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Congress Solo Strategy West Bengal 2026: वाम मोर्चा से गठबंधन तोड़ने की तैयारी, क्या अकेले लड़ने का मास्टरस्ट्रोक दिलाएगा खोई हुई जमीन…

Congress Solo Strategy West Bengal 2026: पश्चिम बंगाल के सियासी गलियारों में इन दिनों एक बड़ी हलचल महसूस की जा रही है। बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों से सबक लेते हुए कांग्रेस अब बंगाल में अपनी (Strategic Political Realignment) की दिशा बदलती नजर आ रही है। सूत्रों की मानें तो पार्टी इस बार वाम मोर्चा (Left Front) के साथ दशकों पुराने गठबंधन को तिलांजलि देकर अकेले चुनाव मैदान में उतरने का मन बना चुकी है। यह निर्णय केवल बंगाल तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे दक्षिण भारत के एक महत्वपूर्ण राज्य केरल की सत्ता को हासिल करने की एक गहरी और सोची-समझी रणनीति छिपी है।

Congress Solo Strategy West Bengal 2026
Congress Solo Strategy West Bengal 2026
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केरल बनाम बंगाल: गठबंधन का वो विरोधाभासी जाल

कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी दुविधा यह रही है कि वह पश्चिम बंगाल में जिस वाम मोर्चा के साथ हाथ मिलाती है, केरल में वही उसका सबसे बड़ा राजनीतिक दुश्मन है। (Inter-state Political Paradox) की इस स्थिति ने अक्सर पार्टी के कार्यकर्ताओं और मतदाताओं को भ्रमित किया है। केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ (UDF) और वामपंथी एलडीएफ (LDF) आमने-सामने होते हैं। ऐसे में एक राज्य में दोस्ती और दूसरे में कुश्ती की नीति ने केरल में वाम सरकार के खिलाफ कांग्रेस के विरोध की धार को कमजोर किया है, जिसका फायदा उठाकर वहां लेफ्ट लगातार दूसरी बार सरकार बनाने में सफल रहा।

गठबंधन का कड़वा अनुभव और गिरता ग्राफ

आंकड़ों पर नजर डालें तो कांग्रेस और वाम मोर्चा के गठबंधन ने बंगाल में कोई चमत्कार नहीं दिखाया है। वर्ष 2016 में जहां कांग्रेस को 44 और लेफ्ट को 26 सीटें मिली थीं, वहीं 2021 के विधानसभा चुनाव में (Bilateral Alliance Failure) की वजह से दोनों का सूपड़ा साफ हो गया। 2021 में दोनों पार्टियों को एक भी सीट नसीब नहीं हुई, जबकि भाजपा ने 38 फीसदी वोट शेयर के साथ 77 सीटों पर कब्जा कर लिया। इस शर्मनाक हार ने कांग्रेस को अपनी रणनीति पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर कर दिया है, ताकि वह भाजपा और तृणमूल के बीच ‘वोट कटवा’ बनकर न रह जाए।

शुभंकर सरकार: संगठन की मजबूती पर अटूट भरोसा

पश्चिम बंगाल कांग्रेस के नवनियुक्त अध्यक्ष शुभंकर सरकार इस बार ‘एकला चलो’ की नीति के प्रबल समर्थक बनकर उभरे हैं। उनका मानना है कि (Grassroots Organizational Strength) के मामले में पार्टी अब पहले से कहीं अधिक सुदृढ़ हुई है। शुभंकर सरकार ने केंद्रीय नेतृत्व को स्पष्ट रूप से अवगत कराया है कि वाम मोर्चा के साथ जाने से पार्टी को लाभ के बजाय नुकसान ही हो रहा है। उन्होंने तर्क दिया है कि अकेले लड़ने से पार्टी न केवल अपनी विचारधारा को मजबूती से रख पाएगी, बल्कि कुछ महत्वपूर्ण सीटों पर जीत हासिल कर अपनी गरिमा भी वापस पा सकेगी।

ध्रुवीकरण की राजनीति और आम आदमी के मुद्दे

2021 के चुनाव में बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच जबरदस्त धार्मिक ध्रुवीकरण देखा गया था। इस शोर में (Issue-based Campaign Strategy) कहीं दबकर रह गई थी। कांग्रेस का मानना है कि अकेले चुनाव लड़ने पर वह खुद को इन दोनों ध्रुवों से अलग एक तीसरे विकल्प के रूप में पेश कर सकेगी। पार्टी इस बार सांप्रदायिक मुद्दों के बजाय बेरोजगारी, महंगाई और स्थानीय विकास जैसे आम आदमी से जुड़े विषयों को हथियार बनाने की तैयारी में है। गठबंधन के बोझ से मुक्त होकर कांग्रेस अपनी विशिष्ट पहचान को जनता के बीच ले जाना चाहती है।

केरल कांग्रेस का दबाव और भविष्य की योजनाएं

बंगाल में गठबंधन तोड़ने के पीछे केरल इकाई का दबाव भी एक मुख्य कारण है। केरल में हाल ही में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में (Local Body Poll Performance) कांग्रेस के लिए उत्साहजनक रहा है। वहां के वरिष्ठ नेताओं का तर्क है कि यदि बंगाल में वामपंथियों से दूरी बना ली जाए, तो केरल विधानसभा चुनाव 2026 में कांग्रेस सत्ता विरोधी लहर का पूरा फायदा उठा सकेगी। केरल के नेता नहीं चाहते कि बंगाल की ‘दोस्ती’ उनके अपने घर में जीत की संभावनाओं को धूमिल करे।

तृणमूल और भाजपा के लिए बदलेगा समीकरण

अगर कांग्रेस अकेले लड़ने का फैसला आधिकारिक कर देती है, तो बंगाल का मुकाबला त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय हो सकता है। इससे (Electoral Vote Splitting) का लाभ किसे मिलेगा, यह कहना अभी मुश्किल है। तृणमूल कांग्रेस जहां ममता बनर्जी के नेतृत्व में अकेले लड़ने का पहले ही ऐलान कर चुकी है, वहीं भाजपा अपने ‘मिशन बंगाल’ को लेकर आक्रामक है। ऐसे में कांग्रेस का यह ‘एकला चलो’ का नारा बंगाल की राजनीति में छोटे दलों और निर्दलीयों के लिए भी नए रास्ते खोल सकता है।

निष्कर्ष: एक कठिन लेकिन साहसिक कदम

कांग्रेस के लिए 2026 का सफर आसान नहीं होने वाला है। शून्य से शुरुआत करना और एक दशक से अधिक के गठबंधन को तोड़ना (High-risk Political Maneuver) की श्रेणी में आता है। हालांकि, केरल की सत्ता वापसी और बंगाल में अपने वजूद को बचाने के लिए यह एक आवश्यक कदम प्रतीत होता है। अब यह तो समय ही बताएगा कि कांग्रेस का यह जुआ उसे फिर से सत्ता के केंद्र में लाता है या फिर विभाजन के इस खेल में वह और पीछे छूट जाती है। लेकिन इतना तय है कि बंगाल की चुनावी बिसात पर अब नई चालें चली जा रही हैं।

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