EU vs USA Trade War: छिड़ गया महायुद्ध, अब अमेरिका को उसी की भाषा में मिलेगा जवाब…
EU vs USA Trade War: दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक शक्तियों के बीच एक ऐसे टकराव की शुरुआत हो चुकी है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था की नींव हिला सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा यूरोपीय सहयोगियों पर टैरिफ लगाने के ऐलान के बाद यूरोपीय संघ ने अपनी जवाबी रणनीति तैयार कर ली है। रविवार को हुई एक हाई-प्रोफाइल बैठक के दौरान ट्रंप को रोकने के लिए (Strategic Economic Response) पर विस्तार से चर्चा की गई। यूरोप अब उस मोड़ पर खड़ा है जहां वह अमेरिका के साथ अपने दशकों पुराने संबंधों को दांव पर लगाकर अपनी संप्रभुता की रक्षा करने को तैयार है।

जवाबी कार्रवाई के लिए तैयार है भारी-भरकम पैकेज
यूरोपीय संघ के नेता गुरुवार को ब्रुसेल्स में होने वाले एक आपातकालीन शिखर सम्मेलन में ट्रंप के खिलाफ कड़े विकल्पों पर अंतिम मुहर लगाएंगे। इनमें सबसे प्रमुख विकल्प अमेरिकी आयात पर 93 बिलियन यूरो का भारी-भरकम शुल्क पैकेज लगाना है। यह (Import Duty Package) अगले साल 6 फरवरी से अपने आप सक्रिय हो जाएगा, जिससे अमेरिकी माल की कीमतें यूरोप में आसमान छूने लगेंगी। यूरोपीय नेताओं का मानना है कि केवल आर्थिक चोट ही ट्रंप प्रशासन को अपनी नीतियों पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर कर सकती है।
ईयू के पास है ‘ब्रह्मास्त्र’ जैसा घातक हथियार
यूरोपीय संघ के पास केवल टैरिफ ही नहीं, बल्कि ‘एंटी कोएर्शियन इंस्ट्रूमेंट’ (ACI) जैसा एक बेहद शक्तिशाली कानूनी हथियार भी मौजूद है। इस (Regulatory Trade Weapon) के इस्तेमाल से यूरोप सार्वजनिक निविदाओं, निवेश और बैंकिंग सेवाओं में अमेरिका की पहुंच को पूरी तरह सीमित कर सकता है। इतना ही नहीं, डिजिटल सेवाओं के व्यापार पर भी रोक लगाई जा सकती है, जहाँ अमेरिका वर्तमान में भारी मुनाफे में रहता है। रॉयटर्स की रिपोर्ट बताती है कि इस समय यूरोपीय सदस्य देशों के बीच जवाबी टैरिफ लगाने को लेकर सबसे ज्यादा सहमति बनी हुई है।
ग्रीनलैंड का विवाद और ट्रंप की जिद
इस पूरे विवाद की जड़ में डेनमार्क का अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड है, जिसे डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अनिवार्य मानते हैं। जब यूरोपीय देशों ने ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण का विरोध किया, तो ट्रंप ने (International Diplomacy Conflict) को हवा देते हुए उन पर 10 प्रतिशत शुल्क लगाने की घोषणा कर दी। राजनयिकों ने चेतावनी दी है कि ट्रंप की यह विस्तारवादी सोच और व्यापारिक युद्ध की धमकी अमेरिका-यूरोप संबंधों को एक ऐसे ‘खतरनाक नकारात्मक दौर’ में धकेल देगी, जहाँ से वापसी संभव नहीं होगी।
सहयोगियों पर प्रहार से सहमा नाटो गठबंधन
ट्रंप ने शनिवार को एक झटके में डेनमार्क, फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन समेत आठ महत्वपूर्ण यूरोपीय देशों पर आयात शुल्क लगाने का ऐलान किया। ये सभी देश नाटो गठबंधन का हिस्सा हैं और दशकों से अमेरिका के कंधे से कंधा मिलाकर चलते रहे हैं। ट्रंप का यह (Global Alliance Tension) पैदा करने वाला फैसला सहयोगियों के बीच भरोसे की कमी को दर्शाता है। ग्रीनलैंड जैसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र पर कब्जे की चाहत ने अब एक ऐसे व्यापारिक युद्ध का रूप ले लिया है, जिसका असर पूरी दुनिया पर पड़ना तय है।
ड्रैगन और रूस को मिल सकता है सुनहरा मौका
यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रमुख काजा कालास ने एक बेहद महत्वपूर्ण चेतावनी दी है कि पश्चिमी देशों के बीच इस फुट का सीधा लाभ चीन और रूस को मिलेगा। कालास के अनुसार, (Geopolitical Rivalry) के इस दौर में अमेरिका और यूरोप का अलग होना साझा समृद्धि को कमजोर करेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि ग्रीनलैंड की सुरक्षा को लेकर कोई चिंता है, तो उसे नाटो के भीतर बातचीत से सुलझाया जाना चाहिए, न कि एक-दूसरे पर शुल्क थोपकर खुद को गरीब बनाना चाहिए।
अमेरिका के भीतर भी उठने लगी हैं विरोध की आवाजें
ट्रंप के इस कड़े फैसले की आलोचना केवल यूरोप में ही नहीं, बल्कि अमेरिका के भीतर भी प्रमुखता से हो रही है। अमेरिकी सीनेटर मार्क केली ने चेतावनी दी है कि सहयोगियों पर भारी टैक्स लगाने से अंततः (Inflation Impact on Citizens) ही बढ़ेगा और आम अमेरिकियों को हर चीज के लिए अधिक कीमत चुकानी होगी। यह न केवल आर्थिक रूप से नुकसानदायक है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर अमेरिका की साख और नेतृत्व क्षमता को भी गंभीर नुकसान पहुंचा रहा है।
मेलोनी और स्टार्मर ने भी जताई कड़ी नाराजगी
यूरोप में ट्रंप की सबसे करीबी सहयोगी मानी जाने वाली इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने भी इस फैसले पर हैरानी जताई है और इसे एक ‘बड़ी गलती’ करार दिया है। वहीं, ब्रिटिश प्रधानमंत्री केअर स्टार्मर ने ट्रंप की घोषणा को (International Trade Violation) की तरह देखते हुए इसे ‘पूरी तरह गलत’ बताया है। ब्रिटेन की सरकार ने साफ कर दिया है कि वह इस मुद्दे को अमेरिकी प्रशासन के समक्ष कड़े शब्दों में उठाएगी, क्योंकि यह वैश्विक मुक्त व्यापार के सिद्धांतों के विरुद्ध है।
आर्थिक मंदी की आहट और अनिश्चित भविष्य
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह व्यापारिक युद्ध वास्तव में शुरू होता है, तो दुनिया एक नई आर्थिक मंदी की चपेट में आ सकती है। यूरोप और अमेरिका के बीच (Global Supply Chain) इतनी गहराई से जुड़ी हुई है कि एक का नुकसान दूसरे की बर्बादी का कारण बनेगा। 6 फरवरी की समयसीमा जैसे-जैसे नजदीक आ रही है, वैसे-वैसे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बेचैनी बढ़ती जा रही है। अब सबकी नजरें ब्रुसेल्स शिखर सम्मेलन पर टिकी हैं, जहां से तय होगा कि दुनिया शांति की ओर जाएगी या विनाशकारी ट्रेड वॉर की ओर।



