स्वास्थ्य

Morning Health Rituals: सुबह उठते ही जमीन पर पैर रखा तो भुगतना पड़ेगा भारी नुकसान, जानें पूर्वजों की इस सलाह के पीछे का असली खेल

Morning Health Rituals: अक्सर हमारे घर के बड़े-बुजुर्ग सुबह बिस्तर छोड़ते ही सीधे जमीन पर पैर न रखने की सख्त हिदायत देते हैं। पहली नजर में यह कोई धार्मिक अंधविश्वास या केवल पुरानी परंपरा महसूस हो सकती है, लेकिन असल में यह मानव शरीर की ‘बायोलॉजिकल क्लॉक’ को संतुलित करने का एक अद्भुत तरीका है। प्राचीन काल के ऋषि-मुनि जानते थे कि नींद की गहराई से निकलकर होश की दुनिया में आना शरीर के लिए किसी (Biological System Reboot) की तरह होता है। इस प्रक्रिया को आध्यात्मिक अनुशासन से इसलिए जोड़ा गया ताकि सामान्य व्यक्ति अपनी ऊर्जा और चेतना के संतुलन को अनजाने में कोई बड़ी क्षति न पहुंचा सके।

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तंत्रिका तंत्र के लिए सबसे नाजुक होते हैं शुरुआती पल

फोर्टिस फरीदाबाद के जाने-माने न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. विनीत बंगा ने इस प्राचीन परंपरा को चिकित्सा विज्ञान की कसौटी पर परखते हुए बेहद महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है। उनके अनुसार, जब हम सोकर जागते हैं, तो वह शुरुआती कुछ मिनट हमारे मस्तिष्क के न्यूरॉन्स और रक्तचाप के लिए बहुत संवेदनशील होते हैं। इस दौरान (Neurological Coordination) को सुचारू रूप से कार्य करने के लिए कुछ समय की आवश्यकता होती है। डॉ. बंगा स्पष्ट करते हैं कि हमारे पूर्वजों द्वारा बनाए गए ये ‘सेफ्टी प्रोटोकॉल्स’ वास्तव में हमारी नसों और मस्तिष्क की सुरक्षा के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम करते हैं।

कंप्यूटर रीबूट जैसा है स्लीप-वेक इनर्शिया

जब हम गहरी निद्रा में लीन होते हैं, तब हमारा शरीर पैरासिम्पैथेटिक सिस्टम के नियंत्रण में रहकर खुद की मरम्मत और आराम कर रहा होता है। जैसे ही हमारी आंखें खुलती हैं, मस्तिष्क को अचानक सिम्पैथेटिक सिस्टम की ओर स्विच करना पड़ता है। डॉ. बंगा के मुताबिक, यह बदलाव (Brain Awakening Process) बिल्कुल किसी कंप्यूटर को चालू करने जैसा है, जो सॉफ्टवेयर लोड होने में कुछ समय लेता है। जैसे कंप्यूटर पूरी तरह एक्टिव होने में वक्त लगाता है, वैसे ही हमारे न्यूरोलॉजिकल सिस्टम को पूरी तरह सक्रिय होने के लिए कुछ मिनटों का धैर्य चाहिए होता है।

कोर्टिसोल हार्मोन और रक्तचाप का असंतुलन

जागते समय शरीर में कोर्टिसोल नामक हार्मोन का स्तर अचानक बढ़ने लगता है, जो हमें दिनभर की ऊर्जा और सतर्कता प्रदान करता है। हालांकि, जागने के ठीक बाद शरीर का रक्तचाप और नसों का आपसी तालमेल अभी भी अधूरा ही होता है। यदि आप बिस्तर से झटके के साथ उठते हैं, तो (Hormonal Balance Adjustment) ठीक से नहीं हो पाता। यही मुख्य कारण है कि कई लोगों को बिस्तर से उठते ही सिर में भारीपन, चक्कर आना या मानसिक असमंजस महसूस होता है। यह स्थिति विशेष रूप से बुजुर्गों और हृदय रोगियों के लिए काफी तनावपूर्ण और जोखिम भरी हो सकती है।

