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German Chancellor Friedrich Merz Visit to India: जर्मनी और भारत का यह साथ बदल देगा दुनिया का नक्शा…

German Chancellor Friedrich Merz Visit to India: गुजरात की सांस्कृतिक राजधानी अहमदाबाद के सरदार वल्लभभाई पटेल अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर सोमवार की सुबह एक नई कूटनीतिक ऊर्जा देखने को मिली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विशेष निमंत्रण पर जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज अपनी पहली आधिकारिक भारत यात्रा पर पहुंचे हैं, जिसका उद्देश्य (strategic bilateral relations) को एक ऐसे स्तर पर ले जाना है जहाँ दोनों देश भविष्य की चुनौतियों का मिलकर सामना कर सकें। यह दौरा केवल दो नेताओं की मुलाकात नहीं है, बल्कि दो महान लोकतंत्रों के बीच पनप रहे उस विश्वास की गवाही है जो पिछले ढाई दशकों में और भी गहरा हुआ है।

German Chancellor Friedrich Merz Visit to India
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साबरमती के आश्रम में शांति और कूटनीति का संगम

अपनी यात्रा के पहले चरण में चांसलर मर्ज और प्रधानमंत्री मोदी सुबह 9:30 बजे साबरमती आश्रम पहुंचे, जहाँ इतिहास और वर्तमान एक साथ खड़े नजर आए। चरखा चलाने और महात्मा गांधी के सिद्धांतों को समझने के बाद दोनों नेता साबरमती रिवरफ्रंट पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव में शामिल हुए। रंग-बिरंगी पतंगों के बीच यह (cultural diplomacy exchange) साफ दर्शाता है कि जर्मनी अब भारत को केवल एक बाजार के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे गहरे मित्र के रूप में देख रहा है जिसकी जड़ें परंपराओं और आधुनिकता दोनों में मजबूती से समाहित हैं।

गांधीनगर के महात्मा मंदिर में भविष्य की रूपरेखा

दोपहर 11:15 बजे गांधीनगर के महात्मा मंदिर में दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच आधिकारिक वार्ता का दौर शुरू हुआ। इस द्विपक्षीय चर्चा का केंद्र बिंदु व्यापार और निवेश से लेकर रक्षा और सुरक्षा जैसे गंभीर विषय रहे। प्रधानमंत्री मोदी और चांसलर मर्ज ने (defense and security cooperation) के उन पहलुओं पर विस्तार से बात की जो आने वाले समय में दक्षिण एशिया और यूरोप के बीच सुरक्षा संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं। यह बैठक भारत-जर्मनी रणनीतिक साझेदारी के 25 गौरवशाली वर्षों के बाद एक नए अध्याय की शुरुआत मानी जा रही है।

उद्योग जगत के दिग्गजों की मौजूदगी और निवेश का भरोसा

जर्मन चांसलर के साथ आया उच्च-स्तरीय प्रतिनिधिमंडल अपने आप में भारत की बढ़ती आर्थिक ताकत का सबूत है। इस दल में जर्मनी की सबसे बड़ी कंपनियों के सीईओ शामिल हैं, जो भारत के सेमीकंडक्टर, ऑटोमोबाइल और ग्रीन एनर्जी सेक्टर में (foreign direct investment) की असीम संभावनाओं को तलाशने आए हैं। जर्मनी जानता है कि वैश्विक सप्लाई चेन में भारत की भूमिका अब अपरिहार्य हो गई है, और इसीलिए ये दिग्गज उद्योगपति भारतीय बाजार में अपनी जड़ें और गहरी करने के लिए पूरी तरह तैयार दिख रहे हैं।

कौशल विकास और तकनीक का साझा सफर

बैठक के दौरान जिस एक मुद्दे पर सबसे ज्यादा जोर दिया गया, वह था भारत के कुशल श्रमिकों की जर्मनी में भागीदारी। जर्मन अर्थव्यवस्था को आज प्रतिभावान युवाओं की सख्त जरूरत है, और भारत इसमें (global talent mobility) का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। शिक्षा, कौशल विकास और नवाचार के क्षेत्र में होने वाले नए समझौते यह सुनिश्चित करेंगे कि भारतीय युवाओं को अंतरराष्ट्रीय मंच पर बेहतर अवसर मिलें और जर्मनी को अपनी औद्योगिक जरूरतों के लिए सर्वश्रेष्ठ मानव संसाधन प्राप्त हो सके।

रक्षा और तकनीक में आत्मनिर्भरता की ओर कदम

भारत और जर्मनी के बीच रक्षा सहयोग अब केवल खरीद-फरोख्त तक सीमित नहीं रह गया है। चर्चाओं का रुख स्पष्ट करता है कि दोनों पक्ष अब सह-उत्पादन और (technology transfer agreements) की दिशा में तेजी से बढ़ रहे हैं। यह कदम भारत के ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान को बल देगा, जहाँ जर्मन इंजीनियरिंग की सटीकता और भारत की निर्माण क्षमता मिलकर रक्षा क्षेत्र में नए प्रतिमान स्थापित करेंगे। समुद्री सुरक्षा और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में भी दोनों देशों ने एक-दूसरे का हाथ थामने का संकल्प दोहराया है।

हरित विकास और पर्यावरण की साझा चिंताएं

जलवायु परिवर्तन आज पूरी मानवता के लिए एक गंभीर संकट है और इस यात्रा के दौरान ‘ग्रीन एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट’ पर भी गंभीर मंथन हुआ। जर्मनी की अत्याधुनिक ग्रीन टेक्नोलॉजी और भारत की सौर ऊर्जा क्षमता मिलकर (renewable energy transition) के वैश्विक लक्ष्यों को प्राप्त करने में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं। दोनों नेताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित पर्यावरण तैयार करना उनकी रणनीतिक साझेदारी का एक अनिवार्य हिस्सा होना चाहिए।

वैश्विक मंच पर भारत-जर्मनी की बढ़ती ताकत

यह दौरा 27 जनवरी को होने वाले भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन की प्रस्तावना जैसा महसूस हो रहा है। जर्मन राजदूत फिलिप एकरमैन के शब्दों में कहें तो भारत अब जर्मनी की विदेश नीति के केंद्र में है। क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर (geopolitical stability alignment) को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि जी-7 के बाद अब यह मुलाकात वैश्विक कूटनीति की दिशा तय करने वाली साबित होगी। दोनों देशों के बीच का यह अटूट बंधन न केवल एशिया और यूरोप को करीब लाएगा, बल्कि वैश्विक शांति और स्थिरता के लिए भी एक मजबूत स्तंभ बनेगा।

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