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West Bengal Political Challenge: बंगाल की सियासत में शुरू हुआ कबीर का विद्रोह, हुमायूं कबीर ने CM ममता बनर्जी के खिलाफ फूंका बिगुल

West Bengal Political Challenge: पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर बड़ा भूचाल आया है, क्योंकि बाबरी मस्जिद की नींव रख चुके और अब विवादों में घिरे विधायक हुमायूं कबीर ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को खुली चुनौती दी है (challenge)। उन्होंने घोषणा की है कि वह अगले विधानसभा चुनाव में सीधे तौर पर तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ मैदान में उतरेंगे। राज्य में 2026 में चुनाव होने हैं, और इससे पहले ही कबीर ने दावा कर दिया है कि ममता बनर्जी दोबारा सत्ता में नहीं लौट सकेंगी। इसी राजनीतिक उथल-पुथल के बीच टीएमसी ने उन्हें निलंबित भी कर दिया है।

West Bengal Political Challenge
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नई पार्टी की तैयारी और बड़ा एलान

कबीर ने एएनआई से बातचीत में खुलासा किया कि वह 22 दिसंबर को अपनी नई राजनीतिक पार्टी का ऐलान करने जा रहे हैं (announcement)। उनका कहना है कि वह ममता बनर्जी की पार्टी के खिलाफ हर अहम सीट पर मजबूत उम्मीदवार उतारेंगे। कबीर का दावा है कि 2026 के चुनाव में जो भी मुख्यमंत्री पद हासिल करना चाहेगा, उसे उनकी राजनीतिक ताकत और समर्थन की जरूरत पड़ेगी। इससे पहले भी वह खुद को भविष्य का ‘किंगमेकर’ बता चुके हैं।


2026 के विधानसभा समीकरणों पर कबीर का दावा

पीटीआई भाषा को दिए बयान में हुमायूं कबीर ने बड़े राजनीतिक अनुमान पेश किए (prediction)। उन्होंने कहा कि 2026 में न तो तृणमूल कांग्रेस और न ही भारतीय जनता पार्टी अपने दम पर बहुमत का जादुई आंकड़ा पार कर पाएगी। 294 सीटों वाली पश्चिम बंगाल विधानसभा में किसी भी पार्टी के 148 सीटों तक पहुंचने की संभावना, उनके मुताबिक, बेहद कम है। यह दावा राजनीतिक विश्लेषकों के लिए भी चर्चा का बड़ा विषय बन गया है।


‘किंगमेकर’ बनने का दावा दोहराया

कबीर ने पत्रकारों से बातचीत में साफ कहा कि पश्चिम बंगाल की नई सत्ता उन्हें दरकिनार करके नहीं बन सकती (leadership)। उनका कहना है कि चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए उनका समर्थन अनिवार्य होगा। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि वह 135 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर चुके हैं, और उनकी नई पार्टी इतनी सीटें जीतेगी कि मुख्यमंत्री की कुर्सी लेने वाली किसी भी पार्टी को उनके विधायकों की मदद लेनी ही पड़ेगी।


टीएमसी का पलटवार: दिवास्वप्न बता कर खारिज

हुमायूं कबीर के लगातार दावों पर टीएमसी ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है (reaction)। पार्टी के प्रदेश महासचिव अरूप चक्रवर्ती ने कहा कि कबीर “दिवास्वप्न” देख रहे हैं और वास्तविक राजनीति की जमीन से दूर हैं। चक्रवर्ती ने तंज कसते हुए कहा कि सरकार बनाने की बात करने से पहले उन्हें अपने चुनावों में कम से कम जमानत बचाने की चिंता करनी चाहिए। टीएमसी का मानना है कि कबीर के दावे उनकी बढ़ती राजनीतिक हताशा का संकेत हैं।


कबीर के बढ़ते तेवर और राजनीतिक संदेश

कबीर के बयान और रणनीति बताते हैं कि वह इस बार किसी समझौते या पिछले समीकरणों पर भरोसा करने के मूड में नहीं हैं (strategy)। उनका दावा है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़ा वैक्यूम तैयार हो चुका है और वही उस खाली जगह को भरने की क्षमता रखते हैं। उनकी नई पार्टी के गठन को लेकर राज्य की राजनीति में नई चर्चाएँ शुरू हो चुकी हैं।


2026 का चुनाव: मुकाबला और भी दिलचस्प

कबीर की सक्रियता के बाद 2026 का चुनाव और अधिक दिलचस्प हो सकता है (election)। पहले से ही टीएमसी, बीजेपी और वाम दलों के बीच संघर्ष मौजूद है, और अब कबीर की नई ताकत राजनीतिक गणित को बदलने का दावा कर रही है। अगर उनका दावा सही साबित होता है, तो राज्य की सत्ता समीकरणों में उन्हें एक निर्णायक भूमिका मिल सकती है। हालांकि राजनीतिक पंडितों का कहना है कि ज़मीन पर यह कैसा असर दिखाएगा, यह चुनाव के नतीजों के बाद ही पता चल सकेगा।


निलंबन और नई पार्टी की दिशा

टीएमसी द्वारा किए गए निलंबन ने कबीर के राजनीतिक रास्ते को और साफ कर दिया है (suspension)। अब वह खुद को एक स्वतंत्र नेता के रूप में पेश कर रहे हैं और उनकी नई पार्टी की घोषणा को लेकर राज्य भर में हलचल है। समर्थक इसे एक नई राजनीतिक शुरुआत के रूप में देख रहे हैं, जबकि विरोधियों का मानना है कि यह सिर्फ एक असंतुष्ट नेता का कदम है।


कबीर के दावों का व्यापक प्रभाव

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि कबीर के दावे आने वाले महीनों में चुनावी माहौल को गर्म रखेंगे (impact)। उनके बयानों ने न केवल टीएमसी बल्कि विपक्षी दलों की रणनीतियों को भी प्रभावित किया है। चुनाव नजदीक आने पर यह देखना दिलचस्प होगा कि उनकी नई पार्टी कितना जनसमर्थन जुटा पाती है और क्या वह वास्तव में किंगमेकर बनने की ओर बढ़ रहे हैं।

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