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सुमित्रा महाजन का आरक्षण ज्ञान

उपेन्द्र प्रसाद

लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन ने अपने आरक्षण ज्ञान का एक बार फिर रांची की एक बैठक में परिचय दिया है| उस बैठक में सरकारी सेवाओं और शैक्षिक संस्थाओं मे मिल रहे आरक्षण की चर्चा कर रही थीं और कहा कि बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर चाहते थे कि आरक्षण 10 साल के लिए ही हों, लेकिन 10 साल समाप्त होने के पहले उसे 10 साल और बढ़ा दिया जाता है और यह सिलसिला पिछले कई दशकों से चलता आ रहा है| इसके कारण आरक्षण समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रहा है| यह कोई पहली बार सुमित्रा महाजन ने नहीं कहा है| लोकसभा के सदन में अपनी कुर्सी पर बैठकर भी वह इस तरह की बात कर चुकी हैं और अन्य अनेक जगहों पर भी उन्होंने ऐसा ही कहा है| लोकसभा मे जब कोई गलतबयानी करता है, तो स्पीकर उसके बयान को लोकसभा के रिकॉर्ड से हटवा देती हैं, लेकिन जब स्पीकर खुद गलतबयानी करे, तो उसका क्या किया जाय| वैसे उस गलतबयानी को भी कुतर्को के द्वारा सही साबित किया जा सकता है, क्योंकि संविधान में लोकसभा और विधानसभा में की गई आरक्षण की व्यवस्था सिर्फ  दस साल के लिए ही की गई थी| लेकिन लोकसभा स्पीकर ने कभी नहीं कहा है कि विधानसभा और लोकसभा में मिलने वाले आरक्षण को समाप्त किया जाय| वे हमेशा 10 साल की अवधि की चर्चा सरकारी सेवाओं में मिल रहे आरक्षण के संदर्भ में ही करती हैं| कभी गुजरात में ओबीसी में शामिल होने के लिए पाटीदारों को आंदोलन हो, तो कभी महाराष्ट्र में मराठों की ओबीसी बनने की मांग या जाटों को ओबीसी बने की मांग, सुमित्रा महाजन 10 साल वाले प्रावधान का जिक्र करती हैं और कहती हैं, इसे बार बार बढ़ा क्यों दिया जाता है| अब या तो सुमित्रा महाजन खुद आरक्षण व्यवस्था को लेकर भ्रमित हैं या जानबूझकर भ्रामक बयान देती हैं, जिससे यह संदेश जाता है कि सरकारी सेवाओं में आरक्षण की व्यवस्था मात्र 10 साल के लिए ही की गई थी| जबकि यह तथ्यात्मक रूप से पूरी तरह गलत है| सरकारी सेवाओं और उच्च शैक्षिक संस्थानों मे आरक्षण की व्यवस्था कब तक हो, इसके लिए कोई समय सीमा संविधान में तय ही नहीं की गई है| संविधान के अनुच्छेद 15(4) और 16(4) के तहत इस प्रकार के आरक्षण की व्यवस्था की गई है, जिसमें साफ कहा गया है कि नागरिकों के उस पिछड़े वर्ग के लिए, जिसे सरकारी सेवाओं में उचित प्रतिनिधित्व नहीं प्राप्त है, सरकार विशेष व्यवस्था करेगी| यही विशेष व्यवस्था सरकारी सेवाओं में आरक्षण है| शिक्षा के लिए भी यही व्यवस्था की गई है| इसमें कोई अवधि तय नहीं की गई है| हां, इस प्रावधान अनुसार यह तय किया गया है कि यदि वर्ग का पिछड़ापन समाप्त हो जाता है और उसे उचित प्रतिनिधित्व प्राप्त हो जाता है, तो फिर उसे आरक्षण की आवश्यकता नहीं है| आरक्षण को जारी रखने या समाप्त करने की जरूरत को इसी पिछड़ेपन और उचित प्रतिनिधित्व की कसौटी पर कसा जा सकता है, न