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VastuTips – घर के मंदिर में मूर्तियों की संख्या और नियम जानें

VastuTips – हिंदू धर्म में दैनिक पूजा-पाठ को जीवन का अहम हिस्सा माना गया है। लोग सुबह-शाम भगवान के सामने दीप जलाते हैं, मंदिर जाकर दर्शन करते हैं और अपने घर में बने पूजा स्थल को विशेष महत्व देते हैं। यह स्थान केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं होता, बल्कि मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा का भी स्रोत माना जाता है। इसलिए जरूरी है कि घर का मंदिर सादा, स्वच्छ और व्यवस्थित रहे। अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि घर के मंदिर में कितनी मूर्तियां रखना उचित है और किन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

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मूर्तियों की संख्या को लेकर मान्यता

वास्तु शास्त्र और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार घर के पूजा स्थल में अत्यधिक मूर्तियां रखना उचित नहीं माना जाता। माना जाता है कि जब मंदिर में सीमित संख्या में देव प्रतिमाएं होती हैं तो मन अधिक एकाग्र रहता है और पूजा करते समय ध्यान भटकता नहीं। सामान्यतः दो से पांच मूर्तियां पर्याप्त मानी जाती हैं। इससे पूजा स्थल सुसंगठित रहता है और सफाई भी आसानी से की जा सकती है। अधिक मूर्तियां रखने से स्थान अव्यवस्थित हो सकता है, जिससे नियमित देखभाल कठिन हो जाती है। सादगी और संतुलन को ही शुभ माना गया है।

किन मूर्तियों से बचना चाहिए

घर के मंदिर में शांत और सौम्य स्वरूप वाली प्रतिमाएं रखना बेहतर समझा जाता है। धार्मिक परंपराओं के अनुसार उग्र या क्रोधित रूप वाली मूर्तियों को घर के पूजा स्थल में स्थापित करने से बचना चाहिए। उदाहरण के तौर पर नटराज का तांडव रूप, शनि देव का उग्र स्वरूप, राहु-केतु की प्रतिमाएं, मां काली का प्रचंड रूप या काल भैरव की उग्र मूर्ति घर के मंदिर के लिए उपयुक्त नहीं मानी जातीं। इन स्वरूपों को शक्ति और तप का प्रतीक माना जाता है, जिन्हें विशेष साधना स्थलों के लिए उपयुक्त समझा जाता है। घर में सामान्यतः शांत, आशीर्वाद देती हुई प्रतिमाएं ही रखनी चाहिए, जिससे वातावरण सौम्य और संतुलित बना रहे।

मंदिर की दिशा का महत्व

वास्तु शास्त्र में घर के मंदिर की दिशा को भी अत्यंत महत्वपूर्ण बताया गया है। उत्तर-पूर्व दिशा, जिसे ईशान कोण कहा जाता है, पूजा स्थल के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। मान्यता है कि इस दिशा में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह अधिक रहता है। इसी कारण अधिकांश लोग अपने घर का मंदिर इसी ओर बनवाने की कोशिश करते हैं। यदि स्थान की कमी हो तो यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पूजा स्थान स्वच्छ और रोशनी वाला हो। अंधेरे या बंद स्थान में मंदिर बनाने से बचना चाहिए।

मूर्तियों के बीच दूरी और व्यवस्था

मंदिर में रखी गई प्रतिमाओं के बीच उचित दूरी भी आवश्यक मानी गई है। कहा जाता है कि मूर्तियों के बीच कम से कम एक से दो इंच का अंतर होना चाहिए। इससे ऊर्जा का प्रवाह संतुलित रहता है और प्रतिमाएं आपस में सटी हुई नहीं दिखतीं। साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि टूटी-फूटी या क्षतिग्रस्त मूर्तियां मंदिर में न रखें। यदि कोई प्रतिमा खंडित हो जाए तो उसे विधि-विधान से विसर्जित करना चाहिए। नियमित रूप से मंदिर की सफाई करना और वहां अनावश्यक वस्तुएं न रखना भी जरूरी है।

किन स्थानों पर मंदिर न बनाएं

घर में मंदिर का स्थान चुनते समय कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए। पूजा स्थल कभी भी शौचालय या बाथरूम के पास नहीं होना चाहिए। इसी तरह सीढ़ियों के ठीक नीचे मंदिर बनाना भी शुभ नहीं माना जाता। बेडरूम में भी मंदिर बनाने से बचने की सलाह दी जाती है, क्योंकि यह स्थान विश्राम के लिए होता है। यदि अलग कमरा संभव न हो तो घर के शांत कोने में मंदिर स्थापित किया जा सकता है। ध्यान रहे कि मंदिर के सामने जूते-चप्पल या गंदगी न हो।

संतुलन और श्रद्धा है सबसे महत्वपूर्ण

अंततः घर का मंदिर श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक है। सादगी, स्वच्छता और सही दिशा में स्थापित पूजा स्थल घर के वातावरण को शांत और सकारात्मक बना सकता है। मूर्तियों की संख्या सीमित रखना, सौम्य स्वरूप चुनना और नियमित रूप से पूजा स्थल की देखभाल करना ही सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। धार्मिक नियमों का उद्देश्य भय उत्पन्न करना नहीं, बल्कि घर में संतुलन और सद्भाव बनाए रखना है।

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