Trump Greenland Purchase Offer 2026: बड़ा सौदा! ग्रीनलैंड के एक-एक नागरिक को खरीदने की फिराक मे हैं डोनाल्ड ट्रंप
Trump Greenland Purchase Offer 2026: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अपने अप्रत्याशित फैसलों से पूरी दुनिया को चौंका रहे हैं। इस बार उनकी नजर किसी कंपनी या द्वीप पर नहीं, बल्कि ग्रीनलैंड की पूरी आबादी पर है। ट्रंप ने स्पष्ट कर दिया है कि (Global Strategic Expansion) के लिए ग्रीनलैंड अमेरिका की अनिवार्य जरूरत बन चुका है। रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका ने अब ग्रीनलैंड के 57 हजार नागरिकों के भविष्य की कीमत तय कर दी है, जिसे लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नई बहस छिड़ गई है।

अरबों डॉलर का नकद ऑफर और चुनावी बिसात
रॉयटर्स की एक ताजा रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि व्हाइट हाउस के अधिकारी ग्रीनलैंड के नागरिकों को एकमुश्त राशि देने पर विचार कर रहे हैं। चर्चा इस बात पर है कि यदि वहां के लोग डेनमार्क का साथ छोड़कर अमेरिका में शामिल होते हैं, तो उन्हें (Direct Cash Transfer) के रूप में 10,000 से 1,00,000 डॉलर तक दिए जा सकते हैं। इस पूरी योजना पर अमेरिका करीब 6 बिलियन डॉलर खर्च करने को तैयार है, ताकि इस बर्फ से ढके द्वीप को अमेरिकी नक्शे का हिस्सा बनाया जा सके।
सैन्य शक्ति के इस्तेमाल की डरावनी आहट
ट्रंप प्रशासन ने ग्रीनलैंड को हासिल करने के लिए केवल पैसों का ही लालच नहीं दिया है, बल्कि सख्त लहजा भी अपनाया है। अमेरिकी अधिकारियों ने कई बार संकेत दिए हैं कि वे इस विलय के लिए (Military Intervention Potential) जैसे कठोर रास्ते भी चुन सकते हैं। प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट ने एक ब्रीफिंग में स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति और उनके सुरक्षा सलाहकार इस ‘संभावित खरीद’ के हर कानूनी और सैन्य पहलू की गहराई से जांच कर रहे हैं, जिसने डेनमार्क की नींद उड़ा दी है।
यूरोप की ललकार और नाटो के अस्तित्व पर संकट
यूरोपीय देशों ने अमेरिका की इस मंशा को सीधे तौर पर संप्रभुता का उल्लंघन करार दिया है। फ्रांस, जर्मनी और पोलैंड समेत कई देशों ने एक संयुक्त बयान जारी कर अमेरिका को लक्ष्मण रेखा न लांघने की हिदायत दी है। सबसे कड़ा रुख डेनमार्क ने अपनाया है, जिसने स्पष्ट रूप से चेतावनी दी है कि (Sovereignty and NATO Alliance) पर किया गया कोई भी हमला इस सैन्य गठबंधन के अंत का कारण बन सकता है। डेनमार्क के अनुसार, ग्रीनलैंड कोई बिकाऊ वस्तु नहीं बल्कि वहां के लोगों की धरोहर है।
चीन के एकाधिकार को तोड़ने की छटपटाहट
आखिर अमेरिका ग्रीनलैंड के लिए इतना बेताब क्यों है? इसका मुख्य कारण वहां दबे खनिज संसाधनों का असीमित भंडार है। ग्रीनलैंड में (Rare Earth Minerals Supply) का विशाल खजाना है, जो स्मार्टफोन, कंप्यूटर और इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी के लिए अनिवार्य है। वर्तमान में इन खनिजों पर चीन का कब्जा है और अमेरिका इस निर्भरता को खत्म कर अपनी तकनीक और रक्षा क्षेत्र को सुरक्षित करना चाहता है।
आर्कटिक की बर्फ और नई समुद्री राहें
जलवायु परिवर्तन के कारण आर्कटिक की बर्फ पिघल रही है, जिससे व्यापार के लिए नए और छोटे समुद्री रास्ते खुल रहे हैं। ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति (Arctic Security Strategy) के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान भी अमेरिका ने इसे नाजियों से बचाने के लिए अपने नियंत्रण में लिया था। अब रूस और चीन की इस क्षेत्र में बढ़ती सक्रियता ने अमेरिका को अपनी पुरानी रणनीति दोहराने पर मजबूर कर दिया है, ताकि वह उत्तरी अटलांटिक रास्तों पर अपना दबदबा बनाए रख सके।
ग्रीनलैंड के नागरिकों की दुविधा और राष्ट्रवाद
जहां अमेरिका डॉलर बरसाने की बात कर रहा है, वहीं ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री और आम जनता ने इस प्रस्ताव को अपमानजनक बताया है। उनके लिए यह केवल पैसे का सवाल नहीं, बल्कि उनकी (Cultural Identity and Freedom) का विषय है। ट्रंप की धमकी भरी भाषा ने वहां के लोगों में अमेरिका के प्रति आक्रोश पैदा कर दिया है। अब देखना यह होगा कि क्या 2026 की यह महाशक्तिशाली होड़ किसी नए युद्ध को जन्म देगी या कूटनीति की मेज पर ही सिमट कर रह जाएगी



