RamadanHealth – गर्भावस्था में रोजा रखने से पहले जानें जरूरी बातें…
RamadanHealth – रमजान का पवित्र महीना इबादत, संयम और आत्मिक शांति का प्रतीक माना जाता है। लेकिन जब बात गर्भवती महिलाओं की आती है, तो यह दौर केवल आध्यात्मिक नहीं बल्कि स्वास्थ्य से जुड़ा संवेदनशील समय भी बन जाता है। कई महिलाओं के मन में यह सवाल उठता है कि क्या गर्भावस्था के दौरान रोजा रखना सुरक्षित है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस निर्णय में आस्था के साथ-साथ चिकित्सकीय सलाह को भी समान महत्व देना जरूरी है, क्योंकि हर महिला की शारीरिक स्थिति अलग होती है।

मां और शिशु की सेहत को प्राथमिकता
चिकित्सकों का स्पष्ट मत है कि गर्भावस्था के दौरान मां और गर्भ में पल रहे शिशु की सुरक्षा सबसे अहम है। प्रसूति एवं स्त्रीरोग विशेषज्ञों के अनुसार, रोजा रखने या न रखने का निर्णय किसी सामान्य सलाह पर नहीं बल्कि व्यक्तिगत स्वास्थ्य जांच के आधार पर लिया जाना चाहिए। यदि गर्भावस्था सामान्य है और महिला की पोषण स्थिति संतुलित है, तभी चिकित्सकीय निगरानी में रोजा रखने पर विचार किया जा सकता है।
इस्लामिक मार्गदर्शन भी यही कहता है कि अगर रोजा रखने से स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचने की आशंका हो तो छूट दी जाती है। ऐसे में धार्मिक दृष्टिकोण और चिकित्सकीय सलाह एक-दूसरे के पूरक नजर आते हैं।
प्रेग्नेंसी में शरीर की बदलती जरूरतें
गर्भावस्था के दौरान शरीर में कई प्रकार के हार्मोनल और शारीरिक परिवर्तन तेजी से होते हैं। इस समय रक्त शर्करा के स्तर में उतार-चढ़ाव सामान्य बात है। साथ ही, शरीर को अधिक पानी और पोषण की आवश्यकता होती है। लंबे समय तक भोजन और पानी से दूरी रखने पर कमजोरी, चक्कर, सिरदर्द या शुगर लेवल गिरने जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं।
डिहाइड्रेशन यानी पानी की कमी गर्भवती महिलाओं के लिए विशेष चिंता का विषय है। इससे न केवल मां को थकान महसूस होती है, बल्कि गर्भस्थ शिशु पर भी प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए चिकित्सक इस अवधि में पर्याप्त तरल पदार्थ और संतुलित आहार लेने पर जोर देते हैं।
रोजा रखने से पहले क्या करें
यदि कोई गर्भवती महिला रोजा रखने का विचार कर रही है, तो सबसे पहले उसे अपने डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए। नियमित स्वास्थ्य जांच यह स्पष्ट कर सकती है कि उसकी स्थिति रोजे के अनुकूल है या नहीं। जिन महिलाओं को पहले से एनीमिया, उच्च रक्तचाप, मधुमेह या अन्य जटिलताएं हैं, उन्हें विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।
डॉक्टर आमतौर पर यह देखते हैं कि गर्भावस्था किस तिमाही में है, वजन और हीमोग्लोबिन का स्तर कैसा है, और महिला को पहले किसी तरह की चिकित्सकीय परेशानी तो नहीं रही। इन सभी पहलुओं के आधार पर ही सलाह दी जाती है।
सहरी और इफ्तार में पोषण का महत्व
अगर डॉक्टर की सलाह के बाद रोजा रखा जा रहा है, तो खानपान पर विशेष ध्यान देना जरूरी है। सहरी में ऐसे खाद्य पदार्थ शामिल करने चाहिए जो लंबे समय तक ऊर्जा दें, जैसे जटिल कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन युक्त भोजन। साथ ही, पर्याप्त पानी पीना अनिवार्य है।
इफ्तार के समय अत्यधिक तले-भुने भोजन से बचना चाहिए और हल्का, संतुलित आहार लेना बेहतर माना जाता है। विटामिन और खनिज से भरपूर भोजन मां और शिशु दोनों के लिए लाभकारी होता है। भोजन के बीच पर्याप्त अंतराल में तरल पदार्थ लेना डिहाइड्रेशन से बचाने में मदद कर सकता है।
कब तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें
रोजे के दौरान यदि अत्यधिक कमजोरी, चक्कर, तेज सिरदर्द, मतली, पेट में दर्द, पैरों में ऐंठन या पेशाब की मात्रा में कमी जैसे लक्षण दिखाई दें, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसे संकेत शरीर में पानी या पोषण की कमी की ओर इशारा कर सकते हैं।
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि ऐसी स्थिति में तुरंत रोजा खोलना और चिकित्सकीय सहायता लेना समझदारी है। किसी भी धार्मिक कर्तव्य से पहले स्वास्थ्य को महत्व देना आवश्यक है।
रमजान आत्मसंयम और विश्वास का महीना है, लेकिन गर्भावस्था एक ऐसी अवस्था है जिसमें अतिरिक्त सावधानी की जरूरत होती है। सही जानकारी, डॉक्टर की सलाह और संतुलित आहार के साथ ही कोई भी निर्णय लिया जाना चाहिए, ताकि मां और शिशु दोनों सुरक्षित रहें।



