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पड़ोस में भू-राजनीतिक समीकरण

आलोक कु. गुप्ता

बांग्लादेश में बीते 30 दिसंबर को हुए 11वें संसदीय चुनाव में शेख हसीना और उनकी पार्टी आवामी लीग की अप्रत्याशित जीत हुई| उन्हें वहां की 300 सदस्यीय संसद में 288 सीटों पर जीत मिली| यह अपने आप में एक रिकॉर्ड है, जिसमें विपक्षी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) का सफाया हो गया|आरोप-प्रत्यारोप के मध्य विपक्ष ने परिणाम को खारिज करते हुए चुनाव प्रक्रिया को नकार दिया है| यह एक संसदीय लोकतंत्र की प्रथा रही है| इस बार विपक्ष एक गठबंधन ‘नेशनल यूनिटी फ्रंट’ (जातीय ओकिया फ्रंट) बनाकर आवामी लीग को चुनौती दे रहा था, जिसका नेतृत्व बीएनपी कर रही थी और गोनो फोरम, जेएसडी, नागरिक फ्रंट और कृषक श्रमिक जनता लीग जैसे अन्य दल शामिल थे| गौरतलब हो कि बीएनपी की प्रमुख खालिदा जिया भ्रष्टाचार के मामले में जेल में बंद हैं| चुनाव के दौरान हिंसा और आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी चला, जिसमें लगभग 17 लोगों की जान भी गयी| सत्ताधारी दल और नेताओं पर मानवाधिकार हनन के आरोप भी लगाये गये|

लगभग 16 करोड़ जनसंख्या वाले बांग्लादेश की जातीय संसद (पार्लियामेंट) 350 सदस्यों वाली है, जिसमें 300 सीटों के लिए प्रत्यक्ष आम चुनाव होते हैं और 50 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं| प्रत्यक्ष चुनाव ‘जो पहला सो मीर’ की तर्ज पर होता है| पचास सीटों का वितरण चुनाव में भाग लेनेवाले दलों को जितने प्रतिशत मत प्राप्त होते हैं, उसके अनुपात में किया जाता है| परंतु सरकार बनाने के लिए किसी भी दल को 151 सांसदों की जरूरत होती है| करीब 71 वर्षीय शेख हसीना, जो आवामी लीग का 1981 से नेतृत्व कर रही हैं, चैथी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेंगी| इस चुनाव में पहली बार लगभग छह संसदीय क्षेत्रों में इवीएम का इस्तेमाल भी किया गया| चुनाव में शेख हसीना का मुख्य मुद्दा था बांग्लादेश की पिछले दशक में आर्थिक उन्नति और सराहनीय जीडीपी ग्रोथ| उनके कार्यकाल में कपड़ा उद्योग के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई है और वर्तमान में चीन के बाद बांग्लादेश इस क्षेत्र में विव का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक बन गया है| शेख हसीना ने म्यांमार से आनेवाले लगभग 10 लाख रोहिंग्या शरणार्थियों की समस्या को भी प्रभावी ढंग से संभाला था| भारत के साथ अपने संबंधों की प्रगाढ़ता को कायम रखते हुए चीन के साथ भी सामंजस्य बनाये रखा| उनकी विदेश नीति भी प्रभावी एवं सशक्त रही| उनकी जीत केवल शानदार ही नहीं, बल्कि सत्ता-विरोधी लहर की चुनौती झेल रही हसीना को उनके द्वारा किये गये कार्य और विकास पर आम-जनता की स्वीकृति की इबारत भी है| ऐसा तब संभव हो सका, जब उन पर मीडिया और विपक्ष के लोगों पर कड़े दंडात्मक करवाई के लिए मानवाधिकार हनन के गहन आरोप लगाये जाते रहे| पिछले दस वर्षों के बाद इस चुनाव में लगभग सभी दलों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और चुनाव में मतदाताओं को लुभाने के लिए प्रचार भी किये| इस चुनाव में लगभग 39 राजनीतिक दलों ने अपने भाग्य आजमाये| बांग्लादेश चुनाव परिणाम भारत-बांग्लादेश के द्विपक्षीय संबंधों के लिए भी अच्छी खबर है| गौरतलब है कि 2014 के विवादास्पद संसदीय चुनाव में जब विव के ज्यादातर राष्ट्र विरोध जता रहे थे, तब भारत ही बांग्लादेश के पक्ष में खड़ा था| परंतु इस बार ऐसा कुछ भी देखने को नहीं मिला| यह परिणाम दक्षिण-एशिया के बदलते भू-राजनितिक समीकरण का द्योतक है| मालदीव में सोलिह की जीत के साथ पड़ोस से भारत के लिए अच्छी खबर आने लगी है| पिछले वर्ष ही नेपाल में वाम गठबंधन की जीत हुई, जो भारत के लिए अच्छी खबर नहीं थी, क्योंकि ऐसा चीन के हस्तक्षेप के कारण ही संभव हो पाया था| श्रीलंका में भी लगभग दो महीने तक राजनीतिक उथल-पुथल रही और ऐसा लगने लगा था कि एक बार फिर से महिंदा राजपक्षे की सरकार सत्ता पर काबिज हो जायेगी, जिसका चीन के साथ प्रगाढ़ संबंध है|ऐसा होता तो श्रीलंका पर फिर से भारत की पकड़ ढीली पड़ जाती| एक लंबे राजनीतिक संकट के बाद पूर्व सरकार वापस सत्ता पर कायम हो गयी| भूटान के साथ भारत का संबंध एक स्वर्णिम युग के दौर से गुजर रहा है| पिछले वर्ष जुलाई में भूटान के राजा और फिर दिसंबर में प्रधानमंत्री शेरिंग का भारत दौरा हुआ, जिसके मार्फत संबंधों में साझा-सुरक्षा व्यवस्था को और दुरुस्त करने के प्रयास हुए| साथ ही विकास के अन्य कार्यक्रम पर भी वार्ता हुई| पाकिस्तान में भी इमरान खान की सरकार के आने के बाद से भारत के साथ वार्ता प्रारंभ करने की ललक दिख रही है| कुल मिलाकर भारतीय पड़ोस की भू-राजनीति भारत के पक्ष में दिख रही है, जिसके प्रति भारत को सक्रीय रहकर अपने हित में बनाये रखने की आवश्यकता है|बीएनपी का गठबंधन के तहत चुनाव में हिस्सा लेना बांग्लादेश में लोकतंत्र के परिपक्व होने की ओर इंगित करता है| संवैधानिक संकट को संभालने के बहाने भारत का पड़ोस में हस्तक्षेप वहां की जनता और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को समझ में आता है|

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अतः भारत के ‘पड़ोस पहले’ की विदेश नीति का मतलब ‘पड़ोस में हस्तक्षेप’ नहीं, बल्कि ‘पड़ोस में निवेश’ होना चाहिए| भारत अगर पड़ोस में विपक्षी दलों के लिए मुद्दा बनता है, तो यह भारत के लिए शुभ नहीं है| भारत को मालदीव और बांग्लादेश में हुए भू-राजनीतिक लाभ को संभालने और इस अनुभव को राजनय में शामिल करना भी जरूरी है|

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