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राष्ट्रवाद बनाम लोक-लुभावनवाद

कमलेंद्र कंवर

कुछ साल पहले तक जब पार्टियों के घोषणा-पत्र जारी होते थे, तो उन पर खास ध्यान नहीं दिया जाता था और उन्हें महज रिकॉर्ड में रखने लायक दस्तावेज समझा जाता था| तब घोषणा-पत्र जारी करना महज एक जरूरी रस्मअदायगी होता था, जिसका कोई खास वजन या अहमियत नहीं समझी जाती थी| लेकिन मौजूदा दौर में आलम यह है कि भाजपा और कांग्रेस जैसे दोनों प्रमुख राष्ट्रीय दल एक-दूसरे के घोषणा-पत्रों की बारीकी से मीमांसा करते हुए विरोधी दल पर झूठ परोसने और जनता से बड़े-बड़े हवा-हवाई वादे करने का आरोप लगा रहे हैं| इस तरह वे विरोधियों के चुनावी घोषणा-पत्र में सुराख तलाशते हुए उसकी विश्वसनीयता को पंचर करने पर तुले हैं, ताकि खुद को बेहतर साबित कर सकें| इसके साथ-साथ आज व्यक्तिगत आक्षेप या छींटाकशी एक अपवाद की बजाय आम चलन बन गया है| आज राजनीति इतनी दूषित और विकृत हो गई है कि किसी के मुख से विरोधियों के लिए भूल से भी अच्छे शब्द नहीं निकलते| जैसा कि हाल ही में एक केंद्रीय मंत्री ने कहा कि कांग्रेसी नेताओं के भाषणों का ज्यादातर हिस्सा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर ओछे प्रहारों को ही समर्पित होता है| इसी तरह, कुछ कम या ज्यादा मात्रा में नेहरू-गांधी परिवार के सदस्य भी लगातार भाजपाइयों के निशाने पर रहते हैं| दोनों ही पक्षों से व्यक्तिगत हमले ज्यादा होते हैं| दोनों ही पक्षों की दृष्टि इतनी संकुचित और एक-पक्षीय हो चुकी है कि अब तो यह सोचना भी मुश्किल है कि उन्हें विरोधियों की किसी नीति या कार्यक्रम में कुछ अच्छाई भी नजर आ सकती है| कांग्रेस और भाजपा के घोषणा-पत्रों पर दी गई प्रतिक्रियाओं में भी इसी प्रवृत्ति की झलक देखने को मिली| कोई किसी के घोषणा-पत्र को ढकोसला पत्र कह रहा है तो कोई झांसा-पत्र| आगामी आम चुनाव के लिए भाजपा का फोकस एक कर्मठ, दृढ़-संकल्पित प्रधानमंत्री के अधीन मजबूत सरकार देने और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर केंद्रित है| वहीं अपने तमाम वादों और योजनाओं के साथ कांग्रेस का जोर समावेशीकरण पर है| भाजपा का राष्ट्रीय सुरक्षा सिद्धांत आतंकवाद के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति से प्रेरित है|इसी आयाम पर आगे बढ़ते हुए भाजपा के घोषणा-पत्र में चरमपंथ और आतंकवाद पर लगाम कसने के लिए सुरक्षा बलों को पूरी छूट देने का वादा भी किया गया है| इसके साथ-साथ रक्षा संबंधी हथियारों व अन्य उपकरणों की खरीद प्रक्रिया में तेजी लाने की भी बात कही गई है| यानी दुश्मन को काबू में रखने के लिए सैन्य सुदृढ़ता पर जोर है| इसी परिप्रेक्ष्य में भाजपा सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (अफस्पा) की मजबूती की भी हिमायती है| इस मुद्दे पर उसकी इस वक्त कांग्रेस समेत जम्मू-कश्मीर की क्षेत्रीय पार्टियों नेशनल कांफ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) से रार ठनी है, जो अफस्पा की समीक्षा या उसे शिथिल करनेध्हटाने की बात कर रहे हैं| इस मामले में आक्रामक रुख अख्तियार करते हुए जहां भाजपा ने खुद को ऐसी पार्टी के रूप में स्थापित कर लिया है जो किसी भी हाल में अपने देश और देशवासियों के सुरक्षा हितों को संरक्षित रखना चाहती है, वहीं कांग्रेस को ऐसी पार्टी के रूप में देखा जा रहा है जो अड़ियल पाकिस्तान और उसके द्वारा भारत के खिलाफ प्रायोजित आतंकवाद के प्रति कुछ ज्यादा ही नरम और नम्र है| यह कांग्रेस के लिए काफी नुकसानदेह साबित हो सकता है, जो कि अपने इस दांव के सहारे अल्पसंख्यक मुस्लिमों को लुभाना चाहती है|

