Tuesday , October 23 2018
Loading...

बनने से पहले टूटटा गठबंधन

प्रेम शर्मा

भारत में तीसरा मोर्चा या गठबंधन लम्बे दौर तक टिक नही सकता| छोटे छोटे दलों के अति महात्वकांक्षी नेताओं के कारण जरूरत होने के बावजूद भारत की राजनीति में गठबंधन और तीसरें मोर्चे को कभी पूर्ण आकार नही मिला| स्वार्थो के फलीभूत औंर महतवकांक्षांक्ष के चलते अर्श से फर्श पर आ चुकी कांग्रेस और बसपा का गठबंधन इसी कारण से बनने से पहले टूट गया| कांग्रेस को ना कहकर बीएसपी प्रमुख मायावती श्तीसरे मोर्चे को शक्ल देने में जुट गई हैं| अलग-अलग राज्यों में गैर-कांग्रेसी और गैर-बीजेपी दलों से गठबंधन की शुरुआत उन्होंने बहुत पहले ही शुरू कर दी थी| अब कांग्रेस से गठबंधन न करने की बात कहकर साफ कर दिया है कि आगे भी यही प्रयोग जारी रहेगा| कांग्रेस का साथ ना लेने के निर्णय पर अखिलेश यादव के साथ ही तृणमूल कांग्रेस और आरजेडी ने साथ खड़े होकर भविष्य के संकेत भी दे दिए हैं| बीएसपी नेता मायावती की घोषणा ने आगामी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस-बीएसपी गठबंधन की अटकलों पर विराम लगा दिया| इस गठबंधन की चर्चा वैसे तो उत्तर प्रदेश के लोकसभा उपचुनावों से शुरू हुई थी, लेकिन कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह में सोनिया गांधी और मायावती की नजदीकी दर्शाती तस्वीरें मीडिया में आने के बाद इसे पंख लग गए थे| राजनीति में पब्लिक परसेप्शन हमेशा अहम भूमिका निभाता है, लेकिन वह राजनीतिक तर्कों के भी परे जा सकता है, यह हकीकत जब-तब ही सामने आती है| एक तस्वीर से शुरू हुई इस चर्चा का गुब्बारा कभी न कभी फूटना ही था, सो यह फूटा| मायावती ने साफ कर दिया कि कांग्रेस के साथ वह फिलहाल कोई गठबंधन नहीं करने जा रहीं| पर इस फैसले की जो वजह उन्होंने बताई, वह काफी दिलचस्प है| गठबंधन न होने का ठीकरा उन्होंने दिग्विजय सिंह के सिर पर फोड़ा और राहुल व सोनिया गांधी को आलोचना की जद से बाहर रखा| इसका मतलब फिलहाल यही निकाला जा रहा है कि लोकसभा चुनावों के दौरान वह गठबंधन की संभावना खुली रखना चाहती हैं| भारत में राजनैतिक गठबंधनों के बाद जो ठूट हुई उसके बाद एक दूसरे की किस हद तक छिछालेदर की गई यह किसी से छूपा नही| बहरहाल, आगे जो भी हो, अभी एक बात तो साफ है कि विधानसभा चुनाव में जा रहे तीनों हिंदीभाषी राज्यों में कांग्रेस को बीजेपी के अलावा कुछ ताकत बीएसपी से निपटने में भी लगानी होगी| इस महत्वपूर्ण मुकाबले में चुनाव कार्यक्रम घोषित होने से ठीक पहले हुई इस घोषणा से कांग्रेस को माहौल के स्तर पर थोड़ा नुकसान जरूर हुआ है, लेकिन पहली नजर में लगता है कि दबाव में आकर अगर वह बीएसपी को उसकी वास्तविक शक्ति की कई गुना सीटें दे देती तो इससे उसका और ज्यादा नुकसान होता| राष्ट्रीय पार्टियों की जमीनी ताकत विधानसभा चुनाव से ही तय होती है| वहां किसी अमूर्त लक्ष्य के लिए अपने जमे-जमाए कार्यकर्ता की सीट काट देना पार्टी की कब्र खोद देने जैसा ही है| जाहिर है, आम चुनाव में अगर कोई महागठबंधन सामने आना है तो आत्मसमर्पण को इसकी बुनियाद नहीं बनाया जा सकता| इसके लिए राजनीतिक दलों को अपनी वास्तविक शक्ति के आधार पर सौदेबाजी करनी होगी, और इस शक्ति को आंकने के लिए विधानसभा चुनाव से बेहतर मौका और कोई नहीं हो सकता| छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में