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क्यों फिसल रहा है विव व्यापार संगठन

भरत झुनझुनवाला

वर्ष 2015 में भारत ने जापान से आयातित कुछ विशेष प्रकार के स्टील पर आयात कर बढ़ा दिए थे| भारत का कहना था कि अपने घरेलू स्टील उद्योगों को बचाने के लिए जापान से हो रहे स्टील के आयात पर आयात कर बढ़ाना जरूरी था| हाल में विव व्यापार संगठन यानि डब्ल्यूटीओ ने निर्णय दिया है कि भारत द्वारा लगाये गये ये आयात कर अनुचित थे| डब्ल्यूटीओ का कहना है कि घरेलू उद्योगों को बचाने के लिए अयात कर तभी बढ़ाए जा सकते हैं जब आयातों में तीव्र वृद्धि हो जो कि घरेलू उद्योग के लिए कठिनाई पैदा करे| घरेलू उद्योगों को हानि हो तो भी सामान्य रूप से बढ़ रहे आयातों पर आयात कर नहीं बढ़ाए जा सकते हैं| इसी प्रकार कुछ वर्ष पूर्व अमेरिका ने भारत से आयातित स्टील पर भी आयात कर बढ़ा दिए थे| तब भी डब्ल्यूटीओ ने निर्णय दिया कि था कि अमेरिका द्वारा लगाये गये आयात कर अनुचित हैं| इसी क्रम में चीन और अमेरिका में चल रहा ट्रेड वार को भी देखा जाना चाहिए| अमेरिका का कहना है कि चीन के सस्ते आयात उसके अपने घरेलू उद्योगों को नष्ट कर रहे हैं| इसलिए राष्ट्रपति ट्रम्प ने चीन से आयातित माल पर आयात कर बढ़ा दिए हैं| इन प्रकरणों से स्पष्ट होता है कि प्रमुख देशों के लिए मुक्त व्यापार अब लाभ का सौदा नहीं रह गया है| अब इससे उन्हें हानि दिखने लग गई है| इसलिए तमाम देश मुक्त व्यापार से पीछे हट रहे हैं| वर्ष 1995 में जब डब्ल्यूटीओ कि संधि पर दस्खत किये गये थे उस समय अमेरिका मुक्त व्यापार का पुरजोर समर्थन कर रहा था| आज वही अमेरिका उसी मुक्त व्यापार का विरोध कर रहा है| आज ऐसा क्या हो गया है कि अमेरिका के ही नहीं बल्कि तमाम प्रमुख देशों की चाल में परिवर्तन ला रहा है?