भाजपा ने अपने घोषणा-पत्र में जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने संबंधी अनुच्छेद 370 और इस राज्य के गैर-स्थायी निवासियों को परिभाषित करने से जुड़े 35-ए को खत्म करने की बात कही हैं| उसने वर्ष 2014 के घोषणा-पत्र में भी यह वादा किया था| लेकिन इस बार उसके इस वादे में कहीं ज्यादा गंभीरता और दृढ़ता झलकती है, भले ही कांग्रेस और जम्मू-कश्मीर के क्षेत्रीय दल इसको लेकर कुछ भी धमकियां दें| यह एक ऐसा वादा है, जिसे भाजपा इसलिए भी तवज्जो देना चाहेगी, ताकि वह यह दर्शा सके कि जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा भी नेहरू की तुष्टीकरण की नीति का ही एक नमूना था, जिसे वह राष्ट्रवादी भावनाओं की खातिर पलटना चाहती है| हालांकि इसके चलते इस राज्य में काफी उथल-पुथल मच सकती है, लेकिन भाजपा अब इस मूड में बिलकुल नहीं लगती कि वहां मौजूदा व्यवस्था चलती रहे, जिसके तहत स्थानीय निवासियों को छोड़कर वहां कोई नहीं रह सकता| इसके बरक्स, कांग्रेस का जम्मू-कश्मीर से जुड़े मुद्दों के अलावा पाकिस्तान के प्रति रवैया भी नरम लगता है| राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे के अलावा दोनों पार्टियों के घोषणा-पत्रों में लोक-लुभावनवाद की भी होड़ है| कृषक वर्ग, जो आंकड़ों के लिहाज से काफी मायने रखता है, को खुश करने का दोनों ही दलों ने प्रयास किया है| भाजपा के घोषणा-पत्र में किसानों को एक से 5 वर्ष की अवधि के लिए 1 लाख रुपए तक ब्याज-मुक्त ऋण देने का वादा किया गया हैं| यानी उन्हें सिर्फ मूलधन चुकाना होगा| साथ ही भाजपा ने छोटे व सीमांत किसानों को 60 वर्ष की उम्र के बाद पेंशन की भी घोषणा की| इस मामले में कांग्रेस भी पीछे नहीं है| उसने अपने घोषणा-पत्र के माध्यम से किसानों के लिए अलग बजट पेश करने के अलावा कृषि कर्ज न चुका पाने के मामलों को आपराधिक श्रेणी से बाहर करने का आश्वासन दिया है| इसके साथ-साथ मनरेगा के कार्यदिवसों को 100 से बढ़ाकर 150 करने का भी वादा है| चुनावी सीजन में किसानों के लिए ऐसे आकर्षक प्रस्तावों को अप्रत्याशित नहीं कहा जा सकता, लेकिन किसानों की स्थिति सुधारने हेतु वास्तविक निर्णयों के संदर्भ में केंद्र के संसाधनों की स्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता| आखिरकार, लोक-लुभावनवाद को कुछ हद तक संसाधनों की कमी से तो जूझना ही होगा| कांग्रेस के घोषणा-पत्र में सर्वाधिक प्रमुख घोषणा जो मतदाताओं को प्रभावित कर सकती है, वह है देश के 20 फीसदी निर्धनतम परिवारों को सालाना 72000 रुपए देने का वादा| लेकिन इसे पूरा करने के लिए जितनी भारी-भरकम धनराशि की दरकार होगी, उसे देखते हुए यह घोषणा ख्याली पुलाव ही लगती है| हालांकि लोक-लुभावनवाद की बढ़ती होड़ के बीच ऐसी घोषणाओं को अप्रत्याशित भी नहीं कहा जा सकता|

भाजपा ने अगले पांच साल में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों की संख्या को 10 फीसदी से नीचे लाने का वादा किया है| उसने कच्चे घरों में रहने वाले या बेघर लोगों को 2022 तक पक्के मकान मुहैया कराने का वादा भी किया| लोक-लुभावन घोषणाओं के बीच इसकी किसे परवाह है कि किस तरह राजनीतिक लाभ की खातिर विकास की बलि चढ़ती है और लोक-लुभावनवाद के लिए कैसे निवेश कुर्बान होता है|

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार हैं)

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