चुनाव से पहले अगर कोई अप्रत्याशित बदलाव न देखने को मिले तो दृश्य पिछले एक-दो वर्षों से बिल्कुल स्पष्ट है| बीजेपी इन राज्यों में सरकार विरोधी रुझान का सामना कर रही है जबकि कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि खुद को आपसी टकरावों से मुक्त रखकर अपने जमीनी ढांचे के बल पर इस रुझान का वह ज्यादा से ज्यादा फायदा उठा ले| तिकोनी लड़ाई थोड़ी-बहुत छत्तीसगढ़ में ही दिखेगी, बाकी दोनों राज्यों में मुकाबला सीधा है| लिहाजा कुछ दिन बाद मायावती की इस घोषणा का कुछ खास अर्थ दिखेगा, ऐसा लगता नहीं| इसका मुख्य कारण यह भी है कि भारतीय जनता पार्टी राजनीति के उस दौर से गुजर रही है कि वह किसी भी तीसरे मोर्चे या गठबंधन को बनने से पहले ही ऐसी रणनीति खेल जाती है कि गठबंधन और मोर्चा बनने से पहले ही टूट जाता है| जेडीयू के प्रमुख राष्ट्रीय महासचिव केसी त्यागी यह बात कह चुके हैं कि भाजपा के साथ गठबंधन में उन्हें बिहार के साथ उसकी सीमा से सटी उत्तर प्रदेश की भी सीटें चाहिए| कहा कि झारखंड, राजस्थान और मध्य प्रदेश ऐसे राज्य हैं, जहां समाजवादियों का प्रभाव रहा है| भाजपा अगर पूर्वी यूपी और बिहार सहित इस राज्यों में जेडीयू के जरिए अपना प्रत्याशी उतारेगी, तो इसका सीधा लाभ गठबंधन को होगा| हालांकि, भाजपा के कुछ नेता 2014 के लोकसभा चुनावों की तरह जेडीयू को दूर करना चाहते हैं, लेकिन भाजपा में ऐसे नेता भी हैं, जिन्हें बिहार और उसके सीमावर्ती इलाकों में जेडीयू के भीषण जनाधार की भी जानकारी है| वह नहीं चाहते कि लोकसभा चुनाव में भाजपा और जेडीयू के गठबंधन की एकता पर कोई आंच आए| जेडीयू लोकसभा चुनाव में यूपी की उन सीटों को चिह्नित करना है, जहां पार्टी का जमीनी आधार है या फिर जिन सीटों पर पार्टी को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की गुडविल का फायदा उठा सकती है| इनमें अधिकांश सीटें बनारस, गोरखपुर, वाराणसी, इलाहाबाद जोन की होंगी| जेडीयू के प्रमुख राष्ट्रीय महासचिव केसी त्यागी यह बात कह चुके हैं कि भाजपा के साथ गठबंधन में उन्हें बिहार के साथ उसकी सीमा से सटी उत्तर प्रदेश की भी सीटें चाहिए| झारखंड, राजस्थान और मध्य प्रदेश ऐसे राज्य हैं, जहां समाजवादियों का प्रभाव रहा है| भाजपा अगर पूर्वी यूपी और बिहार सहित इस राज्यों में जेडीयू के जरिए अपना प्रत्याशी उतारेगी, तो इसका सीधा लाभ गठबंधन को होगा| हालांकि, भाजपा के कुछ नेता 2014 के लोकसभा चुनावों की तरह जेडीयू को दूर करना चाहते हैं, लेकिन भाजपा में ऐसे नेता भी हैं, जिन्हें बिहार और उसके सीमावर्ती इलाकों में जेडीयू के भीषण जनाधार की भी जानकारी है| वह नहीं चाहते कि लोकसभा चुनाव में भाजपा और जेडीयू के गठबंधन की एकता पर कोई आंच आए|तीसरे मोर्चे को आकार देने में सबसे मुश्किल वामपंथी दलों को साथ लेने की है| केरल, पश्चिम बंगाल सहित कुछ राज्यों में जहां इन दलों की पकड़ है, वे चुनाव में तीसरे मोर्चे के लिए मुश्किल पैदा कर सकते हैं| वामपंथी दलों ने इस तरह के कोई संकेत भी नहीं दिए हैं| चुनाव बाद भी ये दल किस तरह और किन शर्तों पर साथ आ सकते हैं, यह देखना होगा|बहरहाल कांग्रेस, बसपा, समाजवादी पार्टी सहित कई दलों को लेकर जो गठबंधन और तीसरे मोर्चे की कवायद चल रही है उसका धरातल पर आना न मुमकिन है|

Loading...
loading...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *