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India US Trade Relations: एक फोन कॉल और टूट गया भारत का सपना, जानें ट्रंप के साथ होने वाले महासौदे के पीछे की हकीकत…

India US Trade Relations: भारत और अमेरिका के बीच जिस व्यापारिक समझौते को लेकर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी थीं, उसके विफल होने की एक चौंकाने वाली कहानी अब सतह पर आ गई है। अमेरिकी वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लुटनिक के दावों ने कूटनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है, जिसमें कहा गया है कि यह ऐतिहासिक (comprehensive trade deal) साल 2025 के मध्य में हस्ताक्षर के लिए लगभग मेज पर रखी थी। लेकिन जैसे ही इसे अंतिम रूप देने का समय आया, पर्दे के पीछे कुछ ऐसा घटा जिसने सालों की मेहनत पर पानी फेर दिया।

India US Trade Relations
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पीएम मोदी का वो फोन और ट्रंप की अधूरी उम्मीद

हॉवर्ड लुटनिक का सबसे विवादास्पद दावा यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर इस सौदे को फिलहाल टालने की मंशा जताई थी। लुटनिक के अनुसार, अमेरिका उम्मीद कर रहा था कि पीएम मोदी एक औपचारिक फोन कॉल के जरिए (diplomatic engagement) को आगे बढ़ाएंगे, लेकिन भारत ने उस समय इस दिशा में कोई विशेष उत्साह नहीं दिखाया। बताया जा रहा है कि भारतीय पक्ष उस दौर में उपजी कूटनीतिक परिस्थितियों के कारण इस बड़े समझौते को लेकर पूरी तरह सहज महसूस नहीं कर पा रहा था।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ और कूटनीतिक रिश्तों में आई दरार

इस समझौते के पटरी से उतरने की एक बड़ी वजह उस समय का भारत-पाकिस्तान तनाव माना जा रहा है, जिसने कूटनीतिक माहौल को तनावपूर्ण बना दिया था। जब भारत ने पहलगाम की घटनाओं के जवाब में आतंकी ठिकानों के खिलाफ (counter-terrorism operation) को अंजाम दिया, तो रिश्तों का समीकरण बदलने लगा। इस सैन्य कार्रवाई के ठीक बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने युद्ध विराम में मध्यस्थता का श्रेय लेने की कोशिश की, जिसे भारत ने अपनी संप्रभुता के विरुद्ध मानते हुए सिरे से खारिज कर दिया और यहीं से रिश्तों में कड़वाहट घुल गई।

क्या वाकई भारत ने व्यापार की वो ‘ट्रेन मिस’ कर दी

अमेरिकी पक्ष का आरोप है कि भारत ने समझौते की प्रक्रिया में तीन हफ्तों की अनावश्यक देरी कर दी, जिसके कारण एक बड़ा अवसर हाथ से निकल गया। लुटनिक ने ट्रंप की ‘सीढ़ी’ नीति का जिक्र करते हुए कहा कि देरी करने की वजह से (import tariff rates) में मिलने वाली छूट का मौका भारत ने गंवा दिया। उनके मुताबिक, जो देश पहले समझौते करते हैं उन्हें कम टैरिफ का लाभ मिलता है, जबकि देरी करने वालों पर भारी शुल्क का बोझ डाल दिया जाता है, जिससे भारतीय निर्यातकों के लिए राह मुश्किल हो गई।

आंकड़ों और दावों के बीच का विरोधाभास

हालांकि लुटनिक के दावे जितने ठोस लग रहे हैं, व्यापारिक आंकड़े उससे अलग कहानी बयान कर रहे हैं। अमेरिका ने जहां ब्रिटेन और वियतनाम जैसे देशों के साथ काफी उदार शर्तों पर व्यापारिक संबंध बनाए, वहीं भारत के मामले में (trade barrier issues) को और कड़ा कर दिया गया। वियतनाम के बाद कई अन्य देशों के साथ कम टैरिफ पर सौदे किए गए, लेकिन भारत पर 50% का सबसे ऊंचा टैरिफ बरकरार रखा गया, जो दर्शाता है कि मामला सिर्फ एक फोन कॉल या देरी का नहीं, बल्कि कुछ और ही था।

