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कश्मीर के लिए नेहरू जैसी बड़ी सोच अपनाना होगा

शेष नारायण सिंह

कश्मीर के बारे में वहां के कुछ नेताओं के अजीबोगरीब बयानों के बाद कश्मीर फिर चर्चा में हैं| देश की हर समस्या के लिए जवाहरलाल नेहरू को जिम्मेदार ठहराने वालों के सामने भी दुविधा है| जब जवाहर लाल नेहरू और सरदार पटेल के सामने कश्मीर समस्या आई थी तो देश की आर्थिक और सैनिक तैयारी बिल्कुल नहीं थी| इंग्लैण्ड और अमेरिका भारत का विरोध कर रहे थे| अंग्रेजों से वफादारी के इनाम के रूप में मुहम्मद अली जिन्ना को पाकिस्तान की बख्शीश मिल चुकी थी, जिन्ना किसी भी कीमत पर जम्मू-कश्मीर पर कब्जा करने के चक्कर में थे और जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन राजा पाकिस्तान के साथ जाने के बारे में विचार कर रहे थे| लेकिन सरदार पटेल ने न केवल जम्मू-कश्मीर का भारत में बिना शर्त विलय करवाया, बल्कि अमेरिका और इंग्लैण्ड की मर्जी के खिलाफ पाकिस्तान को भी उसकी औकात दिखा दी| आज भारत दुनिया में एक बड़ी अर्थशक्ति, सैन्य शक्ति, परमाणु शक्ति और अंतरिक्ष शक्ति के रूप में स्थापित हो चुका है| अमेरिका और ब्रिटेन से भारत की दोस्ती है लेकिन फिर भी कश्मीर में एक बड़ी समस्या पैदा हो गई है| अलगाववादी नेताओं की जमात, हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के लोग तो पाकिस्तान का जयकारा लगाते ही रहते थे, अब भारत के साथ रहने की बात करने वाले नेता भी भारत से अलग होने की धमकी देने लगे हैं| जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्रियों महबूबा मुफ्ती, फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला के ताज् बयान बहुत ही निराशाजनक हैं| यह तीनों ही नेता बीजेपी के साथ कई अवसरों पर सरकार में शामिल रह चुके हैं| संविधान के अनुच्छेद 35 ए के मामले ने इतना तूल पकड़ लिया है कि जम्मू-कश्मीर के होशमंद नेता भी अलग होने की बात करने लगे हैं| इसके लिए काफी हद तक मौजूदा सत्ताधारी पार्टी और उसके नेता जिम्मेदार हैं| बीजेपी के नेता चुनावों के समय कश्मीर को मुद्दा बनाते हैं, उसके कारण उनको पाकिस्तान और मुसलमान को निशाने पर लेने में आसानी होती है| बाद में उसका जिक्र उतनी शिद्दत से नहीं करते| लगता है कि इस बार भी कोशिश वही थी लेकिन मामला बहुत आगे बढ़ गया| जम्मू-कश्मीर के वे नेता भी भारत-विरोधी बयान देने लगे जो कल तक राज्य में बीजेपी के साथ सरकार चला रहे थे| देश की हर समस्या के लिए जवाहर लाल नेहरू को जिम्मेदार बताने वाले नेताओं को अब यह समझ लेने की जरूरत है कि कश्मीर में अगर हालात सामान्य करना है तो नेहरू की किताब के पन्ने ही पढ़ने पड़ेंगे| आज की सत्ताधारी पार्टी बीजेपी जब भी विपक्ष में रही है, कश्मीर में संविधान के आर्टिकिल 370 का  विरोध करती रही है लेकिन जब भी सत्ता में आई  है अलग बात करती है| इस बार मामला थोड़ा अटक गया है| बीजेपी केंद्र में सत्ता में है और राज्य में भी राष्ट्रपति शासन के रास्ते उसी की सत्ता है| चुनाव के चक्कर में कश्मीर के नाजुक मसलों को उठा दिया और अब कश्मीर की राजनीति एक बहुत ही संवेदनशील मुकाम पर पहुंच गई है| कश्मीर को भारत का अखंड हिस्सा मानने वाले कश्मीरी नेता भी अब अपना प्रधानमंत्री बनाने और आजादी की बात करने लगे हैं| हालत इतनी चिंताजनक