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Supreme Court Verdict on Contractual Labor: सरकारी नौकरी पर चला सुप्रीम कोर्ट का हथौड़ा, रेगुलर स्टाफ के बराबर नहीं बन पाएंगे ठेके वाले कर्मचारी

Supreme Court Verdict on Contractual Labor: देश की सबसे बड़ी अदालत ने सरकारी नौकरियों के ढांचे को लेकर एक ऐसा फैसला सुनाया है जो भविष्य के लिए नजीर बनेगा। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी प्राइवेट एजेंसी या ठेकेदार के माध्यम से अनुबंध पर काम करने वाले कर्मचारी, सरकारी महकमों के नियमित कर्मचारियों के समान अधिकारों का दावा नहीं कर सकते। अदालत ने (Government Job Equality Rights) को लेकर मचे घमासान पर विराम लगाते हुए कहा कि नियमित और संविदा कर्मचारियों के बीच एक स्पष्ट विभाजन रेखा है जिसे मिटाया नहीं जा सकता।

Supreme Court Verdict on Contractual Labor
Supreme Court Verdict on Contractual Labor

सरकारी नौकरी कोई खैरात नहीं बल्कि एक सार्वजनिक संपत्ति है

जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने इस मामले की गहराई में जाते हुए एक बेहद भावनात्मक और गंभीर टिप्पणी की है। पीठ ने कहा कि सरकारी विभागों या निकायों में नियमित नौकरी को एक ‘सार्वजनिक संपत्ति’ माना जाना चाहिए, जिस पर देश के हर नागरिक का हक है। जब सरकार (Public Employment Opportunities) के लिए विज्ञापन निकालती है, तो उसमें पारदर्शिता और निष्पक्षता का पालन किया जाता है ताकि हर योग्य उम्मीदवार को अपनी काबिलियत साबित करने का बराबर मौका मिल सके।

पारदर्शी चयन प्रक्रिया बनाम ठेकेदार की अपनी मर्जी

अदालत ने अपने फैसले में नियुक्तियों के तरीकों के बीच के अंतर को बहुत ही तार्किक ढंग से समझाया है। जजों का मानना है कि नियमित नियुक्तियां एक कठोर और पारदर्शी प्रक्रिया के तहत होती हैं, जहां केवल योग्यता ही पैमाना होती है। इसके विपरीत, जब किसी एजेंसी या ठेकेदार के जरिए कर्मचारी रखे जाते हैं, तो वह पूरी तरह से (Third Party Recruitment Process) के तहत ठेकेदार की मर्जी पर निर्भर करता है। इस प्रक्रिया में सार्वजनिक विज्ञापन या खुली प्रतिस्पर्धा का अभाव होता है, इसलिए दोनों को एक समान नहीं माना जा सकता।

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के पुराने फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने किया रद्द

यह कानूनी लड़ाई आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले की नंदयाल नगरपालिका परिषद से शुरू हुई थी, जिसमें हाईकोर्ट ने 2018 में कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाया था। हाईकोर्ट ने आदेश दिया था कि 1994 से ठेके पर काम कर रहे सफाई कर्मियों को नियमित कर्मचारियों के समान वेतन और भत्ते दिए जाएं। सुप्रीम कोर्ट ने (High Court Judgment Reversal) करते हुए इस आदेश को कानूनन गलत ठहराया और कहा कि हाईकोर्ट का यह दृष्टिकोण संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं था।

नियुक्तियों की पवित्रता और वैधानिक ढांचे पर अदालत का तर्क

सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि यदि नियमित और अनुबंध कर्मचारियों के बीच का अंतर खत्म कर दिया गया, तो पूरी व्यवस्था चरमरा जाएगी। अगर दोनों श्रेणियों को एक समान लाभ मिलने लगे, तो स्थायी, अनुबंध और तदर्थ नियुक्तियों के (Fundamental Principles of Appointment) अपनी पवित्रता खो देंगे। सरकार के पास अलग-अलग जरूरतों के लिए अलग-अलग माध्यमों से भर्ती करने का अधिकार सुरक्षित है और कानून इसमें तब तक दखल नहीं दे सकता जब तक कि कोई स्पष्ट उल्लंघन न हो।

पक्षपात को रोकने के लिए नियमित भर्ती में कड़े सुरक्षा उपाय

अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि सरकारी नौकरियों में नियमित भर्ती की प्रक्रिया को इतना कठिन और पारदर्शी इसलिए बनाया गया है ताकि भ्रष्टाचार पर लगाम लगाई जा सके। नियमित नियुक्ति में कई सुरक्षा उपाय (Anti Corruption Recruitment Measures) के तौर पर काम करते हैं ताकि भर्ती प्रक्रिया में किसी भी तरह का बाहरी हस्तक्षेप, भाई-भतीजावाद या पक्षपात न हो सके। ठेके पर रखे गए कर्मचारियों के मामले में ये सुरक्षा उपाय लागू नहीं होते, इसलिए उन्हें स्थायी कर्मचारियों के बराबर लाभ देना अनुचित होगा।

सफाई कर्मचारियों और ठेकेदारों के बदलते दौर की कानूनी कहानी

नंदयाल नगरपालिका का यह मामला दशकों पुराना था, जिसमें समय-समय पर ठेकेदार बदलते रहे लेकिन कर्मचारी वही रहे। कर्मचारी लंबे समय से सेवा देने के आधार पर (Equal Pay for Equal Work) के सिद्धांत के तहत नियमित वेतनमान की मांग कर रहे थे। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि लंबे समय तक काम करना मात्र नियमितीकरण का आधार नहीं बन सकता, खासकर तब जब नियुक्ति की प्रक्रिया ही सार्वजनिक मानदंडों के विपरीत किसी निजी एजेंसी के माध्यम से हुई हो।

देश के हर योग्य नागरिक के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन लाखों युवाओं के लिए एक उम्मीद की किरण है जो दिन-रात मेहनत करके प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। कोर्ट ने माना कि अगर पिछले दरवाजे से की गई नियुक्तियों को नियमित के बराबर दर्जा दिया गया, तो यह (Constitutional Right to Apply) का उल्लंघन होगा। हर नागरिक को यह हक है कि वह सरकारी पद के लिए खुली प्रतियोगिता में भाग ले सके और अदालत ने इसी सार्वजनिक हक को सुरक्षित रखने के लिए यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया है

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