कि किसी समय सीमा पर| इसी प्रावधान के तहत एससी, एसटी और ओबीसी को आरक्षण दिया जाता है| एससी और एसटी को ही इस अनुच्छेद में पिछड़ा वर्ग कहा गया है और ओबीसी को अन्य पिछड़ा वर्ग मानकर पहले संविधान संशोधन के द्वारा उन्हें भी आरक्षण के दायरे में लाया गया| ओबीसी के संविधान शैक्षणिक और सामाजिक पिछड़ा वर्ग भी कहता है| जिन प्रावधानों से लोकसभा और विधानसभाओं में एससी, एसटी को आरक्षण दिया गया है, वे प्रावधान अलग हैं| उनमेें ही यह कहा गया है कि यह आरक्षण की व्यवस्था 10 साल के लिए होगी| संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू किया गया| जाहिर है, वह व्यवस्था 25 जनवरी, 1960 तक के लिए थी, लेकिन उसे नेहरू सरकार ने 10 साल के लिए और बढ़ा दिया| 1969 में इन्दिरा सरकार ने 10  साल और के लिए आगे बढ़ाया| फिर 1979 में जनता पार्टी की सरकार ने फिर 10 साल के लिए आगे बढ़ा दिया| 1989 में उसे फिर 10 साल के लिए आगे बढ़ाया गया था| 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी| उसने उसे फिर 10 साल के लिए बढ़ाया| 2009 में मनमोहन सरकार थी| उसने उसे अगले 10 साल के लिए फिर बढ़ा दिया| अब यह अवधि 25 जनवरी 2020 तक के लिए है| इसी 10 साल के आरक्षण की चर्चा सुमित्रा महाजन कर रही थीं, लेकिन उन्हें साफ – साफ कहना चाहिए था कि लोकसभा और विधानसभा में आरक्षण का विरोध करती हैं, पर वह विरोध सरकारी सेवाओं में मिल रहे आरक्षण का कर रही थीं| पता नहीं वह जानबूझ कर ऐसा कह रही थीं या वास्तव में उनको संवैधानिक प्रावधानों की जानकारी नहीं है| चूंकि वह एक विद्वान महिला हैं और स्पीकर के पद पर हैं, इसलिए यह मानने को दिल नहीं करता कि उनके पास आरक्षण के प्रावधानों से संबंधित सही जानकारी नहीं है| इसलिए ज्यादा उम्मीद तो यही है कि वह जानबूझकर भ्रम फैला रही हैं कि आंबेडकर सिर्फ 10 सालों के लिए ही आरक्षण के पक्षधर थे| यह कहना भी गलत है कि आम्बेडकर यह चाहते थे कि 10 साल के बाद विधायिका वाला आरक्षण समाप्त हो जाय| दरअसल वह इस तरह का आरक्षण चाहते ही नहीं थे| वे दलितों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल चाहते थे, जिसके तहत दलित प्रतिनिधियों चुनाव में मतदान सिर्फ दलित ही करें| लेकिन उनकी नहीं चली और उन्होंने पूना पैक्ट वाले आरक्षण की पद्धति को लाचारी में स्वीकार किया| उसका प्रावधान भी वह आसानी से नहीं करवा पाए थे| इसके लिए उन्हें गांधी के नाम और पूना पैक्ट का सहारा लेना पड़ा था| अधिकांश सदस्य आरक्षण की इस व्यवस्था के भी विरोधी थे, लेकिन नेहरू और पटेल के दबाव में वे झुके और 10 साल के लिए विधायिका में आरक्षण को स्वीकार कर लिया, लेकिन आम्बेडकर ने कभी और कहीं नहीं कहा कि 10 साल के आरक्षण का वह प्रस्ताव उनका अपना प्रस्ताव था, बल्कि वह एक समझौतावादी प्रावधान था, जिसे बार बार आगे इसलिए बढ़ा दिया जाता है, क्योंकि अभी भी वे कारण समाप्त नहीं हुए हैं, जिन कारणों से उसकी व्यवस्था की गई है|

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