वेगस नर्व के सामने खड़ी होती है बड़ी चुनौती

नींद की अवस्था में हमारा रक्तचाप स्वाभाविक रूप से निम्न स्तर पर रहता है। जैसे ही हम अचानक खड़े होते हैं, गुरुत्वाकर्षण के कारण रक्त शरीर के निचले अंगों की ओर तेजी से खिंचता है। ऐसे में मस्तिष्क तक पर्याप्त ऑक्सीजन और रक्त पहुंचाने के लिए हृदय को कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। इस पूरी प्रक्रिया का नियंत्रण (Autonomic Nervous System) करता है, जिसमें वेगस नर्व की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। स्थिति में अचानक बदलाव आने से इस तंत्र पर अत्यधिक दबाव पड़ता है, जिससे ऑर्थोस्टेटिक हाइपोटेंशन जैसी स्थिति पैदा हो सकती है और व्यक्ति बेहोश होकर गिर भी सकता है।

माइंडफुल अवेकनिंग: जागने का सही तरीका

स्वस्थ रहने के लिए डॉ. बंगा ‘माइंडफुल अवेकनिंग’ की सलाह देते हैं, जिसका अर्थ है अपने तंत्रिका तंत्र को धीरे-धीरे सक्रिय होने का मौका देना। जागने के बाद कम से कम 30 से 60 सेकंड तक बिस्तर पर ही लेटे रहें और गहरी सांसें लें। यह क्रिया (Vagus Nerve Stimulation) को संतुलित करती है और शरीर को उठने के लिए तैयार करती है। इसके बाद शरीर में हल्की स्ट्रेचिंग करें और कुछ देर बैठकर अपनी रीढ़ व गर्दन को धीरे-धीरे हिलाएं। इससे हृदय गति और रक्तचाप स्वाभाविक रूप से स्थिर हो जाते हैं और आप पूरे दिन के लिए ऊर्जावान महसूस करते हैं।

डिजिटल तनाव से बचें और रोशनी का लें सहारा

आजकल अधिकांश लोग जागते ही सबसे पहले अपना मोबाइल फोन चेक करते हैं, जो तंत्रिका तंत्र के लिए एक बड़ा ‘डिजिटल शॉक’ साबित हो सकता है। तेज नीली रोशनी और सूचनाओं का अंबार मस्तिष्क पर अनावश्यक दबाव डालता है। इसके बजाय, यदि आप (Circadian Rhythm Alignment) के लिए खिड़की खोलकर प्राकृतिक रोशनी के संपर्क में आते हैं, तो यह मानसिक स्पष्टता को कई गुना बढ़ा देता है। यह सरल सी दिनचर्या लंबे समय में आपके हृदय स्वास्थ्य, तंत्रिका संतुलन और तनाव सहन करने की क्षमता को बेहतर बनाने में सहायक सिद्ध होती है।

प्राचीन ज्ञान और विज्ञान का अनूठा संगम

अंततः यह स्पष्ट होता है कि सुबह जागते ही तुरंत जमीन पर पैर न रखने की परंपरा केवल आस्था पर आधारित नहीं थी, बल्कि यह शरीर की जटिल जैविक प्रक्रियाओं की एक गहरी समझ थी। हमारे पूर्वजों ने चिकित्सा विज्ञान को जीवनशैली में इस तरह पिरोया था कि हम बिना सोचे-समझे भी स्वस्थ रह सकें। (Holistic Health Management) का यह प्राचीन विज्ञान आज भी आधुनिक न्यूरोलॉजी के सिद्धांतों के साथ पूरी तरह मेल खाता है। आध्यात्मिक अनुशासन और वैज्ञानिक तर्क का यह संगम हमें एक दीर्घायु और रोगमुक्त जीवन की ओर ले जाने का सबसे सटीक मार्ग दिखाता है।

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