Saturday , March 23 2019
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मोदी-मुक्त 2019 के संघ के इशारे

मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में हार के धक्के से मोदी-शाह जोड़ी की छवि को बचाने की भाजपा की सारी कोशिशें नाकाम होती नजर आती हैं| भाजपा के गढ़ माने जाने वाले तीन-तीन हिंदीभाषी राज्यों में, आम चुनाव से ऐन पहले हार का यह झटका इतना तगड़ा निकला है कि सत्ताधारी पार्टी तथा मोदी सरकार के प्रवक्ताओं की इस आशय की तमाम दलीलें बेअसर साबित हो गयी हैं कि राज्यों के चुनाव, राज्यों के मुद्दों पर होते हैं, उनमें हार-जीत को केंद्र सरकार पर जनादेश नहीं माना जा सकता है, आदि| इस बड़ी हार की आंच आखिरकार, भाजपा के मौजूदा केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंचती लग रही है| पूर्व-भाजपा अध्यक्ष और मोदी सरकार में वरिष्ठड्ढ मंत्री, नितिन गडकरी के हाल के बयानों के कम से कम इतने अर्थ से तो कोई इंकार कर ही नहीं सकता है|

गडकरी ने पुणे में एक बैंक के आयोजन में प्रस्तुत प्रसंग से अलग हटकर, इसकी शिकायत की थी कि राजनीतिक नेतृत्व हार की जिम्मेदारी लेने से बचना चाहता है, जबकि विफलता की जिम्मेदारी लेने से ही नेतृत्व की संगठन के प्रति वफादारी का पता चलता है| उन्होंने इस पर भी खेद जताया था कि जीत का श्रेय लेने वाले कितने ही निकल आते हैं, जबकि हार लावारिस होती है| बेशक, इस बयान के चर्चा में आने के बाद, गडकरी ने मीडिया तथा विपक्ष पर अपने बयान को तोड़-मरोड़कर पेश करने का आरोप ही नहीं लगाया था, उन पर अपने और पार्टी के बीच में खाई पैदा करने की कोशिश करने का भी आरोप लगाया था| इतना ही नहीं, गडकरी ने इसका एलान भी करना जरूरी समझा था कि उनकी नेतृत्व संभालने की कोई महत्वाकांक्षा नहीं है, पार्टी ने उन्हें जो जिम्मेदारी सौंपी है उससे वह संतुष्टड्ढ हैं और भाजपा 2019 का चुनाव नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ही लड़ेगी और जीतेगी| लेकिन, जैसा कि बाद में आए गडकरी के  ही बयानों से स्पष्टड्ढ हो गया, उन्होंने कम से कम अपनी इस मांग का खंडन करने की कोई जरूरत नहीं समझी थी कि पार्टी नेतृत्व को हार की जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए और जिम्मेदारी दूसरों पर डालने की कोशिश नहीं करनी चाहिए|वास्तव में ऐसा लगता है कि पुणे के बयान को लेकर गडकरी ने जो सफाई देना जरूरी समझा था, उसका उतना संबंध इस बयान में जो कहा गया था उससे नहीं था, जिनता कि उसकी पृष्ठड्ढभूमि में रहे एक और प्रसंग से था| यह प्रसंग, महाराष्टड्ढ्र सरकार के एक कृषि संबंधी निकाय के अध्यक्ष किशोर तिवारी से जुड़ा था, जिन्हें संघ परिवार के काफी नजदीक समझा जाता है| तीन राज्यों की हार के फौरन बाद और इस हार के लिए मोदी-शाह जोड़ी को सीधे-सीधे जिम्मेदार ठहराते हुए, तिवारी ने आरएसएस प्रमुख भागवत को और नंबर-दो भैयाजी जोशी को चिऋड्ढी लिखकर उनसे मांग की थी कि इस जोड़ी को हटाकर भाजपा, नितिन गडकरी के नेतृत्व में चुनाव में उतरेगी, तभी 2004 की हार को दुहराने से बचा जा सकेगा| कहने की जरूरत नहीं है कि तिवारी ने मोदी-शाह के नेतृत्व से संघ-भाजपा की कतारों के बढ़ते हिस्से की निराशा को ही स्वर दिया था, जिसका भाजपा के नेतृत्व पर हावी इस जोड़ी ने आवश्य की काफी गंभीरता से नोटिस लिया होगा| इसी संदर्भ में पुणे के बयान की सफाई के बहाने से गडकरी ने मोदी को यह भरोसा दिलाने की ही कोशिश की थी कि, उनके गिर्द प्रधानमंत्री के स्तर पर विकल्प रखने की कोई कोशिश नहीं की जा रही थी| इसीलिए, उन्होंने प्रसंग से बाहर जाकर, इसका भरोसा दिलाना जरूरी समझा था कि 2019 चुनाव भाजपा, नरेंद्र मोदी के ही नेतृत्व में लड़ेगी| बहरहाल, पुणे के बयान की सफाई के फौरन बाद, सरकारी आयोजनों में और खासतौर पर खुफिया अधिकारियों को संबोधित करते हुए अपने बयान के जरिए गडकरी ने यह स्पष्टड्ढ कर दिया है कि वह अपने पुणे के बयान के इस मूल आशय पर कायम हैं कि नाकामी की जिम्मेदारी नेतृत्व को स्वीकार करनी चाहिए, जो वह नहीं कर रहा था| वास्तव में खुफिया अधिकारियों को संबोधित करते हुए गडकरी अपने पहले के बयान से एक कदम आगे बढ़ गए और उन्होंने सीधे पार्टी अध्यक्ष के पद का उल्लेख करते हुए कहा कि अगर पार्र्टी के विधायक या सांसद अच्छा काम नहीं कर रहे हैं, तो इसकी भी जिम्मेदारी पार्टी अध्यक्ष पर ही आती है| पुणे के बयान के बाद के  खंडन के साथ जोड़कर देखा जाए तो ऐसा लगता है कि गडकरी फिलहाल, नरेंद्र मोदी को नहीं छेड़ना चाहते हैं और उन्होंने अपने हमले की धार, भाजपा के अध्यक्ष के रूप में अपने परवर्ती, अमित शाह पर ही केंद्रित कर रखी है|

