उत्तराखण्ड

SupremeCourt – उत्तराखंड में लालढांग-चिल्लरखाल सड़क डामरीकरण को मंजूरी

SupremeCourt – सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अपने पूर्व आदेश में संशोधन करते हुए उत्तराखंड की 11.5 किलोमीटर लंबी लालढांग-चिल्लरखाल सड़क के डामरीकरण की अनुमति दे दी। इस निर्णय से क्षेत्र के हजारों ग्रामीणों को आवागमन में राहत मिलने की उम्मीद है। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि सड़क निर्माण और उपयोग के दौरान वन्यजीव कॉरिडोर की संवेदनशीलता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।

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पहले लगा था रोक, अब शर्तों के साथ अनुमति

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने 11 जनवरी 2023 के उस आदेश में बदलाव किया, जिसमें पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन को लेकर इस परियोजना पर रोक लगा दी गई थी। सड़क का लगभग 4.5 किलोमीटर हिस्सा चमारिया मोड़ से सिगड़ी सोत तक पारिस्थितिक दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र में आता है। अदालत ने माना कि स्थानीय जरूरतों और पर्यावरणीय संतुलन के बीच संतुलित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।

वन्यजीवों की सुरक्षा पर जोर

यह मार्ग जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान और राजाजी राष्ट्रीय उद्यान को जोड़ने वाले महत्वपूर्ण वन्यजीव कॉरिडोर से होकर गुजरता है। अदालत ने साफ कहा कि इस हिस्से में ट्रक और डंपर जैसे भारी वाणिज्यिक वाहनों को चलने की अनुमति नहीं दी जाएगी। न्यायालय का मानना है कि भारी वाहनों की आवाजाही से वन्यजीवों की गतिविधियों और प्राकृतिक आवास पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इसलिए डामरीकरण की अनुमति के साथ संरक्षण संबंधी कड़े निर्देश भी जारी किए गए हैं।

दूरी घटेगी, यातायात होगा सुगम

राज्य सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता ने दलील दी कि सड़क के पक्का होने से कोटद्वार और हरिद्वार के बीच वाणिज्यिक वाहनों की दूरी लगभग 65 किलोमीटर तक कम हो सकती है। इससे समय और ईंधन दोनों की बचत होगी। हालांकि सरकार ने अदालत को आश्वस्त किया कि वह सभी शर्तों का पालन करेगी और पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन नहीं होने दिया जाएगा।

वाणिज्यिक वाहनों पर रहेगा प्रतिबंध

अदालत ने स्पष्ट किया कि इस मार्ग का उपयोग मुख्य रूप से स्थानीय आवागमन के लिए होगा। भारी वाणिज्यिक वाहन वैकल्पिक मार्ग, विशेषकर उत्तर प्रदेश के रास्ते, का उपयोग करेंगे। याचिकाकर्ता पक्ष के वकील गौरव बंसल ने भी अदालत में कहा कि उनका विरोध केवल वाणिज्यिक वाहनों की आवाजाही को लेकर था। उनका तर्क था कि ऐसे वाहनों से वन्यजीवों और जंगल के पर्यावरण पर दबाव बढ़ सकता है। ग्रामीणों के लिए सड़क सुविधा का उन्होंने विरोध नहीं किया।

स्थानीय आबादी को राहत की उम्मीद

लालढांग-चिल्लरखाल मार्ग लंबे समय से स्थानीय लोगों के लिए महत्वपूर्ण रहा है। बरसात के मौसम में कच्ची सड़क की स्थिति खराब हो जाती थी, जिससे आवाजाही प्रभावित होती थी। डामरीकरण के बाद शिक्षा, स्वास्थ्य और बाजार तक पहुंच आसान होने की संभावना है।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन साधने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि परियोजना किस तरह निर्धारित शर्तों के तहत आगे बढ़ती है और वन्यजीव संरक्षण के उपायों को किस गंभीरता से लागू किया जाता है।

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