Tuesday , October 23 2018
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आखिरकार, रूस से दोस्ती की याद आई

पुष्परंजन

रूसी एस-400 ट्रायंफ  सिस्टम में ऐसा क्या है, जिसे पाने के वास्ते दुनिया के विकसित देश भी लालायित रहे हैं? यह एक ऐसा परमाणु सुरक्षा कवच है, जो 32 जगहों से दागी गई मिसाइलों का हवा में ध्वस्त कर सकता है| चारों दिशाओं के वास्ते फिट एक यूनिट में आठ राकेट लांचर होते हैं, जो 400 किलोमीटर की दूरी से दागे गये प्रक्षेपास्त्रों को हवा में नष्ट कर सकते हैं| इस सिस्टम से छूटे रॉकेट 185 किलोमीटर (छह लाख 7000 फीट) ऊंचाई तक लक्ष्य को भेद सकते हैं| ऐसी मारक क्षमता की वजह से इसका नाम एस-400 रखा गया है| रूस, सीरिया में इस सिस्टम का सफल प्रयोग कर चुका है| एस-400 की छह रेजीमेंटल सेट हासिल करने के वास्ते चीन को तीन अरब डॉलर रूस को देना पड़ा है| एस-400 की पहली खेप मई 2018 में चीन पहुंच चुकी थी| चीन ने रूस से एस-400 का सौदा 2014 के आखर में किया था| चार वर्षों में चीन एस-400 हासिल कर अपने को परमाणु हमले से अभेद कर लिया| भारत ने एस-400 आयात की बातचीत चीनी समझौते के प्रकारांतर आरंभ की थी| फिर हम क्यों पीछे रह गये? यह सवाल राष्ट्र के प्रति चिंता व्यक्त करने वालों को अवश्य पूछना चाहिए| एस-400 ट्रायंफ सिस्टम अनिल अंबानी की फैक्ट्री में तो बनना नहीं था कि विवाद होता!

हमारे यहां रक्षा सौदे की $कीमत को लेकर भयानक गोपनीयता बरती जाती है| चीन के हर खास और आम आदमी को पता है कि एस-400 की डील तीन अरब डॉलर की है| इस डील को भारत की प्रतिरक्षा संकलन समिति (डिफेंस एक्वीजिशन कौंसिल) दिसंबर 2015 में हरी झंडी दिखाती है, तो उसकी कीमत होती है, 4.5 अरब डॉलर| अक्टूबर 2016 में गोवा में प्रधानमंत्री मोदी और प्रेसिडेंट पुतिन की उपस्थिति में एस-400 की डील पर बात हुई थी| उस समय मीडिया हाइप जबरदस्त था कि हिन्दुस्तान टाइम्स जैसे अखबार ने 28 सितंबर 2018 के अंक में जानकारी दी कि अक्टूबर 2017 में भारत-रूस की 17वीं शिखर बैठक में पांच यूनिट एस-400 के वास्ते इंटर-गर्वन्मेंटल एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किये जा चुके| तो क्या 5 अक्टूबर 2018 को दोबारा से एस-400 सौदे पर दस्त$खत हुआ है? भारत सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि 17वीं शिखर बैठक में क्या हुआ था| एस-400 के वास्ते भारत को कितना पेमेंट करना है, यह सूचना भी मुऋी में बंद है| क्या यह सही है कि यह सौदा 5. 43 अरब डॉलर का है, जिसमें एस-400 की पांच रेजीमेंटल सेट को 2020 तक आयात किया जाना है? सवाल तो बनता है कि एस-400 की कीमत चीन के तीन अरब डॉलर के मुकाबले बढ़कर 5.43 अरब डॉलर कैसे हो गई? जबकि डिफेंस एक्वीजिशन कौंसिल ने दिसंबर 2015 में 4.5  अरब डॉलर की स्वीकृति एस-400 के लिए दी थी| खैर! ट्रंप के सत्ता में आने के कई महीनों बाद, अमेरिकी संसद ने रूस पर प्रतिबंध लगाने के वास्ते काटसा (काउंटरिंग अमेरिकाऽा एडवर्सरीऽा थू्र सैंग्शंस एक्ट) पारित किया था| काटसा के अनुच्छेद 231 के जरिये अमेरिकी राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया गया कि वह 12 प्रकार के प्रतिबंधों में से पांच को जब चाहे लागू कर सकता है| इस आधार पर ट्रंप प्रशासन ने 2 अगस्त 2017 को रूस, ईरान और उत्तर कोरिया परश्काटसा आयद किया था| इससे जुड़े दो सवाल हैं| पहला, भारत काटसा मानने को बाध्य क्यों हो? दूसरा, 2 अगस्त 2017 से पहले भारत ने रूस, ईरान से जो समझौते किये, वह क्यों रद्द की जाए?चीन ने तो काटसा को डीप फ्रीजर में डाल रखा है| यह भी मजेदार है कि ट्रंप उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन पर फिदा हुए तो प्रतिबंध शिथिल कर दिया| यानी, अमेरिका की देखादेखी बाकी दुनिया फिर से उत्तर कोरिया को गले लगा ले| यह क्या पागलपंथी है? यह तो पूरी दुनिया को हांकने जैसा हो गया कि अमेरिका जिस पर प्रतिबंध लगा दे, आप अपनी डील फौरन रद्द कर दें, गले लगा ले तो आप भी झप्पी लेने लगिये| इस चैधराहट को यदि भारत की लीडरशिप स्वीकार करती है, तो यह देश की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा से खिलवाड़ करना हुआ| अगस्त 2017 में काटसा प्रतिबंध के बाद से रूस ने 53 देशों से हथियार निर्यात के वास्ते समझौते किये| रोसोबोरोन एक्सपोर्ट के डाटा बताते हैं कि 53 देशों से आर्म्स एक्सपोर्ट डील की वजह से रूस की आय में 15 अरब डॉलर का इजाफा हुआ है| मतलब, अमेरिकी चैधराहट उन 53 देशों पर नहीं चली| भारतीय सेना को इस समय अत्याधुनिक हथियारों की जरूरत है| पाकिस्तान लगभग हर हफ्ते भारत को धमकाता है कि हम नाभिकीय हथियारों से लैस देश हैं| ऐसे पाकिस्तान की चोंच बंद करने के वास्ते एस-400 जैसा कवच सबसे अधिक जरूरी है| इसलिए अच्छा यही है कि श्काटसा जैसे जबरदस्ती थोपे अमेरिकी कानून को भारत एक सिरे से खारिज करे|

