Wednesday , November 14 2018
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सुप्रीम न्यायालय ने कहा कि सीलिंग मामले में अधिकारियों का रवैया ऐसा ही रहा तो ध्वस्त हो जाएगी दिल्ली

सीलिंग मामले पर विभिन्न अथॉरिटी के रवैये से नाराज सुप्रीम न्यायालय ने बोला कि अगर दिल्ली ध्वस्त होती है तो हो जाने दो. न्यायालय ने बोला कि अगर अधिकारियों का ऐसा ही रवैया रहा तो एक दिन दिल्ली ध्वस्त हो जाएगी. कठोर नाराजगी भरे लहजे में न्यायालय ने बोला कि जब अथॉरिटी ही कुछ नहीं करना चाहती तो न्यायालय को क्यों परवाह करनी चाहिए? न्यायालय ने यह टिप्पणी राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में गैरकानूनी निर्माण से संबंधित मामले पर सुनवाई के दौरान की.

बृहस्पतिवार को जस्टिस मदन बी लोकुर की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ को बताया गया कि अमर कॉलोनी में गैरकानूनी कब्जा है. सरकारी जमीन, यहां तक कि लैंड एंड डेवलपमेंट कार्यालय की जमीन पर भी कब्जा है. इस पर पीठ ने बोला कि सरकारी जमीन पर कब्जा है, लेकिन उसे हटाने के लिए सरकारी एजेंसी कदम नहीं उठा रही है. क्या गवर्नमेंट गैरकानूनी निर्माण को संरक्षण देना चाहती है.

केंद्र गवर्नमेंट की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एएनएस नादकर्णी ने बताया कि गैरकानूनी निर्माण को लेकर अमर कॉलोनी में सर्वे का कार्य पूरा हो चुका है. इस पर पीठ ने एएसजी से पूछा कि कितने घरों का सर्वे किया गया  सर्वे अगस्त में पूरा हो गया है तो अब तक रिपोर्ट क्यों नहीं दाखिल की गई है? इसके बाद न्यायालय को बताया गया कि 800 घरों का सर्वे किया गया है. इस पर पीठ ने सर्वे की जानकारी मांगी.

जवाब के इंतजार में 15 मिनट रुकी रही कार्यवाही

इसके बाद एक वक्त ऐसा भी आया जब ऑफिसर के जवाब के इंतजार में करीब 15 मिनट तक पीठ को इंतजार करना पड़ा. इस पर एएसजी ने पीठ से माफी मांगी. इस बात से नाराज पीठ ने बोला कि ‘डू नॉट बी सॉरी’. नादकर्णी ने बोला कि अगर अफसरों ने समय पर कार्य पूरा किया होता तो आज यह नहीं होता.

न्यायालय ने यह भी कहा, ‘आप अपने अधिकारियों की क्षमता देखिए. इन्हें जानकारी तक नहीं मिल पा रही है. इसलिए दिल्ली ऐसी है. आपको डाटा को अंतिम रूप देने में महीने लग जाते हैं  उसके बाद विश्लेषण करने में  कुछ महीने. इसके बाद कारण बताओ नोटिस जारी किया जाता जाएगा  उसके बाद कार्रवाई होगी. ऐसे में तो दिल्ली ध्वस्त हो जाएगी. तब आप कहेंगे कि अब याचिका का कोई मतलब नहीं रह गया है. पीठ ने एएसजी को शुक्रवार को इस विषय में आदेश लाने का आदेश दिया है.

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सुप्रीम न्यायालय ने एक बार फिर दोहराया कि सीलिंग या गैरकानूनी निर्माण पर कार्रवाई के लिए 48 घंटे का नोटिस क्यों दिया जाना चाहिए. केंद्र गवर्नमेंट  दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) की ओर से बोला गया कि नोटिस देना महत्वपूर्ण है, क्योंकि दस्तावेजों की जांच करनी होती है. बिना दस्तावेजों की जांच के कार्रवाई नहीं की जा सकती है.

इसके बाद पीठ ने कहा, ‘2006 में सुप्रीम न्यायालय ने रिहायशी इलाके में चल रही व्यावसायिक गतिविधियों को बंद करने का आदेश दिया था, लेकिन अब तक डीडीए  निगम सुस्त है. आप दावा कर रहे हो कि उनके पास लाइसेंस है. लाइसेंस तो एक पन्ने का होता है. ऐसे में कार्रवाई में देरी करने का क्या कारण है.’ डीडीए की ओर से पेश एएसजी पीएस नरसिंहा ने बोला कि बिना दस्तावेजों को वेरिफाई किए कार्रवाई कैसे की जा सकती है. यही कारण है कि 48 घंटे का वक्त दिया जाता है.

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