Bihar Government Doctors Private Practice News: प्राइवेट प्रैक्टिस पर रोक लगी तो मचेगा बवाल, भासा ने खोल दिया मोर्चा
Bihar Government Doctors Private Practice News: बिहार सरकार द्वारा सरकारी चिकित्सकों के निजी प्रैक्टिस पर पूरी तरह पाबंदी लगाने की सुगबुगाहट ने राज्य के चिकित्सा गलियारे में हलचल तेज कर दी है। बिहार स्वास्थ्य सेवा संघ (भासा) ने इस मुद्दे पर रविवार को अपनी कड़ा विरोध दर्ज कराते हुए एक आधिकारिक विज्ञप्ति जारी की है। संघ का कहना है कि अगर सरकार (Healthcare Policy Reforms) की दिशा में कोई भी बड़ा कदम उठाना चाहती है, तो उसे पहले चिकित्सकों के हितों और उनकी मांगों को केंद्र में रखना होगा। बिना किसी ठोस बातचीत के थोपा गया कोई भी फैसला राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।

एनपीए और स्वैच्छिक विकल्प की उठी मांग
भासा ने सरकार के सामने यह स्पष्ट प्रस्ताव रखा है कि किसी भी चिकित्सक पर जबरन पाबंदी लगाने के बजाय उन्हें विकल्प दिया जाना चाहिए। संघ के अनुसार, जो डॉक्टर अपनी निजी प्रैक्टिस छोड़ना चाहते हैं, उन्हें उचित (Non Practicing Allowance) प्रदान किया जाए ताकि उनकी आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। डॉक्टरों का मानना है कि केवल आदेश जारी कर देने से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि इसके लिए एक पारदर्शी ‘च्वाइस’ सिस्टम विकसित करना होगा, जहाँ हर चिकित्सक अपनी सुविधा और विशेषज्ञता के अनुसार चुनाव कर सके।
एम्स और पीजीआई जैसी सुविधाओं की शर्त
सरकारी अस्पतालों में काम करने वाले डॉक्टरों का तर्क है कि अगर सरकार चाहती है कि वे निजी क्लीनिकों से पूरी तरह दूरी बना लें, तो उन्हें भी (Medical Professional Benefits) के मामले में देश के शीर्ष संस्थानों के बराबर लाना होगा। भासा के प्रवक्ता डॉ. विनय कुमार ने जोर देकर कहा कि बिहार के डॉक्टरों को भी एम्स और पीजीआई जैसे संस्थानों की तर्ज पर उच्च स्तरीय सुविधाएं मिलनी चाहिए। जब तक डॉक्टरों के काम करने के माहौल और उनके जीवन स्तर में सुधार नहीं होगा, तब तक इस तरह की पाबंदी न्यायसंगत नहीं मानी जाएगी।
बच्चों की पढ़ाई और आवास पर सरकार दे ध्यान
डॉक्टरों की मांगों की सूची केवल भत्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्होंने अपने परिवार के भविष्य को लेकर भी गंभीर चिंताएं जताई हैं। संघ का प्रस्ताव है कि जो डॉक्टर प्रैक्टिस नहीं करते हैं, उनके बच्चों की (Quality Education Expenses) का पूरा भार राज्य सरकार को वहन करना चाहिए। इसके अलावा, राज्य के हर चिकित्सक को बेहतर आवास की सुविधा उपलब्ध कराई जानी चाहिए ताकि वे पूरी एकाग्रता के साथ अपनी सेवाएं दे सकें। ये मांगें डॉक्टरों के सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण के दृष्टिकोण से उठाई गई हैं।
कार्यस्थल पर सुरक्षा और बुनियादी ढांचा है जरूरी
बिहार में अक्सर डॉक्टरों के साथ होने वाली मारपीट और दुर्व्यवहार की घटनाएं चर्चा में रहती हैं। भासा ने सरकार को चेतावनी दी है कि किसी भी नए नियम को लागू करने से पहले (Workplace Safety Standards) को सुनिश्चित करना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है। डॉक्टरों का कहना है कि अस्पतालों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है और ऐसे में कार्यस्थल पर सुरक्षा की गारंटी के बिना उन पर अतिरिक्त दबाव डालना गलत है। बुनियादी ढांचे को मजबूत किए बिना प्रैक्टिस पर रोक लगाना केवल कागजी कार्रवाई बनकर रह जाएगा।
आनन-फानन में लागू न हो नया नियम
भासा के प्रवक्ता डॉ. विनय कुमार ने मीडिया को जानकारी देते हुए कहा कि सरकार को इस विषय पर कोई भी निर्णय लेने से पहले एक समग्र अध्ययन करना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि (Public Health Management) से जुड़े इतने बड़े बदलाव को बिना किसी रिसर्च और डेटा के लागू करना जल्दबाजी होगी। सरकार को पहले एक हाई-लेवल कमेटी बनानी चाहिए जिसमें भासा के प्रतिनिधि और वरिष्ठ चिकित्सक शामिल हों। वार्ता की मेज पर बैठकर ही किसी ऐसे समाधान तक पहुँचा जा सकता है जो सरकार और डॉक्टर दोनों के लिए मान्य हो।
आंदोलन की राह पर चल सकते हैं चिकित्सक
संघ ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर उनकी मांगों को अनसुना कर एकतरफा फैसला लिया गया, तो यह राज्य के हजारों चिकित्सकों के साथ अन्याय होगा। ऐसी स्थिति में डॉक्टरों के पास (Collective Protest Action) के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचेगा। बिहार की स्वास्थ्य सेवाएं पहले से ही संसाधनों की कमी से जूझ रही हैं, और यदि डॉक्टर आंदोलन पर उतरते हैं, तो इसका सीधा असर आम जनता और मरीजों पर पड़ेगा। सरकार को चाहिए कि वह टकराव के बजाय संवाद का रास्ता अपनाए ताकि स्वास्थ्य सेवाएं सुचारू रूप से चलती रहें।
समग्र अध्ययन और विशेषज्ञों की राय है अनिवार्य
बिहार स्वास्थ्य सेवा संघ का मानना है कि राज्य की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए निजी प्रैक्टिस का मुद्दा काफी पेचीदा है। किसी भी (Systemic Healthcare Transformation) के लिए यह जरूरी है कि जमीनी हकीकत को समझा जाए। कई ग्रामीण इलाकों में सरकारी डॉक्टर ही प्राथमिक चिकित्सा का एकमात्र सहारा हैं। अगर बिना किसी विकल्प के प्रैक्टिस बंद की गई, तो ग्रामीण क्षेत्रों में मरीजों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। इसलिए सरकार को हर पहलू पर गहराई से विचार करने की जरूरत है।
सरकार और भासा के बीच वार्ता की उम्मीद
फिलहाल, गेंद अब सरकार के पाले में है कि वह डॉक्टरों की इन मांगों पर क्या रुख अपनाती है। चिकित्सा जगत को उम्मीद है कि (Government Stakeholder Dialogue) के माध्यम से कोई बीच का रास्ता निकल आएगा। डॉक्टरों ने अपनी मंशा साफ कर दी है कि वे सेवा देने के लिए तैयार हैं, लेकिन सम्मानजनक जीवन और सुरक्षा उनकी बुनियादी शर्तें हैं। आने वाले दिनों में स्वास्थ्य विभाग और भासा के बीच होने वाली बैठकें ही बिहार की स्वास्थ्य नीति की नई दिशा तय करेंगी।