है कि $फौरन से पेशतर केंद्र सरकार को जरूरी $कदम उठाने पड़ेंगे| कहीं ऐसा न हो कि हर भाषण में कश्मीर की बात करके और प्रेस कांफ्रेंस करके ध्रुवीकरण तो हो जाए लेकिन कश्मीर की हालात बद से बदतर हो जाए| इन हालात में जरूरी यह है कि कश्मीर की समस्या के समाधान के लिए जवाहर लाल नेहरू की राह को अपनाया जाय जिन्होंने 27 मई 1964 को अपने मृत्यु के दिन भी कश्मीर समस्या के समाधान के लिए लगातार प्रयास किया था| हालांकि उन्होंने शेख अब्दुल्ला को 1953 में गिरफ्तार कर लिया था लेकिन उनको मालूम था कि कश्मीर की समस्या के हल के लिए कश्मीर के सबसे बड़े नेता को शामिल करना जरूरी होगा| इसी सोच के तहत उन्होंने शेख अब्दुल्ला को रिहा किया और पाकिस्तान जाकर समाधान की संभावना तलाशने का काम सौंपा था| शेख अब्दुल्ला पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर गए और वहां लोगों से बातचीत का सिलसिला शुरू किया| 27 मई 1964 के, दिन जब मुजफराबाद में उनके लिए दोपहर के भोजन के लिए की गई व्यवस्था में उनके पुराने दोस्त मौजूद थे, जवाहर लाल नेहरू की मौत की खबर आ गई| सब किया धरा बर्बाद हो गया| उसके बाद कश्मीर के हालात बहुत तेजी से बिगड़ने लगे| कश्मीर के मामलों में नेहरू के बाद के नेताओं ने कानूनी हस्तक्षेप की तैयारी शुरू कर दी| वहां संविधान की धारा 356 और 357 लागू कर दी गई| इसके बाद शेख अब्दुल्ला को एक बार फिर गिरफ्तार कर लिया गया| इस बीच पाकिस्तान ने एक बार फिर कश्मीर पर हमला करके उसे कब्जाने की कोशिश की लेकिन पाकिस्तानी फौज ने मुंह की खाई और ताशकंद में जाकर रूसी दखल से सुलह हुई| सवाल यह है कि कश्मीर का मसला इस मुकाम तक कैसे पंहुचा| जिस कश्मीरी अवाम ने कभी पाकिस्तान और उसके नेता मुहम्मद अली जिन्ना को धता बता दी थी और जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन राजा की पाकिस्तान के साथ मिलने की कोशिशों को फटकार दिया था, और भारत के साथ विलय के लिए चल रही शेख अब्दुल्ला की कोशिश को अहमियत दी थी, आज वह भारतीय नेताओं से इतना नारा क्यों है| कश्मीर में पिछले 30 साल से चल रहे आतंक के खेल में लोग भूलने लगे हैं कि जम्मू-कश्मीर की मुस्लिम बहुमत वाली जनता ने पाकिस्तान के खिलाफ भारतीय नेताओं, महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू और जयप्रकाश नारायण को अपना रहनुमा माना था| इसको समझने के लिए थोड़े पीछे के इतिहास में जाना पड़ेगा| भारत-पाक विभाजन के वक्त, जम्मू-कश्मीर के महाराजा, हरि सिंह ने पाकिस्तान के सामने  स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट का प्रस्ताव रखा जिसके तहत लाहौर सर्किल के केंद्रीय विभाग पाकिस्तान सरकार के अधीन काम करेंगे| 15 अगस्त को पाकिस्तान की सरकार ने जम्मू-कश्मीर के महाराजा के स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया जिसके बाद पूरे राज्य के डाकखानों पर पाकिस्तानी झंडे फहराने लगे| भारत सरकार को इस से चिंता हुई और जवाहर लाल नेहरू ने अपनी चिंता का इजहार इन शब्दों में किया,  पाकिस्तान की रणनीति यह है कि अभी ज्यादा से ज्यादा घुसपैठ कर ली जाए और जब जाड़ों में कश्मीर अलग-थलग पड़ जाए तो कोई बड़ी कार्रवाई की जाए| नेहरू ने सरदार पटेल को एक पत्र भी लिखा कि ऐसे हालात बन रहे हैं कि महाराजा के सामने और कोई विकल्प नहीं बचेगा और वह नेशनल