गडकरी और आरएसएस के संबंधों के जानकारों की यह धारणा शायद गलत नहीं है कि, इस हमले के पीछे आरएसएस का अनुमोदन हो सकता है| भले ही आरएसएस ने शाह को लेकर कोई नाराजगी नहीं जतायी हो, फिर भी संघ-भाजपा के कार्यकर्ताओं में पैदा हुई निराशा को देखते हुए, उसने इस पर जोर देने में कोताही नहीं की है कि हार के कारणों की लीपा-पोती नहीं, पूरी गंभीरता से समीक्षा की जानी चाहिए| ऐसा लगता है कि मोदी-शाह के नेतृत्व की, अगले महीने होने जा रही भाजपा की राष्टड्ढ्रीय परिषद की बैठक को महा-अधिवेशन में बदलने के अपने फैसले के जरिए, इसी बढ़ते दबाव की काट करने की और पार्टी पर अपनी मजबूत पकड़ का प्रदर्शन करने की ही तैयारी है| इसी के हिस्से के तौर पर मोदी सरकार इस अधिवेशन के ऐन पहले किसानों के लिए रियायत जैसी कुछ घोषणाएं भी कर सकती है| इस अधिवेशन में कोई नाटकीय उठा-पटक न भी हो तब भी अचरज की बात नहीं होगी कि इस अधिवेशन में भाजपा कार्यकर्ताओं की इन चिंताओं को भी स्वर मिले और अगर ऐसा होता है तो यह आरएसएस के लिए किसी दूसरे विकल्प आगे बढ़ाने में मददगार हो सकता है| संघ के कुछ जानकारों को तो लगता है कि बात सिर्फ इतनी भी नहीं है| असल में, तीन राज्यों की हार से पहले भी, मोदी राज की घटती लोकप्रियता की पृष्ठड्ढभूमि में, इसकी चर्चा होती रही थी कि 2019 के चुनाव में अगर भाजपा का बहुमत नहीं आता है और दूसरी पार्टियों के समर्थन के बिना सरकार नहीं चलायी जा सकती है, तो उसके लिए आरएसएस का प्लान-बी तैयार है| इस प्लान के तहत, अन्य पार्टियों के प्रति नरम रुख रखने वाले गडकरी को आरएसएस नेतृत्व के लिए आगे कर सकती है| बेशक, इस प्लान बी के रास्ते की मुश्किलें कम करने के लिए भी, भाजपा पर शाह-मोदी जोड़ी के शिकंजे को कमजोर करना जरूरी होगा| वर्ना चुनाव के बाद अगर अनिश्चिततापूर्ण हालात हुए तो मौजूदा नेतृत्व जोड़ी तो, आरएसएस के लिए प्लान-बी को लागू करना ही मुश्किल बना सकती है| यह सब इसलिए और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि मोदी के आमतौर पर टूटते जादू की पृष्ठड्ढभूमि में तीन राज्यों के धक्के और उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्टड्ढ्र, बंगाल आदि अधिकांश बड़े राज्यों में बनते विपक्ष के चुनावी समीकरणों को देखते हुए, आरएसएस ने तो एक तरह से यह मान भी लिया लगता है कि 2019 के चुनाव में, एनडीए को बहुमत मिलना मुश्किल है और त्रिशंकु लोकसभा आने की ही ज्यादा संभावना है| आरएसएस के मुखपत्र, आर्गनाइजर  के ताजा अंक में बाकायदा त्रिशंकु लोकसभा की आशंका जताया जाना और उससे पैदा होने वाली कम से कम कुछ समय की राजनीतिक अस्थिरता के नुकसान गिनाए जाना, आरएसएस के कम से कम एनडीए के बहुमत खो देने को एक वास्तविक संभावना मान रहे होने को तो दिखाता ही है| ऐसा लगता है कि ऐसे हालात के लिए आरएसएस ने गंभीरता से गडकरी को आगे बढ़ाने की कवायद शुरू कर दी है, जिनकी संघ के प्रति वफादारी असंदिग्ध है, जबकि दूसरी पार्टियों के प्रति उनका अनाक्रामक तेवर, संघ की नजरों में एनडीए के बाहर से समर्थन जुटाने के रास्ते खोल सकता है| खैर! यह देखना दिलचस्प होगा कि मोदी-शाह की जोड़ी संघ के इस पैंतरे से कैसे निपटती है| फिलहाल तो गडकरी के बयानों पर आधिकारिक स्तर पर कोई चर्चा नहीं होने देना ही उसकी कार्यनीति है|

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