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ट्रंप यदि खुंदक में आकर भारत पर कोई प्रतिबंध आयद करते हैं, तो उस तरह का कदम खुद के पांव पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है| यों, भारत जैसे कुछेक देशों को प्रतिबंध से बाहर रखने के वास्ते काटसा वेवर प्रस्ताव को अमेरिकी कांग्रेस ने पास किया है, जिसपर राष्ट्रपति ट्रंप का हस्ताक्षर होना बाकी है| अमेरिका सांप भी मरे और लाठी सलामत रहे वाला उपाय नहीं ढूंढता है, तो नुकसान उसी का होना है| भारत उसके लिए सोने की चिड़िया है, यह बात वहां सुरक्षा उद्योग से जुड़े लोग भी समझते हैं| ध्यान से देखें तो 2008 से लेकर 2017 तक अमेरिका सिर्फ आर्म्स डील में भारत से 15 अरब डॉलर कमा चुका है| 2013-14 और 2015-16 में अमेरिका ने भारत से 13 सुरक्षा डील किये, जिससे उसकी 4|4 अरब डॉलर की कमाई हुई| अमेरिका घौंस जरूर देगा कि भारत, रूस से ऐसी डील रद्द करे| यह बात अमेरिका का हम प्याला-हम निवाला इजराइल भी समझता है कि भारत आज की तारीख में दुनिया का सबसे विशाल हथियार बाजार है| दोनों मित्र देश मिलकर भी भारतीय बाजार से रूस को उखाड़ नहीं पाये| स्टॉक होम स्थित इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) के डाटाबेस बताते हैं कि 2010 से 2017 तक रूस, भारत का सबसे बड़ा हथियार निर्यातक देश रहा है| 2017 में भारत ने 68 प्रतिशत मिल्ट्री साजो-सामान रूस से आयात किया था|आमतौर पर रक्षा विश्लेषक सैन्य साजो सामान के निर्यात को ट्रेंड इंडिकेटर वैल्यू (टीआईवी) के जरिये तय करते हैं| श्सिपरी के अनुसार, श्रूस, भारत के लिए सबसे शिखर पर बैठा आर्म्स सप्लायर है| भारत में मिल्ट्री हार्डवेयर का निर्यात देखें, तो रूस की टीआईवी 19. 8 अरब की है| रूस के मु$काबले अमेरिका की टीआईवी 3.05 अरब, और इजराइल की 2.5 अरब टीआईवी है| बावजूद इसके, स्टॉक होम स्थित इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) इससे इंकार नहीं कर सकता कि 2013 से 2017 के बीच अमेरिका, इजराइल का मार्केट शेयर भारत के हथियार बाजार में 26 प्रतिशत बढ़ा है, और रूस का 62 फीसदी घटा है| यह भी एक सच है कि पिछले पांच वर्षों में अमेरिका भारत का दूसरा सबसे बड़ा हथियार निर्यातक देश बना है| दिल्ली समिट के बाद, क्या यह तेज रफ्तार रुकेगी?19 वीं रूस-भारत शिखर बैठक ने दो ध्रुवों पर बैठे अमेरिका और पाकिस्तान को एक साथ चिंता में डाल दिया है| इस बार का समझौता बहुआयामी है| इसकी पृष्ठभूमि कुछ दिनों से