखाई पड़ रही है. वह अभी कांग्रेस की प्राथमिकताएं, दशा, दिशा नहीं तय कर पा रहे हैं. मुद्दे नहीं तय कर पा रहे हैं. हालांकि राम बहादुर राय का मानना है कि राहुल गांधी ने बहुत कुछ अपने आपको अच्छा किया है, लेकिन इतना भर बहुत ज्यादा नहीं है.बीजेपी के एक महासचिव ने यह कहकर टिप्पणी से मना कर दिया कि राहुल गांधी पर बहुत ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है. कांग्रेस  के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बोला कि एक तरफ राहुल गांधी कम से कम जोखिम लेकर (बसपा से तालमेल) अच्छा नतीजा लाने का तर्क देते हैं  दूसरी तरफ पार्टी के भीतर चल रहे द्वंद का उनके पास कोई उपचार नहीं है.

आप 12 दिसंबर का इंतजार कीजिए

कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी की टीम के एक सदस्य का कहना है कि लोगों को कहने दीजिए आप 12 दिसंबर 2018 का इंतजार कीजिए. सूत्र का कहना है कि इसके बाद राहुल गांधी को पप्पू कहने का शब्द चर्चा में ही नहीं आएगा. राहुल गांधी के साथ करीब-करीब हर दौरे में रहने वाले सूत्र के मुताबिक म प्र में बीएसपी के साथ न जाने का निर्णय लेना सरल नहीं था. लेकिन तमाम बदलावों पर विचार करने के बाद यह फैसला हुआ है. सूत्र का कहना है कि तीनों राज्यों में राहुल गांधी जहां जा रहे हैं, उनकी जनसभा, रोड-शो या किसी भी प्रोग्राम में भरपूर जनसमूह उमड़ रहा है. जबलपुर के गौरीघाट या मुरैना या फिर जहां भी देखिए लोगों का तांता लग रहा है. बताते हैं कांग्रेस पार्टी के महासचिव दिग्विजय सिंह की नर्मदा के किनारे यात्रा, जनजागरण अभियान, ज्योतिरादित्य सिंधिया की ग्वालियर चंबल संभाग में पकड़, कमलनाथ की पूरे म प्र में स्वीकार्यता ने बहुत ज्यादा कुछ बदल कर रख दिया है. पार्टी के एक अन्य नेता का कहना है कि 15 वर्ष के तीन चुनाव में या तो शिवराज सिंह चौहान की गबड़हट पहली बार बढ़ी थी  या तो इस बार उनका कोई दांव चलता दिखाई नहीं दे रहा.पीएम मोदी का भी नहीं.

सपाक्स का खेल

अनुसूजित जाति, जनजाति आरक्षण के विरोध में खड़ी हुई सजाक्स ने म प्र के राजनीतिक खेल में बड़ा परिवर्तन किया है. ब्राह्मण, ठाकुर, वैश्य  अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों ने इसे खड़ा किया है. यह अनुसूचित जाति, जनजाति संशोधन अधिनियम से बहुत ज्यादा नाराज है  बीजेपी गवर्नमेंट को ही इसका जिम्मेदार मान रहा है. राज्य में अनुसूचित जाति के 15.7 प्रतिशत मतदाता हैं. 35 सीटें हैं इनमें से 28 पर बीजेपी के विधायक जीते हैं. वहीं अनुसूचित जनजाति के 20.8 फीसदी मतदाता है 32 सीट पर बीजेपी जीती है. कांग्रेस पार्टी जहां इसे अपने पक्ष में मान रही है, वहीं बीजेपी के रणनीतिकार लगे हैं. देखिए आगे क्या होता है. सजाक्स का दम बीजेपी को बेदम करता है या कांग्रेस पार्टी में जान डालता है, लेकिन एक बात साफ है कि शिवराज गवर्नमेंट के विरूद्ध गवर्नमेंट विरोधी लहर तो है.

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