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India-US-Trade-Deal – सरकार का भरोसा, किसान आशंकित, निर्यातकों में उम्मीद

India-US-Trade-Deal – प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच घोषित व्यापार समझौते के बाद देश के भीतर समर्थन और आशंकाओं की मिली-जुली तस्वीर उभर रही है। सरकार का कहना है कि यह करार भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा अवसर लेकर आया है और संवेदनशील क्षेत्रों, खासकर कृषि व डेयरी, को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है। वहीं दूसरी ओर किसान संगठनों और विपक्षी दलों ने इसे किसानों के हितों के लिए जोखिम भरा बताते हुए तीखी आपत्ति जताई है। इस समझौते ने घरेलू बाजार, निर्यात संभावनाओं और रणनीतिक साझेदारी—तीनों पर नई बहस छेड़ दी है।

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किसान संगठनों की कड़ी प्रतिक्रिया

संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) ने इस समझौते को किसानों के साथ “ऐतिहासिक विश्वासघात” करार दिया है। संगठन का आरोप है कि सरकार ने अमेरिकी दबाव के आगे झुकते हुए अपने ही किसानों के हितों को दरकिनार कर दिया। एसकेएम ने प्रधानमंत्री के पिछले स्वतंत्रता दिवस भाषण का हवाला देते हुए कहा कि तब उन्होंने किसानों की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने की बात कही थी, लेकिन मौजूदा निर्णय उससे विपरीत दिखाई देता है। मोर्चा का मानना है कि शून्य आयात शुल्क जैसी रियायतें अमेरिकी कृषि उत्पादों को भारतीय बाजार में हावी कर देंगी, जिससे छोटे और मध्यम किसान सबसे अधिक प्रभावित होंगे।

समझौते की मुख्य शर्तें

सोमवार को घोषित इस करार के तहत अमेरिका ने भारतीय वस्तुओं पर लगाए गए जवाबी टैरिफ को 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करने पर सहमति जताई है। इससे भारतीय MSMEs, हस्तशिल्प, वस्त्र और समुद्री उत्पादों से जुड़े निर्यातकों को अमेरिकी बाजार में प्रवेश आसान होने की उम्मीद है। राष्ट्रपति ट्रंप ने यह भी कहा कि भारत अमेरिका से बड़े पैमाने पर ऊर्जा और अन्य उत्पाद खरीदेगा, जिससे द्विपक्षीय व्यापार संतुलन मजबूत होगा। सरकार का तर्क है कि यह कदम भारतीय उद्योगों को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में बेहतर जगह दिला सकता है।

क्या कृषि क्षेत्र सुरक्षित रहेगा?

सरकार ने स्पष्ट किया है कि अनाज, मक्का, सोयाबीन और जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) खाद्य पदार्थों को इस समझौते के दायरे से बाहर रखा जा सकता है। अधिकारियों के अनुसार, किसान और पशुपालन से जुड़े हितधारकों के साथ कोई समझौता नहीं किया गया है। इसके विपरीत, कपड़ा, चमड़ा, रत्न एवं आभूषण और समुद्री उत्पाद जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों को इससे सीधा लाभ मिलने की संभावना जताई जा रही है, जिससे रोजगार सृजन को बल मिल सकता है।

आयात और निवेश का बदलता परिदृश्य

राष्ट्रपति ट्रंप के दावे के मुताबिक भारत अगले कुछ वर्षों में अमेरिका से लगभग 500 अरब डॉलर मूल्य के सामान का आयात कर सकता है, जिसमें तेल, कोयला, तकनीक और कृषि उत्पाद शामिल होंगे। हालांकि आर्थिक विशेषज्ञ इसे महत्वाकांक्षी लक्ष्य मानते हैं, क्योंकि 2024-25 में भारत का कुल वस्तु आयात 721 अरब डॉलर था। अनुमान है कि आने वाले पांच वर्षों में अमेरिका से सालाना आयात करीब 100 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है, जो पिछले वर्ष के 46 अरब डॉलर से काफी अधिक होगा। भारत विशेष रूप से कच्चे तेल, LNG, उन्नत चिप्स, डेटा सेंटर उपकरण, विमान व उनके पुर्जे और परमाणु तकनीक से जुड़े उपकरणों पर ध्यान केंद्रित करेगा।

टैरिफ रियायतें और चरणबद्ध लागू प्रक्रिया

अमेरिका को दी जाने वाली कुछ टैरिफ छूटें चरणबद्ध तरीके से लागू की जाएंगी। कुछ वस्तुओं को आयात कोटा के माध्यम से अनुमति दी जाएगी, जैसा कि भारत ने हाल ही में यूरोपीय संघ, न्यूजीलैंड और ब्रिटेन के साथ किए गए समझौतों में अपनाया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने उम्मीद जताई है कि पिछले साल अमेरिकी टैरिफ के कारण प्रभावित हुए भारतीय निर्यात में अब सुधार आएगा। उनके अनुसार, भारतीय उत्पादकों ने पहले ही नए बाजार तलाश लिए हैं और अब अमेरिकी बाजार में बेहतर पहुंच मिलने से निर्यात को अतिरिक्त गति मिलेगी।

आगे की राह

फिलहाल दोनों देशों के अधिकारी एक संयुक्त बयान को अंतिम रूप देने में जुटे हैं, जिसे अगले कुछ दिनों में सार्वजनिक किया जा सकता है। इस समझौते के अगले कुछ हफ्तों में पूरी तरह लागू होने की संभावना है। सरकार इसे रणनीतिक और आर्थिक साझेदारी में नए अध्याय के रूप में देख रही है, जबकि किसान संगठन और कुछ अर्थशास्त्री इसके दीर्घकालिक प्रभावों पर नजर बनाए हुए हैं। स्पष्ट है कि यह करार केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक बहस का भी विषय बन चुका है।

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