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जेटली ने कहा, धार्मिक परंपराओं पर सभी धर्मों के विरूद्ध समान रुख अपनाए सुप्रीम कोर्ट

धार्मिक परंपराओं, प्रथाओं, मान्यताओं  प्रक्रियाओं को संविधान प्रदत्त मौलिक एवं समानता के अधिकार से जोड़े जाने का विरोध करते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सुप्रीम न्यायालय पर चुनिंदा दृष्टिकोण (सिलेक्टिव एप्रोच) अपनाने का आरोप लगाया. सबरीमाला मंदिर में स्त्रियों के प्रवेश की इजाजत संबंधी निर्णय का उल्लेख करते हुए उन्होंने बोला कि अगर यह प्रगतिशील  साहसिक निर्णयहै तो इसी आधार पर सभी धर्मों की परंपराओं के विषय में फैसला लिया जाना चाहिए. बताते चलें कि शीर्ष न्यायालय ने बीते दिनों सबरीमाला में 10 वर्ष की बच्चियों से ले कर 55 वर्ष की स्त्रियों के प्रवेश पर प्रतिबंध को समानता का अधिकार  मौलिक अधिकार का उल्लंघन करार दिया था. 

वित्त मंत्री ने एक प्रोग्राम में बोला कि अनुच्छेद 14  21 का पालन महज एक धर्म के लिए क्यों जरूरीहोना चाहिए? शीर्ष न्यायालय अगर प्रगतिशील कदम उठाना चाहती है तो इसके दायरे में सभी धर्मों की पंरपराओं, मान्यताओं  प्रक्रियाओं को शामिल करना चाहिए. अगर धार्मिक मान्यताओं-प्रथाओं को अनुच्छेद 14 की कसौटी पर कसा जाता है तो फिर इसके दायरे से व्यक्तिगत लॉ को क्यों बाहर रखा जाना चाहिए? फिर यह बहुविवाह प्रथा, एक साथ मौखिक रूप से दिया गया तीन तलाक पर लागू क्यों नहीं होना चाहिए? एक धर्मविशेष में जहां धार्मिक स्थलों पर स्त्रियों को प्रवेश निषेध है, उसे भी अनुच्छेद 14 के खांचे में क्यों नहीं रखना चाहिए? सबरीमाला के निर्णय तो तभी साहसिक  प्रगतिशील माना जाएगा जब इसी आधार पर सभी धर्मों की प्रथाओं, मान्यताओं  प्रक्रियाओं को तौला जाए.

जेटली ने शीर्ष न्यायालय के विवाहेतर संबंधों को जायज ठहराने  समलैंगिता को क्राइम की श्रेणी से बाहर रखने संबंधी निर्णय केकुछ अंशों से असहमति जाहिर की. उन्होंने बोला कि शीर्ष न्यायालय ने हाल ही में अपने निर्णय में समलैंगिता को अभिव्यक्ति की आजादी से जोड़ा था. मेरा पर्सनल तौर पर मानना है कि आदमी की सेक्सुअल पसंद को अभिव्यक्ति की आजादी नहीं कह सकते.

बताते चलें कि हाल ही में सेवानिवृत्त हुए सुप्रीम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली पीठों ने अलग-अलग मामले में सबरीमाला में स्त्रियों को प्रवेश की इजाजत दी थी. इसके अतिरिक्त समलैंगिता  विवाहेतर संबंधों को क्राइम की श्रेणी से बाहर कर दिया था. इन फैसलों को शीर्ष न्यायालय के साहसिक  प्रगतिशील फैसलों के रूप में देखा जा रहा है.

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