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Nagpur Municipal Corporation Election 2026: विश्वासघात की टीस और अपनों की बगावत, क्या नागपुर का किला बचा पाएगी भाजपा…

Nagpur Municipal Corporation Election 2026: नागपुर की राजनीति में इन दिनों एक अजीब सी बेचैनी और आक्रोश का माहौल है। दशकों तक पार्टी की विचारधारा को अपने खून-पसीने से सींचने वाले कार्यकर्ताओं ने अब अपनी ही पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। भाजपा के कई दिग्गज और वफादार सिपाही, जिन्होंने पार्टी को शून्य से शिखर तक पहुँचाने में अपना जीवन खपा दिया, आज टिकट वितरण से (Political Conflict) इतने आहत हैं कि उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। यह असंतोष केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उन सैकड़ों कार्यकर्ताओं की सामूहिक आवाज है जो खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

Nagpur Municipal Corporation Election 2026
Nagpur Municipal Corporation Election 2026

मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री के गृह क्षेत्र में दरार

नागपुर केवल एक शहर नहीं, बल्कि भाजपा के दो सबसे कद्दावर नेताओं, देवेंद्र फडणवीस और नितिन गडकरी का गढ़ है। यहाँ होने वाली हर राजनीतिक हलचल का असर पूरे प्रदेश पर पड़ता है। आगामी 15 जनवरी को होने वाले 151 सीटों के चुनाव के लिए (Nagpur Political Crisis) जिस तरह से पार्टी ने दलबदलुओं और बाहरी लोगों को प्राथमिकता दी है, उसने पुराने कैडर के भीतर एक ज्वालामुखी को जन्म दे दिया है। भाजपा जहाँ 143 सीटों पर ताल ठोक रही है, वहीं पार्टी के भीतर की यह अंतर्कलह उसकी चुनावी गणित को बिगाड़ सकती है।

पूर्व महापौर के घर में छिड़ी सियासी जंग

राजनीति अक्सर रिश्तों पर भारी पड़ जाती है और इसका सबसे जीवंत उदाहरण विनायक देहांकर के रूप में सामने आया है। पूर्व महापौर अर्चना देहांकर के पति विनायक देहांकर को जब वार्ड 17 से टिकट नहीं मिला, तो उनके सब्र का बांध टूट गया। सालों की मेहनत के बाद भी जब पार्टी ने (Candidate Selection Controversy) उन्हें दरकिनार किया, तो उन्होंने भारी मन से इस्तीफा देकर निर्दलीय मैदान में उतरने का फैसला किया। विडंबना देखिए कि जहाँ पति बगावत पर आमादा हैं, वहीं उनकी पत्नी अर्चना देहांकर ने स्पष्ट कर दिया है कि वह पार्टी के साथ खड़ी रहेंगी और अपने पति के खिलाफ प्रचार करेंगी।

दलबदलुओं को तरजीह और निष्ठावानों की अनदेखी

विनायक देहांकर का दर्द अकेले उनका नहीं है, बल्कि यह उस हर कार्यकर्ता की पीड़ा है जो सत्ता की चौखट पर खुद को उपेक्षित पाता है। उन्होंने साफ कहा कि यदि पार्टी किसी युवा और ऊर्जावान कार्यकर्ता को मौका देती तो उन्हें कोई मलाल नहीं होता। लेकिन कांग्रेस से आए (Internal Rebellion In BJP) बागियों और दूसरे वार्ड के पैराशूट उम्मीदवारों को टिकट देना उनके आत्मसम्मान को गहरी चोट पहुँचा गया। जिस कांग्रेस के गढ़ में उन्होंने भाजपा का कमल खिलाया, आज उसी गढ़ में उन्हें बाहरी लोगों के लिए रास्ता छोड़ने को कहा जा रहा है।

