Bangladesh Minority Violence Crisis: नफरत की आग में जलता बांग्लादेश, खूनी चुनावी जंग और डरी हुई आवाम…
Bangladesh Minority Violence Crisis: पड़ोसी देश बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय के खिलाफ हिंसा का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। हाल ही में एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है, जहां 25 वर्षीय हिंदू युवक मिथुन सरकार की जान चली गई। बताया जा रहा है कि चोरी के झूठे संदेह में उग्र भीड़ ने उसे घेर लिया था। उस खूंखार भीड़ से अपनी जान बचाने के लिए मिथुन ने पास की एक नहर में छलांग लगा दी, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। मंगलवार दोपहर भंडारपुर गांव के पास से पुलिस ने उसका निर्जीव शव बरामद किया। (Targeted Religious Persecution) के इस ताजा मामले ने बांग्लादेश के भीतर और बाहर मानवीय संवेदनाओं को झकझोर कर रख दिया है।

चुनावी आहट और अल्पसंख्यकों में दहशत
मिथुन सरकार की मौत कोई इकलौती घटना नहीं है, बल्कि यह हाल के दिनों में जारी क्रूर हमलों की एक लंबी कड़ी का हिस्सा है। बांग्लादेश में हिंदू, बौद्ध और ईसाई एकता परिषद ने एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की है, जिसमें चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, अकेले दिसंबर महीने में कम से कम 51 लक्षित हिंसक घटनाएं दर्ज की गई हैं। इन घटनाओं में (Systematic Political Violence) का एक खतरनाक पैटर्न नजर आ रहा है, जिसका उद्देश्य आगामी 12 फरवरी को होने वाले संसदीय चुनावों से पहले अल्पसंख्यकों के मन में भय का माहौल पैदा करना है। परिषद ने इन अत्याचारों को सुनियोजित बताया है।
सत्ता परिवर्तन के बाद गहराता सुरक्षा संकट
बांग्लादेश इस समय एक अभूतपूर्व राजनीतिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है। साल 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद से देश में संस्थागत कमजोरी साफ दिखाई दे रही है। अंतरिम सरकार के कार्यकाल में सांप्रदायिक तनाव और (Institutional Failure of Law) का एक ऐसा संयोजन बना है, जिसने अल्पसंख्यकों को पूरी तरह असुरक्षित बना दिया है। परिषद का मानना है कि पुलिस और प्रशासन की निष्क्रियता ने दंगाइयों के हौसले बुलंद कर दिए हैं। 12 फरवरी 2026 को होने वाले चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, हिंसा का यह चक्र और भी तीव्र होता जा रहा है।
मासूमों के खून से सनी बांग्लादेश की गलियां
पिछले कुछ दिनों में हुई घटनाओं की श्रृंखला किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्मनाक है। 5 जनवरी को जेसोर जिले में एक हिंदू व्यापारी और समाचार पत्र के संपादक राणा कांति बैरागी की सरेआम गोली मारकर हत्या कर दी गई। उसी दिन नरसिंगदी में एक छोटी सी किराने की दुकान चलाने वाले मोनी चक्रवर्ती को धारदार हथियारों से मौत के घाट उतार दिया गया। (Brutal Communitarian Attacks) की ये घटनाएं दर्शाती हैं कि हमलावरों के मन में कानून का कोई खौफ नहीं रह गया है। हर बीतता दिन किसी न किसी बेगुनाह की जान ले रहा है, जिससे समुदाय के भीतर असुरक्षा की भावना चरम पर पहुंच गई है।
क्रूरता की हद पार करती भीड़ की हिंसा
हिंसा का यह तांडव केवल हत्याओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें बर्बरता का पुट भी शामिल है। 3 जनवरी को शरियतपुर के खोकोन चंद्र दास ने अस्पताल में दम तोड़ दिया, जिन पर जानलेवा हमला किया गया था। इससे पहले दिसंबर में राजबारी के अमृत मंडल की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी। मयमनसिंह की घटना तो रूह कंपा देने वाली थी, जहां दीपू चंद्र दास को न केवल भीड़ ने पीटा, बल्कि (Human Rights Violation Cases) की पराकाष्ठा करते हुए उनके शव को आग के हवाले कर दिया गया। ये घटनाएं साबित करती हैं कि समाज का एक हिस्सा पूरी तरह से कट्टरपंथ की गिरफ्त में आ चुका है।
डराने-धमकाने का सुनियोजित चुनावी हथियार
मानवाधिकार पर्यवेक्षकों और जानकारों का मानना है कि ये हत्याएं केवल छिटपुट घटनाएं नहीं हैं। इनके पीछे एक सोची-समझी रणनीति काम कर रही है ताकि अल्पसंख्यकों को मतदान केंद्रों से दूर रखा जा सके। आगजनी, लूटपाट और महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों का विवरण देते हुए एकता परिषद ने कहा है कि (Minority Intimidation Tactics) के जरिए लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है। अगर राज्य अपनी रक्षा करने की क्षमता खो देता है, तो इसके परिणाम पूरे दक्षिण एशिया के लिए विनाशकारी हो सकते हैं।
अंतरिम सरकार की विफलता और वैश्विक चिंता
वर्तमान अंतरिम सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती कानून व्यवस्था को बहाल करना है, जिसमें वह अब तक विफल नजर आई है। देश के सबसे कमजोर नागरिकों की रक्षा करने में शासन की अक्षमता ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान भी अपनी ओर खींचा है। (International Security Monitoring) एजेंसियों का कहना है कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की स्थिति अब गंभीर चिंता का विषय बन गई है। जैसे-जैसे चुनावी सरगर्मी बढ़ रही है, हिंसा के शिकार लोगों को केवल न्याय की उम्मीद है, जो फिलहाल कोसों दूर नजर आती है।
मानवाधिकार संगठनों की कड़ी चेतावनी
विभिन्न मानवाधिकार संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि हिंसा पर तुरंत लगाम नहीं लगाई गई, तो आने वाले दिनों में पलायन की स्थिति पैदा हो सकती है। रिपोर्टों में बताया गया है कि कई परिवारों ने डर के मारे अपने घर छोड़ दिए हैं। (Social Fabric Disruption) के इस दौर में बांग्लादेश की साझी संस्कृति खतरे में है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को अब केवल बयानों तक सीमित न रहकर धरातल पर अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए दबाव बनाना होगा, ताकि 12 फरवरी का चुनाव शांतिपूर्ण और निष्पक्ष तरीके से संपन्न हो सके।
निष्कर्ष: क्या सुरक्षित रह पाएंगे अल्पसंख्यक?
बांग्लादेश का भविष्य अब इस बात पर निर्भर करता है कि वहां का प्रशासन अपने अल्पसंख्यकों को कितनी सुरक्षा दे पाता है। मिथुन सरकार जैसे युवाओं की मौतें केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि ये एक मरती हुई मानवता की चीखें हैं। (Democratic Values Protection) के लिए यह अनिवार्य है कि सांप्रदायिक ताकतों को कुचला जाए और दोषियों को कड़ी सजा दी जाए। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो बांग्लादेश का लोकतंत्र हमेशा के लिए सांप्रदायिकता की भेंट चढ़ जाएगा। अब देखना यह है कि क्या आने वाला चुनाव अल्पसंख्यकों के जीवन में उजाला लेकर आता है या यह अंधेरा और गहरा हो जाता है।