कान्फ्रेंस और शेख अब्दुल्ला से मदद मांगेगा और भारत के साथ विलय कर लेगा| अगर ऐसा हो गया तो पाकिस्तान के लिए कश्मीर पर किसी तरह का हमला करना इस लिए मुश्किल हो जाएगा कि उसे सीधे भारत से मुकाबला करना पड़ेगा| अगर राजा ने नेहरू की बात को मान लिया होता तो कश्मीर समस्या का जन्म ही न होता| इस बीच जम्मू में साम्प्रदायिक दंगे भड़क उठे थे| बात अक्टूबर तक बहुत बिगड़ गई और महात्मा गांधी ने इस हालत के लिए महाराजा को व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार ठहराया| पाकिस्तान ने महाराजा पर दबाव बढ़ाने के लिए लाहौर से आने वाले कपड़े, पेट्रोल और राशन की सप्लाई रोक दी| संचार व्यवस्था पाकिस्तान के पास स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट के बाद आ ही गई थी| उसमें भी भारी अड़चन डाली गई| हालात तेजा से बिगड़ रहे थे| कबाइली हमला हुआ और राजा अपनी मनमानी पर अड़ा रहा| राजा की गलतियों के कारण ही कश्मीर का मसला बाद में संयुक्त राष्ट्र में ले जाया गया और उसके बाद बहुत सारे ऐसे काम हुए कि अक्टूबर 1947 वाली बात नहीं रही| संयुक्त राष्ट्र में एक प्रस्ताव पास हुआ कि कश्मीरी जनता से पूछ कर तय किया जाय कि वे किधर जाना चाहते हैं| भारत ने इस प्रस्ताव का खुले दिल से समर्थन किया लेकिन पाकिस्तान वाले भागते रहे, शेख अब्दुल्ला कश्मीरियों के हीरो थे और वे जिधर चाहते उधर ही कश्मीर जाता और वे भारत के साथ थे| लेकिन 1953 के बाद यह हालात भी बदल गए| बाद में पाकिस्तान जनमत संग्रह के पक्ष में हो गया और भारत उससे पीछा छुड़ाने लगा| इन हालात के पैदा होने में बहुत सारे कारण हैं| राजा के वफादार नेताओं की टोली जिसे प्रजा परिषद् के नाम से जाना जाता था, ने हालात को बहुत बिगाड़ा| उसके बाद इंदिरा गांधी के दौर में भी बात बिगाड़ी गई| 1980 में जब वे दोबारा  सत्ता में आईं तो अपने परिवार के ही अरुण नेहरू पर वे बहुत भरोसा करने लगी थीं, अरुण नेहरू ने जितना नुकसान कश्मीरी मसले का किया शायद ही किसी ने नहीं किया हो| उन्होंने डॉ. फारूक अब्दुल्ला से निजी खुन्नस में उनकी सरकार गिराकर उनके बहनोई गुल शाह को मुख्यमंत्री बनवा दिया| हुआ यह था कि फारूक अब्दुल्ला ने श्रीनगर में कांग्रेस के विरोधी नेताओं का एक सम्मलेन कर दिया और अरुण नेहरू नारा हो गए| अगर अरुण नेहरू को मामले की मामूली समझ भी होती तो वे खुश होते कि चलो कश्मीर में बाकी देश भी इन्वाल्व हो रहा है लेकिन उन्होंने पुलिस के थानेदार की तरह का आचरण किया और सब कुछ खराब कर दिया| इतना ही नहीं, कांग्रेस ने जगमोहन को जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बनाकर भेज दिया| उसके बाद तो हालात बिगड़ते ही गए| उधर पाकिस्तानी राष्ट्रपति जनरल जिया उल हक लगे हुए थे| उन्होंने बड़ी संख्या में आतंकवादी कश्मीर घाटी में भेज दिया| बची खुची बात उस वक्त बिगड़ गई| जब 1990 में तत्कालीन गृहमंत्री, मुफ्ती मुहम्मद सईद की बेटी का पाकिस्तानी आतंकवादियों ने अपहरण कर लिया यही दौर है जब कश्मीर में खून बहना शुरू हुआ| और आज हालात जहां तक पहुंच गए हैं किसी के समझ में नहीं आ रहा है कि वहां से वापसी कब होगी|

जरूरत इस बात की है कि नेहरू जैसी बड़ी सोच अपनाई जाय और कश्मीर से आतंक को खतम करने की कोशिश गंभीरता से की जाए|

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