वार्ड 16 में सामूहिक इस्तीफों का सैलाब

असंतोष की यह लहर केवल एक वार्ड तक सीमित नहीं है। वार्ड 16 (डी) में जब वार्ड अध्यक्ष गजानन निशितकर को टिकट देने से मना किया गया, तो पार्टी के प्रति दशकों पुरानी वफादारी ताश के पत्तों की तरह ढह गई। उनके साथ लगभग 80 सक्रिय (Local Leadership Issues) कार्यकर्ताओं ने एक साथ अपने पदों से इस्तीफा दे दिया। निशितकर पिछले 30 वर्षों से भाजपा की सेवा कर रहे थे। 2017 में भी उन्होंने पार्टी के आदेश पर अपनी दावेदारी त्याग दी थी, लेकिन इस बार किसी बाहरी महिला उम्मीदवार को थोपे जाने के फैसले ने उनके धैर्य की परीक्षा ले ली।

छह बार के पार्षद का बागी अवतार

अनुभव जब उपेक्षा का शिकार होता है, तो वह सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरता है। छह बार के पार्षद रहे अनुभवी नेता सुनील अग्रवाल का वार्ड 14 से टिकट कटना राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। समर्थकों का तर्क है कि (Independent Candidate Strategy) जब यह सीट अनारक्षित थी, तो पार्टी ने एक महिला उम्मीदवार को यहाँ क्यों उतारा? अग्रवाल का निर्दलीय चुनाव लड़ना भाजपा के लिए उस क्षेत्र में एक बड़ा सिरदर्द साबित हो सकता है जहाँ उनकी पकड़ दशकों से मजबूत रही है।

संघ के गढ़ में भी विरोध की गूँज

सबसे चौंकाने वाली खबर महल क्षेत्र के वार्ड 22 से आ रही है, जहाँ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का मुख्यालय स्थित है। यहाँ से संघ से जुड़े युवा उद्यमी और खिलाड़ी निनाद दीक्षित ने स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में नामांकन दाखिल किया है। संघ की पृष्ठभूमि (Civic Polls Maharashtra) वाले व्यक्ति का इस तरह से चुनाव मैदान में उतरना यह दर्शाता है कि असंतोष की जड़ें कितनी गहरी हो चुकी हैं। यह स्थिति बताती है कि इस बार चुनाव केवल विकास के मुद्दे पर नहीं, बल्कि मान-सम्मान और पहचान की लड़ाई बन चुका है।

त्रिकोणीय और चतुष्कोणीय मुकाबले के आसार

नागपुर नगर निगम चुनाव इस बार किसी भी दल के लिए आसान नहीं रहने वाला है। कांग्रेस जहाँ सभी 151 सीटों पर अकेले चुनाव लड़कर अपनी पुरानी जमीन तलाश रही है, वहीं शरद पवार और अजीत पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के गुट भी (Multi-Party Election Race) अपनी ताकत झोंक रहे हैं। इन सबके बीच भाजपा के बागियों का निर्दलीय रूप में खड़ा होना वोटों के ध्रुवीकरण को प्रभावित करेगा। कार्यकर्ताओं का यह गुस्सा चुनाव परिणामों में किस करवट बैठेगा, यह तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन वर्तमान में इसने भाजपा की राह कांटों भरी कर दी है।

क्या डैमेज कंट्रोल कर पाएगी भाजपा?

अब सवाल यह उठता है कि क्या भाजपा का शीर्ष नेतृत्व समय रहते इन बागियों को मनाने में सफल हो पाएगा? नागपुर में पार्टी की साख दांव पर लगी है। यदि समय रहते (Political Party Discipline) इन असंतुष्ट स्वरों को शांत नहीं किया गया, तो यह बगावत अन्य नगर पालिकाओं के चुनावों में भी संक्रमण की तरह फैल सकती है। पार्टी को यह समझना होगा कि महल और मीनारों की मजबूती उसकी नींव के पत्थरों यानी कार्यकर्ताओं पर टिकी होती है, और जब नींव ही डगमगाने लगे तो शिखर का सुरक्षित रहना मुश्किल हो जाता है।

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