बनने लगी थी| दो साल में भारत-रूस के बीच व्यापार 20 फीसदी बढ़ा तो इसके संकेत मिलने लगे थे, फिर श्रशिया प्लस जैसे ज्वाइंट वर्किंग ग्रुप को सक्रिय किया गया था| सिविल न्यूक्लियर और तेल-गैस के क्षेत्र में नई संभावनाएं तलाशी गईं| आखरी बार 2008 में रूस-भारत ने सिविल न्यूक्लियर समझौता किया था| शाकलिन-वन तेल और गैस फील्ड में ओएनजीसी-विदेश की 20 फीसदी हिस्सेदारी भारत ऊर्जा सुरक्षा पहले से मजबूत कर रही थी| अंतरिक्ष में पार्टनरशिप के प्रति दोनों देश एक बार फिर से गंभीर हुए| चंद्रयान-टू से गगनयान इसी साझा सहकार का हिस्सा है| इसरो और रशियन फेडरल स्पेस एजेंसी के बीच 4|25 अरब डॉलर के समझौते को और विस्तार दिया जा रहा है| भारत में डिफेंस इंडस्ट्रियल पार्क खोलने का ऑफर पीएम मोदी ने ट्रंप को नहीं दिया था| साथ में सौर-नाभिकीय ऊर्जा, हाइड्रोकार्बन के क्षेत्र सहयोग का विस्तार सुनकर अमेरिका की भृकुटि तन सकती है|मगर, ऐसा क्या हुआ कि अचानक से मोदी कूटनीति मास्को की ओर मुखातिब हो गई? क्या इस यू-टर्न के वास्ते राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भी कोई निर्देश मिला है कि कूटनीति को व्हाइट हाउस की परिधि से बाहर निकालकर मल्टीपोलर करिये? कूटनीति में इस पैराडाइम शिफ्ट का असर क्या बीजेपी की घरेलू राजनीति पर भी पड़ना है? सीआईए अब भी इस थ्योरी से इंकार नहीं करती कि अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में रूस ने खेल किया था| चुनाव भारत में भी है, तो क्या यहां भी सत्ता प्रतिष्ठान रूस को अपने प्रति सहानुभूति चाह रहा है? इन सवालों पर बहस तो होगी ही| ट्रंप को गलतफहमी थी कि एशिया-प्रशांत, अफ$गानिस्तान में अमेरिका की बनाई लकीर पर भारत चलेगा| इस समय ऐसा होता नहीं दिख रहा है| भारत को अफगानिस्तान में पांव जमाये रखना है| भारत की ऊर्जा जरूरतें तेजी से बढ़ी हैं| ईरान से तेल सप्लाई निरंतर चाहिए| शंघाई कारपोरेशन के देशों की मदद से सेंट्रल एशिया में मार्ग चाहिए, तो इस इलाके में रूस के समर्थन के बिना इसे हासिल करना संभव नहीं है| ट्रंप के आगे और घोड़े के पीछे रहने का जोखिम प्रधानमंत्री मोदी अब और उठा सकने की स्थिति में नहीं हैं| दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास ने रूस से समझौते के बाद रिएक्ट किया, भारत को हम प्रतिबंध से छूट देंगे या नहीं, यह अभी से सुनिश्चित क्यों करें? पलक झपकते, अमेरिका के तेवर बदल गये!

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