Dudhwa Snake Woman Nazrun Nisha: जहरीले नाग हों या खूंखार मगरमच्छ, दुधवा की इस शेरनी के आगे सब भरते हैं पानी
Dudhwa Snake Woman Nazrun Nisha: कल्पना कीजिए कि आप अपने गांव की पगडंडी पर चल रहे हों और अचानक झाड़ियों से एक विशालकाय जहरीला सांप फन उठाए सामने आ जाए। ऐसे मंजर को देखकर अच्छे-अच्छों के पसीने छूट जाते हैं, लेकिन दुधवा की बहादुर बेटी नाजरून निशा के लिए यह रोज का काम है। 27 साल की यह जांबाज युवती (Wildlife Rescue Operations) को इतनी सहजता से अंजाम देती है कि देखने वाले दांतों तले उंगलियां दबा लेते हैं। महज ढाई महीने पहले दुधवा फाउंडेशन से जुड़ने वाली नाजरून आज पूरे इलाके में साहस का दूसरा नाम बन चुकी हैं।

अकेले ही मौत के सौदागरों को करती हैं काबू
पहले जब भी किसी गांव में मगरमच्छ या सांप निकलने की खबर आती थी, तो वन विभाग को विशेषज्ञों की एक पूरी टीम भेजनी पड़ती थी। आज हालात बदल चुके हैं और नाजरून निशा अकेले ही अपने मिशन पर निकल पड़ती हैं। वह (Snake Catching Expertise) के दम पर बिना किसी शोर-शराबे के वन्यजीवों को काबू करती हैं और उन्हें सुरक्षित उनके प्राकृतिक आवास में छोड़ आती हैं। उनकी इस काबिलियत ने उन्हें ग्रामीणों का सबसे भरोसेमंद साथी बना दिया है, जो कॉल आते ही फौरन मौके पर पहुंच जाती हैं।
रिकॉर्ड तोड़ रेस्क्यू और ग्रामीणों का भरोसा
नाजरून की फुर्ती और निडरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने पिछले एक महीने के भीतर 60 से अधिक सांपों और 10 खतरनाक मगरमच्छों का सफल रेस्क्यू किया है। अब दुधवा के आसपास के गांवों में (Human Wildlife Conflict) की घटनाओं में भारी कमी आई है। ग्रामीणों का कहना है कि नाजरून के आने से उनके भीतर का डर खत्म हो गया है। आज गांव के हर दूसरे व्यक्ति के मोबाइल में उनका नंबर सेव है, जिसे लोग किसी संकट के समय फरिश्ते की तरह डायल करते हैं।
अजगर के साथ रोंगटे खड़े कर देने वाली जंग
नाजरून बताती हैं कि छोटे सांपों को उपकरणों की मदद से पकड़ना फिर भी आसान होता है, लेकिन जब सामना विशालकाय अजगरों से होता है, तो असल परीक्षा शुरू होती है। अजगर न केवल अपनी ताकत के लिए जाने जाते हैं, बल्कि वे खुद को छिपाने में भी माहिर होते हैं। हाल ही में पलिया की श्यामल फैक्ट्री के पास एक (Giant Python Rescue) के दौरान नाजरून ने अपनी जान जोखिम में डालकर उस विशाल जीव को सुरक्षित पकड़ा था। उनकी यह उपलब्धि आज भी इलाके में चर्चा का विषय बनी हुई है।
इंसान और जानवर दोनों की जान है कीमती
अक्सर डर की वजह से लोग सांप या मगरमच्छ देखते ही उन पर हमला कर देते हैं, जिससे स्थिति और भी भयावह हो जाती है। नाजरून का मुख्य उद्देश्य केवल जीवों को पकड़ना नहीं, बल्कि (Wildlife Conservation Awareness) फैलाना भी है। वह गांव-गांव जाकर लोगों को समझाती हैं कि वन्यजीव हमारे दुश्मन नहीं हैं। उनके अनुसार, अगर हम धैर्य रखें और विशेषज्ञों को बुलाएं, तो इंसान और बेजुबान जानवर दोनों की जान बचाई जा सकती है।
दुधवा टाइगर रिजर्व के अधिकारियों ने थपथपाई पीठ
नाजरून के इस असाधारण कार्य की गूंज अब प्रशासनिक गलियारों तक भी पहुंच चुकी है। दुधवा टाइगर रिजर्व के निदेशक डॉ. एच राजा मोहन ने खुद नाजरून के जज्बे की सराहना की है। उन्होंने कहा कि नाजरून ने (Community Forest Protection) के क्षेत्र में एक नई मिसाल पेश की है। उनके काम की वजह से न केवल वन्यजीवों के प्रति लोगों का नजरिया बदला है, बल्कि रिजर्व के आसपास रहने वाले लोगों के मन में सुरक्षा की भावना भी पैदा हुई है।
सुरक्षा उपकरणों और सूझबूझ का बेजोड़ संगम
सांपों को पकड़ने के लिए नाजरून केवल अपनी बहादुरी पर निर्भर नहीं रहतीं, बल्कि वह आधुनिक तकनीकों और सुरक्षा मानकों का भी पूरा ध्यान रखती हैं। (Professional Rescue Equipment) का सही इस्तेमाल उन्हें खतरनाक से खतरनाक प्रजाति के सांपों के करीब जाने की अनुमति देता है। उनकी सूझबूझ ऐसी है कि वह जीव के मिजाज को भांप लेती हैं और उसी के अनुसार अपना अगला कदम उठाती हैं, जिससे दुर्घटना की गुंजाइश खत्म हो जाती है।
नई पीढ़ी और महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत
नाजरून निशा का यह सफर केवल वन्यजीवों को बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह उन हजारों युवतियों के लिए प्रेरणा हैं जो लीक से हटकर कुछ करना चाहती हैं। (Women Empowerment in Wildlife) का यह जीता-जागता उदाहरण साबित करता है कि अगर मन में दृढ़ निश्चय हो, तो कोई भी काम असंभव नहीं है। दुधवा की यह बेटी आज न केवल सांपों को बचा रही है, बल्कि समाज की उस सोच को भी बदल रही है जो महिलाओं को कमजोर मानती थी।
वन्यजीवों के संरक्षण की दिशा में एक नया अध्याय
भारत के जंगलों में जिस तरह से आबादी बढ़ रही है, वहां नाजरून जैसे लोगों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। उनका काम (Environmental Balance Maintenance) को बनाए रखने में बड़ा योगदान दे रहा है। अगर नाजरून जैसे बहादुर वॉलंटियर्स न हों, तो शायद कई दुर्लभ प्रजातियां इंसानी गुस्से का शिकार होकर खत्म हो जाएं। आज दुधवा की इस शेरनी की बदौलत वहां की झाड़ियों में सरसराहट होने पर लोग पत्थर नहीं उठाते, बल्कि नाजरून को फोन करते हैं।



