अंतर्राष्ट्रीय

GlobalChristianity – वैश्विक स्तर पर ईसाई आबादी का केंद्र बदलता परिदृश्य

GlobalChristianity – दुनिया में ईसाई समुदाय की कुल संख्या बढ़ने के बावजूद उसकी वैश्विक हिस्सेदारी में गिरावट दर्ज की गई है। हाल में जारी एक विस्तृत अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में यह बात सामने आई है कि ईसाई धर्म अब भी दुनिया का सबसे बड़ा धर्म है, लेकिन विश्व जनसंख्या में उसका अनुपात पहले की तुलना में कम हुआ है। इस अध्ययन ने न केवल आबादी के आंकड़ों को सामने रखा है, बल्कि यह भी बताया है कि ईसाई समुदाय का भौगोलिक केंद्र तेजी से बदल रहा है।

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यूरोप और अमेरिका से अफ्रीका की ओर झुकाव

रिपोर्ट के अनुसार, ईसाई धर्म का पारंपरिक प्रभाव क्षेत्र माने जाने वाले यूरोप और उत्तरी अमेरिका में इसकी हिस्सेदारी घटी है। इसके विपरीत उप-सहारा अफ्रीका में ईसाई आबादी में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। बीते दशक में अफ्रीकी देशों में ईसाइयों की संख्या में करीब 31 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जिससे यह क्षेत्र अब वैश्विक ईसाई समुदाय का बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। 2020 तक लगभग 31 प्रतिशत ईसाई अफ्रीका में रह रहे थे, जबकि यूरोप में यह अनुपात घटकर 22 प्रतिशत के आसपास रह गया। लैटिन अमेरिका और कैरेबियन क्षेत्र में भी बड़ी संख्या में ईसाई आबादी मौजूद है।

विस्तृत सर्वे और जनगणना पर आधारित अध्ययन

यह निष्कर्ष 201 देशों और क्षेत्रों में किए गए 2,700 से अधिक सर्वेक्षणों और जनगणनाओं के आंकड़ों के विश्लेषण के बाद सामने आया है। अध्ययन के मुताबिक, वर्ष 2020 तक दुनिया में लगभग 2.3 अरब लोग खुद को ईसाई बताते थे, जो कुल वैश्विक आबादी का 28.8 प्रतिशत है। 2010 में यह संख्या करीब 2.1 अरब थी। यानी कुल संख्या में लगभग 6 प्रतिशत की वृद्धि हुई। हालांकि इसी अवधि में विश्व की कुल आबादी और अन्य धर्मों के अनुयायियों की वृद्धि दर इससे कहीं अधिक रही, जिसके कारण प्रतिशत हिस्सेदारी में गिरावट आई।

हिस्सेदारी घटने के प्रमुख कारण

विश्लेषकों का मानना है कि ईसाई आबादी की हिस्सेदारी कम होने के पीछे दो बड़े कारण हैं। पहला, कई देशों में घटती जन्म दर। दूसरा, वयस्क होने पर लोगों का धर्म बदलना या किसी धर्म से खुद को अलग कर लेना। आंकड़े बताते हैं कि हाल के वर्षों में हर एक व्यक्ति के मुकाबले लगभग 3.1 लोग ईसाई धर्म छोड़कर बाहर हुए। इनमें से बड़ी संख्या ने किसी अन्य धर्म को अपनाने के बजाय स्वयं को किसी भी धार्मिक पहचान से अलग कर लिया। यह रुझान खासतौर पर पश्चिमी देशों में अधिक स्पष्ट है।

यूरोप और उत्तरी अमेरिका में गिरावट

यूरोप में ईसाई आबादी घटकर लगभग 50 करोड़ रह गई है, जो पिछले दशक की तुलना में करीब 9 प्रतिशत कम है। उत्तरी अमेरिका में भी यह संख्या घटकर लगभग 23 करोड़ के आसपास पहुंच गई। विशेषज्ञ इसे सामाजिक बदलाव, धर्मनिरपेक्षता की बढ़ती प्रवृत्ति और नई पीढ़ी के अलग नजरिए से जोड़कर देखते हैं। कई देशों में युवाओं का खुद को धार्मिक पहचान से दूर रखना एक उभरती प्रवृत्ति बन गई है।

वैश्विक धार्मिक परिदृश्य की तस्वीर

2020 के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया की 28.8 प्रतिशत आबादी ईसाई है। इसके बाद 25.6 प्रतिशत लोग इस्लाम को मानते हैं। लगभग 24.2 प्रतिशत लोग ऐसे हैं जो किसी भी धर्म से खुद को नहीं जोड़ते। हिंदू आबादी की हिस्सेदारी 14.9 प्रतिशत है, जबकि बौद्ध समुदाय करीब 4.1 प्रतिशत है। कुल मिलाकर 75 प्रतिशत से अधिक लोग किसी न किसी धर्म से जुड़े हैं, जबकि लगभग एक चौथाई आबादी खुद को धार्मिक पहचान से अलग मानती है।

भविष्य की दिशा क्या संकेत देती है

धार्मिक आबादी से जुड़े ये आंकड़े केवल वर्तमान स्थिति नहीं बताते, बल्कि आने वाले वर्षों के सामाजिक और सांस्कृतिक बदलावों की ओर भी संकेत करते हैं। अफ्रीकी देशों में बढ़ती युवा आबादी और उच्च जन्म दर वहां धार्मिक समुदायों के विस्तार को प्रभावित कर रही है। वहीं यूरोप और अमेरिका में बदलती जीवनशैली और सामाजिक सोच धार्मिक पहचान के स्वरूप को बदल रही है। यह स्पष्ट है कि आने वाले समय में धार्मिक जनसांख्यिकी का नक्शा और भी बदलेगा।

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