Trump Apache Helicopter Claim: पीएम मोदी के नाम पर फिर से छिड़ा नया विवाद, क्या आंकड़ों के खेल में उलझ गया अमेरिकी शहजाद…
Trump Apache Helicopter Claim: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी बेबाक बयानबाजी और दावों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर हैं, लेकिन इस बार उन्होंने भारत और प्रधानमंत्री मोदी का नाम लेकर जो दावा किया है, उसने नई बहस छेड़ दी है। ट्रंप ने हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान शेखी बघारते हुए कहा कि भारत ने अमेरिका को 68 अपाचे अटैक हेलिकॉप्टरों का ऑर्डर दिया था और इनकी डिलीवरी में हो रही देरी के कारण पीएम मोदी को खुद उनसे मिलने का समय मांगना पड़ा। (Geopolitical Strategic Relations) के गलियारों में इस बयान को लेकर काफी चर्चा है, क्योंकि ट्रंप ने इस बातचीत को काफी नाटकीय अंदाज में पेश किया है।

आंकड़ों की बाजीगरी और जमीनी हकीकत
ट्रंप का यह दावा कि भारत ने 68 हेलिकॉप्टरों का ऑर्डर दिया था, रक्षा विशेषज्ञों और आधिकारिक रिकॉर्ड्स की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। हकीकत तो यह है कि भारत ने अब तक अमेरिका से कुल मिलाकर केवल 28 अपाचे हेलिकॉप्टर ही खरीदे हैं। (Defense Procurement Records) की जांच करने पर पता चलता है कि ट्रंप द्वारा बताया गया आंकड़ा वास्तविक संख्या से दोगुने से भी कहीं अधिक है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या अमेरिकी राष्ट्रपति ने जानबूझकर इन आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया है या यह महज एक मानवीय चूक है।
पहले सौदे की कहानी और ओबामा काल
भारत और अमेरिका के बीच अपाचे हेलिकॉप्टरों की खरीद का सफर दो अलग-अलग चरणों में पूरा हुआ। पहला बड़ा समझौता सितंबर 2015 में बराक ओबामा के कार्यकाल के दौरान हुआ था, जिसमें भारतीय वायुसेना के लिए 22 हेलिकॉप्टर खरीदने की डील फाइनल हुई थी। लगभग 2.2 अरब डॉलर के इस (Military Aircraft Contracts) के तहत सभी हेलिकॉप्टरों की आपूर्ति तय समय पर हुई और साल 2020 तक ये सभी भारतीय वायुसेना की अग्रिम स्क्वाड्रनों का हिस्सा बन गए। इस चरण में डिलीवरी को लेकर कोई बड़ा विवाद सामने नहीं आया था।
ट्रंप के कार्यकाल में हुआ दूसरा समझौता
दूसरा समझौता फरवरी 2020 में उस समय हुआ था जब डोनाल्ड ट्रंप खुद भारत के दौरे पर आए थे। इस डील के अंतर्गत भारतीय थल सेना के लिए 6 अतिरिक्त अपाचे हेलिकॉप्टर खरीदने पर सहमति बनी थी, जिसकी लागत करीब 60 से 80 करोड़ डॉलर थी। (International Arms Trade) के इस छोटे लेकिन महत्वपूर्ण ऑर्डर में ही डिलीवरी की असल समस्या शुरू हुई। इसी सौदे में हो रही देरी का जिक्र पीएम मोदी ने फरवरी 2025 की अपनी वाइट हाउस यात्रा के दौरान किया था, जिसे अब ट्रंप अपने अंदाज में पेश कर रहे हैं।
डिलीवरी में देरी के पीछे के असल कारण
भारतीय सेना के लिए खरीदे गए इन 6 हेलिकॉप्टरों की सप्लाई में करीब 15 से 20 महीनों का विलंब हुआ। इसके पीछे मुख्य वजह बोइंग के एरिजोना स्थित प्लांट में कोरोना के बाद उपजी सप्लाई चेन की समस्याएं थीं। (Global Supply Chain Disruptions) के कारण इंजन, गियरबॉक्स और महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स की भारी कमी हो गई थी। इसके अलावा, कुछ तकनीकी खराबी और सुरक्षा चिंताओं के चलते बोइंग को वैश्विक स्तर पर अपने ऑपरेशन्स में कुछ समय के लिए बदलाव करना पड़ा था, जिसका सीधा असर भारतीय ऑर्डर पर पड़ा।
तुर्की का अड़ंगा और आखिरी बैच की देरी
अपाचे हेलिकॉप्टरों की डिलीवरी की राह में केवल तकनीकी ही नहीं, बल्कि कूटनीतिक बाधाएं भी आईं। नवंबर 2025 में जब आखिरी बैच भारत भेजा जा रहा था, तब तुर्की ने इन हेलिकॉप्टरों को ले जा रहे एंटोनोव-124 विमान को अपने हवाई क्षेत्र से गुजरने की अनुमति देने से इनकार कर दिया। इस (Aviation Diplomacy Issues) के चलते विमान को आधे रास्ते से लौटना पड़ा, जिससे डिलीवरी में कई हफ्तों की और देरी हो गई। हालांकि, दिसंबर 2025 के अंत तक भारत को सभी 28 हेलिकॉप्टर प्राप्त हो चुके हैं।
‘मेक इन इंडिया’ और प्रचंड का उदय
अपाचे सौदे में हुई देरी और अमेरिकी सप्लाई चेन पर अत्यधिक निर्भरता ने भारत को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है। अब भारत ‘आत्मनिर्भर भारत’ नीति के तहत स्वदेशी विकल्पों पर अधिक जोर दे रहा है। इसी कड़ी में (Indigenous Defense Technology) के रूप में ‘प्रचंड’ लाइट कॉम्बैट हेलिकॉप्टर को प्राथमिकता दी जा रही है। प्रचंड विशेष रूप से 20 हजार फीट की ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों में उड़ान भरने में सक्षम है, जहां भारी-भरकम अपाचे हेलिकॉप्टर को चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
डोनाल्ड ट्रंप के दावे चाहे जो भी हों, लेकिन भारत का झुकाव अब स्पष्ट रूप से स्वदेशी निर्माण की ओर है। भारत की योजना अपनी सेना और वायुसेना के बेड़े में 156 प्रचंड हेलिकॉप्टर शामिल करने की है। (National Defense Sovereignty) को मजबूत करने के लिए भारत अब विदेशी तकनीक के साथ-साथ अपनी ताकत बढ़ाने पर फोकस कर रहा है। ट्रंप के बयान शायद कूटनीतिक हलकों में सुर्खियां बटोरते रहें, लेकिन रक्षा क्षेत्र में भारत की आत्मनिर्भरता की कहानी अब अपाचे से आगे बढ़कर प्रचंड तक जा पहुँची है।



