Turkey Population Crisis: तुर्किये में गिरती जन्म दर ने सरकार की बढ़ाई चिंता, राष्ट्रपति ने बताया अस्तित्व का खतरा
Turkey Population Crisis: पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान का करीबी सहयोगी तुर्किये इन दिनों एक ऐसे संकट की चपेट में है, जो भविष्य में उसकी ताकत को कम कर सकता है। अक्सर मुस्लिम देशों में बढ़ती आबादी की चर्चा होती है, लेकिन तुर्किये इस मामले में बिल्कुल अलग और चुनौतीपूर्ण राह पर खड़ा है। ताजा आधिकारिक आंकड़ों ने अंकारा के हुक्मरानों की नींद उड़ा दी है। तुर्किये सांख्यिकीय संस्थान की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2024 में देश की कुल प्रजनन दर घटकर महज 1.48 प्रति महिला रह गई है। यह आंकड़ा इसलिए डरावना है क्योंकि किसी भी देश की आबादी को स्थिर रखने के लिए यह दर कम से कम 2.1 होनी अनिवार्य है।

ऐतिहासिक गिरावट और ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ पर मंडराता खतरा
तुर्किये में जन्म दर का ग्राफ जिस तेजी से नीचे गिरा है, वह किसी बड़े झटके से कम नहीं है। साल 2001 में जहां यह दर 2.38 थी, वहीं पिछले 11 सालों से इसमें लगातार गिरावट देखी जा रही है। राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने इस स्थिति को देश के अस्तित्व के लिए एक “गंभीर आपदा” करार दिया है। वहीं, उपराष्ट्रपति सेवडेट यिलमाज़ ने आगाह किया है कि तुर्किये का ‘जनसांख्यिकीय अवसर काल’ (Working Population का अधिक होना) साल 2035 तक खत्म हो सकता है। सरकार का मानना है कि देश अब एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर है जहां से वापसी करना मुश्किल होगा, यदि समय रहते बड़े कदम नहीं उठाए गए।
दुनिया के पांच सबसे तेजी से गिरते देशों में शामिल
आंकड़े बताते हैं कि 2017 में जो प्रजनन दर 2.08 थी, वह अब वैश्विक औसत 2.25 से भी काफी नीचे जा चुकी है। उपराष्ट्रपति यिलमाज़ के अनुसार, पिछले एक दशक में जन्म दर में सबसे तेज गिरावट दर्ज करने वाले देशों में तुर्किये दुनिया में पांचवें स्थान पर आ गया है। इस गिरावट का सीधा मतलब यह है कि आने वाले समय में देश में काम करने वाले युवाओं की कमी हो जाएगी और अर्थव्यवस्था को रफ्तार देना एक बड़ी चुनौती बन जाएगा। वर्तमान में तुर्किये की जनसंख्या 8.6 करोड़ से अधिक है, लेकिन युवाओं की घटती संख्या इसे भविष्य में कमजोर बना सकती है।
तेजी से बूढ़ा हो रहा समाज और सामाजिक सुरक्षा की चुनौतियां
भले ही तुर्किये यूरोप का सबसे अधिक आबादी वाला देश है, लेकिन इसका सामाजिक ढांचा तेजी से बदल रहा है। साल 2024 में 65 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की संख्या बढ़कर 10.6 प्रतिशत हो गई है। संयुक्त राष्ट्र के पैमानों पर तुर्किये अब “अत्यधिक वृद्ध आबादी” वाले देशों की कतार में खड़ा है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2050 तक देश का हर चौथा नागरिक बुजुर्ग होगा। इसका सबसे बुरा असर देश की पेंशन प्रणाली, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा बजट पर पड़ेगा। विशेषकर ग्रामीण इलाकों में स्थिति और भी खराब है क्योंकि वहां के युवा काम की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं।
आबादी बढ़ाने के लिए सरकार ने घोषित किए भारी भरकम ऑफर
इस संकट से निपटने के लिए राष्ट्रपति एर्दोगन ने साल 2025 को “परिवार वर्ष” के रूप में मनाया था और अब 2026 से 2035 तक के समय को “परिवार और जनसंख्या दशक” घोषित किया गया है। सरकार ने बच्चों के जन्म को प्रोत्साहित करने के लिए खजाना खोल दिया है। इसके तहत पहले बच्चे के जन्म पर 5,000 लीरा की एकमुश्त मदद और दूसरे बच्चे पर मासिक भत्ते का प्रावधान किया गया है। इतना ही नहीं, नवविवाहित जोड़ों को घर बसाने के लिए 150,000 लीरा तक का ब्याज मुक्त कर्ज दिया जा रहा है। एर्दोगन लंबे समय से तुर्किये के नागरिकों से कम से कम तीन बच्चे पैदा करने की भावुक अपील करते आ रहे हैं।
आर्थिक मंदी और बदलती जीवनशैली बनी बड़ी बाधा
आखिर तुर्किये के लोग बच्चे पैदा करने से क्यों कतरा रहे हैं? विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे सबसे बड़ी वजह देश की खराब आर्थिक स्थिति है। रिकॉर्ड तोड़ महंगाई (Inflation) और घरों की आसमान छूती कीमतों ने युवाओं के लिए परिवार शुरू करना मुश्किल बना दिया है। इसके अलावा, महिलाओं में उच्च शिक्षा और करियर के प्रति बढ़ती जागरूकता ने भी शादी की उम्र बढ़ा दी है। शहरों में जीवन-यापन की भारी लागत भी लोगों को छोटे परिवार तक सीमित रहने पर मजबूर कर रही है। तुर्किये अब उसी रास्ते पर है जिस पर जापान और चीन जैसे देश पहले से ही संघर्ष कर रहे हैं।