रूस के साथ दोस्ती बनी अमेरिका की नाराजगी की वजह

भारत और अमेरिका के बीच व्यापार वार्ता की राह में रूस के साथ भारत के प्रगाढ़ रक्षा और ऊर्जा संबंध एक बड़ा रोड़ा बनकर उभरे। साल 2025 में जब भारत अपने तेल आयात का बड़ा हिस्सा रूस से ले रहा था, तब अमेरिका इसे (geopolitical strategic shift) के तौर पर देख रहा था। इसी नाराजगी का नतीजा था कि ट्रंप प्रशासन ने रूस से कच्चा तेल खरीदने के कारण भारत पर अतिरिक्त दंडात्मक शुल्क लगा दिए, जिसने व्यापारिक बातचीत को पूरी तरह ठंडे बस्ते में डाल दिया।

BRICS और डॉलर से दूरी ने बढ़ाई वाशिंगटन की बेचैनी

अमेरिका को केवल रूस से तेल खरीदना ही नागवार नहीं गुजरा, बल्कि ब्रिक्स के माध्यम से डॉलर पर निर्भरता कम करने की भारत की कोशिशों ने भी आग में घी का काम किया। लुटनिक के पिछले बयानों से स्पष्ट है कि भारत द्वारा (defense procurement from Russia) और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में वैकल्पिक मुद्राओं की तलाश करना वाशिंगटन को रास नहीं आ रहा था। इन रणनीतिक मतभेदों ने आर्थिक सहयोग की संभावनाओं को पूरी तरह संकीर्ण कर दिया और अविश्वास की खाई को चौड़ा कर दिया।

क्या फोन कॉल ही था विफलता का एकमात्र कारण

भारत के प्रमुख थिंक टैंक जीटीआरआई के प्रमुख अजय श्रीवास्तव ने लुटनिक के इन दावों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका तर्क है कि इतने बड़े स्तर के (international trade agreements) किसी एक फोन कॉल के न होने मात्र से नहीं गिरते। यह सोचना बचकाना है कि दो बड़े लोकतांत्रिक देशों के बीच का भविष्य महज एक औपचारिक बातचीत पर निर्भर था। वास्तव में, दोनों देशों के बीच नीतियों और नियामक स्वायत्तता को लेकर गहरे मतभेद थे जिन्हें सुलझाया नहीं जा सका।

कृषि और डिजिटल व्यापार पर नहीं बन सकी सहमति

व्यापारिक सौदे के विफल होने के पीछे कृषि क्षेत्र और डिजिटल व्यापार जैसे बुनियादी मुद्दे सबसे बड़ी चुनौती थे। भारत अपने किसानों के हितों की रक्षा के लिए (market access negotiations) में बेहद सतर्क रुख अपना रहा था, जिसे अमेरिका अपनी कंपनियों के लिए बाधा मान रहा था। साथ ही, डेटा स्थानीयकरण और ई-कॉमर्स नियमों पर दोनों देशों के अपने-अपने तर्क थे, जिन पर किसी भी पक्ष ने पीछे हटने के संकेत नहीं दिए थे, जिससे बातचीत बेनतीजा रही।

भविष्य की राह और कूटनीतिक चुनौतियां

भले ही लुटनिक आज जो भी दावे कर रहे हों, यह स्पष्ट है कि भारत और अमेरिका के व्यापारिक संबंध वर्तमान में एक कठिन दौर से गुजर रहे हैं। आने वाले समय में (bilateral economic cooperation) को फिर से पटरी पर लाने के लिए दोनों देशों को एक-दूसरे की संप्रभुता और रणनीतिक स्वायत्तता का सम्मान करना होगा। व्यापार केवल टैरिफ का खेल नहीं है, बल्कि यह आपसी भरोसे की बुनियाद पर टिका होता है जिसे फिर से बनाने की जरूरत है।

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