Bihar Dying Rivers Crisis: 60 से अधिक जलधाराओं का वजूद खतरे में, दम तोड़ रही हैं बिहार की नदियां…
Bihar Dying Rivers Crisis: बिहार की धरती को सींचने वाली पांच दर्जन से अधिक नदियां आज अपने अस्तित्व की अंतिम लड़ाई लड़ रही हैं। मानवीय लालच और (Environmental Degradation in Bihar) के कारण ये नदियां अब केवल सरकारी फाइलों तक ही सीमित रह गई हैं। कभी कल-कल बहने वाली ये धाराएं अब मानसून के बीतते ही धूल भरे मैदानों में तब्दील हो जाती हैं। कोसी और सीमांचल से लेकर पूर्वी बिहार तक, हर क्षेत्र में नदियों का गला घोंटा जा रहा है।

अतिक्रमण और प्रदूषण का दोहरा प्रहार
नदियों के लुप्त (Bihar Dying Rivers Crisis) होने का सबसे बड़ा कारण उन पर अवैध कब्जा और बढ़ता प्रदूषण है। उदाहरण के तौर पर, सौरा नदी जो कभी अपनी उन्मुक्त धारा के लिए प्रसिद्ध थी, आज (River Bed Encroachment) की वजह से एक संकरे नाले में तब्दील हो गई है। सहरसा की तिलावे और सुरसर नदियों का भी यही हाल है। कोसी की सहायक उपधाराएं और आगर नदी पूरी तरह सूख चुकी हैं, जिससे न केवल पारिस्थितिकी तंत्र बिगड़ रहा है बल्कि भूजल स्तर भी तेजी से नीचे गिर रहा है।
कहीं खेत बने तो कहीं खेल के मैदान
नदियों की दयनीय स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके बहाव क्षेत्र में अब फसलें लहलहा रही हैं। मानसून खत्म होते ही नदियों के सूखे तल पर (Land Use Transformation) का खेल शुरू हो जाता है। बच्चे वहां क्रिकेट खेलते नजर आते हैं तो कहीं बड़े-बड़े मेलों का आयोजन होता है। लखीसराय की किऊल और हरोहर जैसी प्रमुख नदियां भी इस बेरुखी का शिकार होकर अपना मार्ग खोती जा रही हैं।
सिंचाई और खेती पर मंडराया संकट
नदियों के सूखने का सीधा असर बिहार की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। बांका की चांदन, ओढ़नी और चीर नदियां जब तक जीवित थीं, किसानों को सिंचाई की चिंता नहीं होती थी। अब (Agricultural Water Scarcity) के कारण किसानों को महंगी सिंचाई पर निर्भर होना पड़ रहा है। यदि समय रहते सरकारी तंत्र ने इन नदियों के पुनरुद्धार और बेहतर प्रबंधन की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए, तो बिहार का जल संकट आने वाले समय में विकराल रूप ले लेगा।



