Putrada Ekadashi 2026: क्या अब भी सूनी है आपकी गोद, इस पुत्रदा एकादशी पर संतान सुख के लिए जरूर करें ये उपाय…
Putrada Ekadashi 2026: हिंदू धर्म की मान्यताओं में पौष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का स्थान अत्यंत उच्च और भावनात्मक माना गया है। इस वर्ष मंगलवार के दिन पड़ने वाली यह (Vedic Calendar) की तिथि उन महिलाओं के लिए आशा की एक नई किरण लेकर आई है जो लंबे समय से संतान सुख की प्रतीक्षा कर रही हैं। यह केवल एक व्रत नहीं, बल्कि मां की ममता और पिता के संरक्षण का वह संकल्प है जो आने वाली पीढ़ी के उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना के लिए श्रद्धापूर्वक रखा जाता है।

नक्षत्रों और सिद्ध योग का ऐसा दुर्लभ मिलन जो हर बाधा को हर लेगा
ज्योतिषीय दृष्टिकोण से इस बार की एकादशी बेहद खास है क्योंकि आकाश मंडल में शुभ ग्रहों और नक्षत्रों का अद्भुत सुसंयोग बन रहा है। आज के दिन भरणी नक्षत्र के पश्चात (Auspicious Nakshatra) कृत्तिका का आगमन हो रहा है जो देर रात तक प्रभावी रहेगा। इसके साथ ही सूर्योदय के समय से ही सिद्ध योग की उपस्थिति आपके द्वारा किए गए जप और तप के पुण्य फल को कई गुना बढ़ा देगी, जिससे आपकी अधूरी मनोकामनाएं पूर्ण होने की संभावना और अधिक प्रबल हो जाती है।
ग्रहों की चाल और आध्यात्मिक ऊर्जा का आपके जीवन पर प्रभाव
इस विशेष दिन पर ब्रह्मांड के प्रमुख ग्रहों की स्थिति भक्तों के लिए अनुकूलता का संचार कर रही है। मेष राशि में चंद्रमा और धनु राशि में सूर्य, मंगल व शुक्र का संगम (Planetary Alignment) एक ऐसी ऊर्जा पैदा कर रहा है जो मानसिक शांति और आत्मविश्वास में वृद्धि करती है। पंडितों का मानना है कि जब देवगुरु बृहस्पति मिथुन राशि में विराजमान हों और ऐसे शुभ योग बनें, तो भगवान विष्णु की आराधना सीधे हृदय तक पहुँचती है और पूर्व जन्मों के संचित दोषों का निवारण भी संभव हो जाता है।
दो बार आने वाली इस एकादशी का गहरा धार्मिक और सामाजिक महत्व
सनातन धर्म के ग्रंथों के अनुसार पुत्रदा एकादशी वर्ष में दो बार, पौष और श्रावण मास में आती है। इन दोनों ही तिथियों का (Religious Significance) समान रूप से फलदायी माना गया है, जिसे मुख्य रूप से नि:संतान दंपतियों के लिए वरदान कहा जाता है। जिनके घर में पहले से संतान है, वे उनके यशस्वी जीवन और कुल की वृद्धि के लिए यह व्रत रखते हैं। श्रीहरि विष्णु और माता लक्ष्मी की संयुक्त पूजा इस दिन दरिद्रता का नाश कर परिवार में सुख-समृद्धि के द्वार खोलती है।
व्रत की कठिन तपस्या और अटूट आस्था की प्राचीन परंपरा
एकादशी का व्रत केवल निराहार रहने का नाम नहीं है, बल्कि यह मन और आत्मा की शुद्धि का मार्ग है। श्रद्धालु सूर्योदय से पूर्व स्नान कर व्रत का (Sacred Vow) लेते हैं और पूरे दिन प्रभु के चरणों में अपना ध्यान केंद्रित करते हैं। भगवान विष्णु को प्रिय तुलसी दल, फल और दीप अर्पित करना इस पूजा का अनिवार्य हिस्सा है। रात भर जागरण कर विष्णु सहस्रनाम का पाठ करने से भक्तों को वह मानसिक बल प्राप्त होता है जिससे जीवन की कठिन से कठिन चुनौतियां भी आसान लगने लगती हैं।
रात्रि जागरण की महिमा और द्वादशी को व्रत का पूर्ण पारण
शास्त्रों में कहा गया है कि जो भक्त एकादशी की पूरी रात प्रभु के नाम का कीर्तन करते हैं, श्रीहरि उनसे अत्यंत प्रसन्न होते हैं। रात्रि जागरण के दौरान (Spiritual Awakening) का अनुभव भक्तों को ईश्वर के और समीप ले जाता है। व्रत का समापन अगले दिन द्वादशी तिथि को शुभ मुहूर्त में पारण के साथ किया जाता है। ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देने के बाद ही व्रत को पूर्ण माना जाता है, जिससे संतान संबंधी सभी ग्रह बाधाएं और शारीरिक व्याधियां शांत होने लगती हैं।
मंदिरों में उमड़ता श्रद्धा का सैलाब और सामूहिक प्रार्थना की शक्ति
इस अवसर पर देशभर के विष्णु मंदिरों में विशेष भव्यता देखने को मिलती है, जहाँ सुबह से ही भजन-कीर्तन और कथा वाचन का दौर शुरू हो जाता है। सामूहिक रूप से की गई (Community Prayer) की शक्ति व्यक्ति के भीतर सकारात्मकता का संचार करती है। भक्त न केवल अपने लिए बल्कि संपूर्ण जगत की भावी पीढ़ी के कल्याण की प्रार्थना करते हैं। मंदिरों की गूंज और शंखों की ध्वनि यह संदेश देती है कि आस्था और विश्वास के साथ की गई कोई भी पुकार कभी अनसुनी नहीं रहती।



