Pakistan Administrative Province Restructuring: क्या 16 टुकड़ों में बंटकर सुलझेगी पाकिस्तान की बदहाली की गुत्थी…
Pakistan Administrative Province Restructuring: पाकिस्तान इस वक्त अपने इतिहास के सबसे बड़े प्रशासनिक बदलाव की दहलीज पर खड़ा नजर आ रहा है। वर्तमान में पंजाब, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान जैसे चार बड़े खंभों पर टिका यह देश अब अपनी सीमाओं के भीतर नई लकीरें खींचने की तैयारी में है। इस्तेहकाम-ए-पाकिस्तान पार्टी (IPP) ने एक चौंकाने वाली मांग रखते हुए देश को 4 के बजाय कुल 16 प्रांतों में विभाजित करने का प्रस्ताव दिया है। यह मांग केवल राजनीतिक नहीं है, बल्कि उस (geopolitical stability crisis) का नतीजा है जिसने दशकों से पाकिस्तान के सुदूर इलाकों को विकास से महरूम रखा है।

कलीम खान का विजन और सुविधाओं की पहुंच
पाकिस्तान के संचार मंत्री अब्दुल कलीम खान ने इस साहसी प्रस्ताव को सार्वजनिक करते हुए सभी राजनीतिक दलों से एकजुट होने की अपील की है। उनका तर्क है कि विशालकाय प्रांतों के कारण सरकारी सुविधाएं अंतिम छोर पर बैठे नागरिक तक नहीं पहुंच पाती हैं। छोटे प्रांत बनाने से (local governance efficiency) में सुधार होगा और प्रशासनिक मशीनरी अधिक जवाबदेह बनेगी। खान ने स्पष्ट किया है कि वे इसके लिए एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन शुरू करने जा रहे हैं ताकि जनता की आवाज को सत्ता के गलियारों तक पहुंचाया जा सके।
नामों का नया गणित और पहचान का सवाल
प्रांतों के बंटवारे को लेकर अक्सर भाषाई और सांस्कृतिक पहचान का डर सताता है, लेकिन अब्दुल कलीम खान ने इसका एक अनूठा समाधान पेश किया है। उन्होंने सुझाव दिया है कि प्रांतों के नाम बदलने के बजाय उन्हें दिशाओं के आधार पर बांटा जाए, जैसे उत्तर पंजाब, दक्षिण पंजाब, पश्चिम पंजाब और पूर्वी पंजाब। यह (territorial administrative divisions) मॉडल पहचान के संकट को पैदा किए बिना शासन को सरल बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है। खान का मानना है कि छोटी मानसिकता को त्यागकर ही पाकिस्तान का व्यापक हित साधा जा सकता है।
सिंध और बलूचिस्तान के बंटवारे की अनिवार्यता
सिर्फ पंजाब ही नहीं, बल्कि सिंध, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा को भी चार-चार हिस्सों में बांटने की सख्त जरूरत बताई गई है। इस प्रस्ताव को सिंध की प्रभावशाली पार्टी MQM का समर्थन मिलना एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। प्रशासनिक दृष्टि से देखें तो (provincial resource allocation) की प्रक्रिया छोटे राज्यों में अधिक पारदर्शी हो जाती है। जब सत्ता का विकेंद्रीकरण होगा, तो क्षेत्रीय असंतोष कम होने की संभावना बढ़ जाएगी, जो वर्तमान में पाकिस्तान की सबसे बड़ी आंतरिक समस्या बनी हुई है।
इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास की नई सड़कों का सपना
प्रशासनिक सुधारों के साथ-साथ संचार मंत्री ने देश के रोड नेटवर्क को वैश्विक स्तर पर ले जाने की वकालत की है। उनका सुझाव है कि लाहौर-सियालकोट-खारियां हाईवे को कामोके और गुजरांवाला जैसे प्रमुख औद्योगिक केंद्रों से जोड़ा जाना चाहिए। इसके अलावा, सड़कों के चौड़ीकरण और उन्हें (six lane highway infrastructure) में तब्दील करने की योजना भी इस प्रस्ताव का हिस्सा है। बेहतर कनेक्टिविटी न केवल व्यापार को बढ़ावा देगी, बल्कि नए बनने वाले प्रांतों के बीच सामंजस्य बिठाने में भी सेतु का काम करेगी।
अशांत इलाकों में शांति बहाली की रणनीति
बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा जैसे प्रांत लंबे समय से उग्रवाद और हिंसा की चपेट में हैं। यहाँ की बड़ी आबादी अक्सर केंद्र सरकार की नीतियों और पंजाब के प्रभुत्व के खिलाफ खड़ी नजर आती है। जानकारों का मानना है कि छोटे प्रांतों का गठन (ethnic conflict resolution) के लिए एक मास्टरस्ट्रोक साबित हो सकता है। जब सत्ता स्थानीय हाथों में होगी और छोटे-छोटे प्रशासनिक केंद्र बनेंगे, तो अलगाववादी विचारधारा को मिलने वाली खाद-पानी स्वतः ही कम हो जाएगी।
पंजाबियों के खिलाफ हिंसा और सुरक्षा का सवाल
इन राज्यों में विशेष रूप से पंजाबियों को निशाना बनाने वाली हिंसक घटनाएं एक बड़ी चिंता का विषय रही हैं। उपद्रव प्रभावित क्षेत्रों में छोटे प्रांत बनाने से सुरक्षा बलों के लिए (security surveillance management) करना कहीं अधिक आसान हो जाएगा। वर्तमान में बड़े भौगोलिक क्षेत्र होने के कारण कानून-व्यवस्था बनाए रखना एक चुनौती है। विभाजन के बाद सुरक्षा एजेंसियां केंद्रित होकर काम कर सकेंगी, जिससे आम नागरिकों के जीवन की रक्षा सुनिश्चित की जा सकेगी।
क्या पाकिस्तान के राजनीतिक दल दिखा पाएंगे इच्छाशक्ति?
अंततः सवाल यही उठता है कि क्या पाकिस्तान की अन्य बड़ी पार्टियां इस प्रस्ताव पर अपनी सहमति देंगी? इस्तेहकाम-ए-पाकिस्तान पार्टी ने गेंद अब विपक्षी और सत्ताधारी दलों के पाले में डाल दी है। यदि (national political consensus) बन जाता है, तो यह पाकिस्तान के आधुनिक इतिहास का सबसे बड़ा बदलाव होगा। यह केवल नक्शे बदलने की बात नहीं है, बल्कि उन करोड़ों लोगों के जीवन को बेहतर बनाने की कोशिश है जो आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं।



