Misuse of Dowry Laws by Women: पति और ससुर को फंसाना पड़ा भारी, दिल्ली हाईकोर्ट ने महिला की पैसों की भूख पर लगाई कड़ी फटकार
Misuse of Dowry Laws by Women: दिल्ली उच्च न्यायालय ने वैवाहिक विवादों को लेकर एक बेहद दूरगामी और ऐतिहासिक टिप्पणी की है। जस्टिस नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि यह जरूरी नहीं है कि हर पारिवारिक झगड़े में ससुराल पक्ष ही दोषी हो। कोर्ट ने माना कि (Legal Awareness vs Misuse) के इस दौर में कई बार महिलाएं कानून का गलत फायदा उठाकर निर्दोष लोगों को मानसिक और कानूनी पीड़ा देती हैं। अदालत ने साफ किया कि अब वह समय आ गया है जब कानून की आड़ में रची जाने वाली ऐसी साजिशों को पहचान कर उन्हें कड़ाई से रोका जाए।

मध्यस्थता की मेज पर दिखी पैसों की अंतहीन लालसा
इस विशिष्ट मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि शिकायतकर्ता महिला का रवैया समझौता करने वाला नहीं, बल्कि वसूली करने वाला था। मध्यस्थता केंद्र की रिपोर्टों से यह साबित हुआ कि महिला हर बार अपनी मांगों को बदल रही थी और (Financial Demands in Mediation) को लगातार बढ़ाती जा रही थी। कभी वह दक्षिणी दिल्ली में एक आलीशान फ्लैट की मांग करती, तो कभी 50 लाख रुपये की नगद राशि पर अड़ जाती। कोर्ट ने महिला के इस व्यवहार को ‘लालची रवैया’ करार देते हुए उसकी मंशा पर गंभीर सवाल उठाए।
दहेज प्रताड़ना का केस केवल धन उगाहने का बना जरिया
अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि महिला द्वारा दर्ज कराया गया दहेज प्रताड़ना का मुकदमा न्याय पाने के लिए नहीं, बल्कि पति और ससुर से अधिक से अधिक धन ऐंठने के उद्देश्य से था। बेंच ने कहा कि (Abuse of Section 498A) का यह एक स्पष्ट उदाहरण है, जहां कानून का इस्तेमाल एक हथियार के तौर पर किया गया। इस तरह के मुकदमों से न केवल अदालतों का कीमती समय बर्बाद होता है, बल्कि एक हंसते-खेलते परिवार की प्रतिष्ठा भी दांव पर लग जाती है।
अदालतों को कानून के बेजा इस्तेमाल पर लगानी होगी लगाम
न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने इस बात पर जोर दिया कि अब न्यायिक तंत्र को कानून के दुरुपयोग को नियंत्रित करने के लिए सक्रिय होना पड़ेगा। उन्होंने दुख व्यक्त किया कि एक (False Dowry Harassment Case) की वजह से एक पूरा परिवार पिछले कई वर्षों से पुलिस थानों और कचहरियों के चक्कर काट रहा है। बेंच ने इस मामले की तह तक जाते हुए और सभी सबूतों को देखने के बाद आरोपी बनाए गए पति और ससुर को सभी आरोपों से मुक्त करते हुए उन्हें क्लीनचिट दे दी है।
पांच साल बाद दर्ज कराई गई एफआईआर ने खोली पोल
कोर्ट ने मामले की टाइमलाइन पर गौर करते हुए एक बहुत बड़ी विसंगति पकड़ी। महिला ने अपनी शादी के दो साल बाद यानी वर्ष 2011 में ही ससुराल छोड़ दिया था और वह तब से अलग रह रही थी। लेकिन हैरान करने वाली बात यह थी कि उसने (Delayed FIR in Matrimonial Disputes) के तहत पांच साल बाद यानी 2016 में दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज कराया। ससुराल छोड़ने के इतने लंबे अंतराल के बाद गंभीर आरोप लगाना कोर्ट को गले नहीं उतरा, जिससे शिकायत की विश्वसनीयता पूरी तरह खत्म हो गई।
शादी की शुरुआत से ही आपसी मतभेदों का साया
महिला की शादी वर्ष 2009 में हुई थी, लेकिन आपसी वैचारिक मतभेदों के कारण यह रिश्ता लंबा नहीं चल सका। 2011 में घर छोड़ने के बाद जब सुलह की कोशिशें शुरू हुईं, तो महिला ने (Matrimonial Settlement Challenges) पैदा कर दिए। कोर्ट के रिकॉर्ड से यह साबित हुआ कि मध्यस्थता के दौरान महिला का ध्यान अपने वैवाहिक जीवन को बचाने पर नहीं, बल्कि बड़ी संपत्ति और नकदी हासिल करने पर था। हाईकोर्ट ने इन रिकॉर्ड्स को ही अपना मुख्य आधार बनाया।
पुरुषों के अधिकारों और झूठे आरोपों पर कोर्ट की चिंता
दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला उन पुरुषों के लिए एक बड़ी राहत है जो झूठे मुकदमों की मार झेल रहे हैं। बेंच ने याद दिलाया कि झूठे आरोप किसी भी व्यक्ति के जीवन पर (Long Term Impact of False Accusations) छोड़ते हैं, जिनके घाव कभी नहीं भरते। कोर्ट ने संदेश दिया कि न्याय का तराजू दोनों पक्षों के लिए बराबर है और किसी को भी महिला होने के नाते कानून का दुरुपयोग करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। झूठी एफआईआर को खारिज कर कोर्ट ने न्याय की गरिमा को बहाल किया है।
ऐतिहासिक फैसला: निर्दोष पति और ससुर को मिला न्याय
अंततः दिल्ली हाईकोर्ट ने इस उत्पीड़न को समाप्त करते हुए महिला द्वारा दर्ज मुकदमे को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने माना कि यह मामला केवल (Judicial Scrutiny of Dowry Cases) की कमी के कारण इतने सालों तक खिंचता रहा। इस फैसले ने यह नजीर पेश की है कि अब ‘पीड़िता’ का कार्ड खेलकर कानून से खिलवाड़ करना आसान नहीं होगा। बेगुनाह साबित होने के बाद पति और बुजुर्ग ससुर ने राहत की सांस ली है, जिन्होंने अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा अदालती जंग में गंवा दिया था।