विषय को समझने के लिए मुक्त व्यापार के सिद्धांत को समझना होगा| मुक्त व्यापार का सिद्धांत कहता है कि जो देश जिस माल को सस्ता बनाता है उसे उसी माल को बनाना चाहिए और दूसरे देशों से शेष माल का आयात करना चाहिए| जैसे मान लीजिये अमेरिका में सेब का उत्पादन सस्ता होता है और भारत में चीनी का| ऐसे में अमेरिका को सेब का उत्पादन करना चाहिए और चीनी का आयात करना चाहिए जबकि भारत को चीनी का उत्पादन चाहिए और सेब का आयात करना चाहिए| ऐसा करने से अमेरिकी सस्ते सेब और भारतीय सस्ती चीनी भारत और अमेरिका दोनों के उपभोक्ताओं को मिल जायेगी| ऐसा मुक्त व्यापार दोनों देशों के लिए लाभप्रद है| अब इसमें थोड़ी अलग परिस्थिति पर विचार करें| मान लीजिये अमेरिका कंप्यूटर सस्ता बनता है और भारत चीनी सस्ती उत्पादित करता है| मुक्त व्यापार के सिद्धांत के अनुसार भारत को अमेरिका से कंप्यूटर खरीदने चाहिए और चीनी का निर्यात करना चाहिए| लेकिन अमेरिका विव में अकेला कंप्यूटर का निर्माता है जैसे आज अमेरिका की माइक्रोसॉफ्ट कम्पनी विव में अकेली विंडोज साफ्टवेयर ऑपरेटिंग सिस्टम की निर्माता है| ऐसे में माइक्रोसाफ्ट के लिए विंडो साफ्टवेयर को मनचाहे ऊंचे दाम पर बेचना संभव होता है चूंकि उसका बाजार पर एकाधिकार अथवा मोनोपोली है| इस परिस्थति में मुक्त व्यापार का चरित्र बदल जाता है| अमेरिका विन्डोज साफ्टवेयर को पूरे विव को महंगा बेच सकता है और भारत से चीनी, बंगलादेश से चावल, वियतनाम से कॉफी आदि सस्ते माल का आयात कर सकता है| ऐसा मुक्त व्यापार अमेरिका के लिए दोहरे लाभ का सौदा है| एक तरफ उसे विन्डोज  साफ्टवेयर के निर्यात से भारी आय होगी तो दूसरी तरफ चीनी, चावल और काफी सस्ती उपलब्ध हो जाएंगे| ऐसी परिस्थिति में विव व्यापार उन्हीं देशों के लिए लाभप्रद होता है जिनके पास एकाधिकार वाले कुछ उत्पाद हैं जिन्हें वे मनचाहे दाम पर निर्यात कर सकें| 1995 में जब डब्ल्यूटीओ संधि बनाई गई उस समय अमेरिका में तमाम एकाधिकार वाले उत्पादों का आविष्कार हो रहा था| विन्डो साफ्टवेयर उसी समय की देन है|  इसके आलावा इन्टरनेट के राउटर, बिजली से चलने वाली कारें तथा अन्य तमाम नये हाईटेक उत्पाद अमेरिका में बन रहे थे| इनका अमेरिका ऊंचे दामों में निर्यात कर रहा था और विव से सस्ते माल आयात कर रहा था| अमेरिका उस समय मुक्त व्यापार को बढ़ावा दे रहा था| उस समय हमारे नेता मुक्त व्यापार के इस पक्ष को भूल गये कि मुक्त व्यापार के अंतर्गत एकाधिकार वाले माल का आयात करके वे घाटा खायेंगे| अब अमेरिका की परिस्थिति बदल गई है| वर्तमान में अमेरिका में नए आविष्कार नहीं हो रहे हैं| इसलिए अमेरिका और भारत की परिस्थिति सेब और चीनी जैसी बराबरी की हो गई है| साथ-साथ अमेरिका में श्रमिकों के वेतन अधिक और भारत में श्रमिकों का वेतन कम है| भारत में बना माल अमेरिका की तुलना में सस्ता पड़ता है| इसलिए अमरीकी उद्योग भारत जैसे देशों के सामने खड़े नहीं हो पा रहे| यही कारण है कि अमेरिका आज मुक्त विव व्यापार से पीछे हट रहा है| सारांश यह है कि मुक्त व्यापार का सिद्धान्त तभी तक सफल होता है जब हर माल के तमाम उत्पादक हों और इनकी प्रतिस्पर्धा से विव बाजार में सभी माल का दाम न्यून बना रहे जैसे सेब और चीनी के| वही मुक्त व्यापार उस परिस्थिति में सफल नहीं होता जहां कुछ माल को विशेष देश मनचाहे दाम पर बेच सकें| तब मुक्त व्यापार ऐसे देशों के लिए लाभप्रद होता है और जो देश सामान्य माल जैसे चीनी और काफी उत्पादन करते हैं उनके लिए वह घाटे का सौदा हो जाता है| वर्तमान में अमेरिका समेत सम्पूर्ण विव की परिस्थिति इसी प्रकार की हो गई है| विव के किसी भी देश के पास कोई विशेष तकनीकी आविष्कार नहीं है जिनको वे ऊंचे दाम में बेच कर लगातार भारी मुनाफा कमा सकें| इसलिए विव के सभी प्रमुख देश मुक्त व्यापार से पीछे हट रहे हैं| इनमें उन देशों के लिए विशेष संकट है जिनके वर्तमान में वेतन अधिक हैं जैसे अमेरिका और जापान के| इन देशों के लिए अपने माल को विव बाजार में बेचना कठिन होता जा रहा है क्योंकि वही माल भारत और वियतनाम सस्ता बनाकर विव बाजार में बेच रहे हैं| हमें समझ लेना चाहिए कि मुक्त व्यापार का तार्किक परिणाम होता है कि विव के सभी देशों में श्रमिक के वेतन बराबरी पर आएंगे|चूंकि अमेरिका और जापान अपने श्रमिकों के वेतन विव के एक स्तर पर लाने को तैयार नहीं हैं, वे अपने श्रमिकों का वेतन ऊंचा बनाए रखना चाहते हैं, इसलिए अमेरिका और जापान जैसे विकसित देश विशेष रूप से मुक्त व्यापार से पीछे हटेंगे और आने वाले समय में हम मुक्त व्यापार का विघटन देखेंगे| भारत को भी समय रहते मुक्त व्यापार से पीछे हटने की तैयारी करनी चाहिए और अपने घरेलू उद्योगों को संरक्षण देकर अपनी जनता का हित हासिल करना चाहिए|

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