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India strategy on board of peace gaza: दावोस से गाजा तक बोर्ड ऑफ पीस पर भारत की सतर्क कूटनीतिक रणनीति

India strategy on board of peace gaza: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावोस में जिस बोर्ड ऑफ पीस के गठन का ऐलान किया, उसने वैश्विक राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। इस बोर्ड का उद्देश्य गाजा में शांति बहाली और पुनर्निर्माण को लेकर अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना बताया गया है। प्रस्ताव के साथ कई देशों की सहमति भी सामने आई है, जिनमें आठ मुस्लिम देशों का समर्थन खास तौर पर चर्चा में है। हालांकि भारत, रूस, चीन और कई यूरोपीय देशों ने फिलहाल इससे दूरी बना रखी है। ऐसे में सवाल उठता है कि भारत इस पहल को लेकर इतना सतर्क क्यों है और उसकी रणनीति क्या है।

India strategy on board of peace gaza
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भारत की वेट एंड वॉच नीति

भारत की विदेश नीति का एक अहम पहलू रहा है कि वह किसी भी नए अंतरराष्ट्रीय मंच पर जल्दबाजी में फैसला नहीं करता। बोर्ड ऑफ पीस के मामले में भी भारत ने यही रुख अपनाया है। नई दिल्ली पहले यह देखना चाहती है कि आने वाले समय में कौन-कौन से प्रभावशाली देश इस पहल से जुड़ते हैं। अभी तक रूस और चीन जैसे बड़े वैश्विक खिलाड़ी इससे बाहर हैं। वहीं फ्रांस, इटली और ब्रिटेन जैसे यूरोपीय देशों की भी भागीदारी नहीं दिख रही है। ऐसे हालात में भारत आगे बढ़कर सदस्यता लेना जोखिम भरा मानता है।

इसके अलावा गाजा से जुड़ा मुद्दा भारत की आंतरिक राजनीति के लिहाज से भी संवेदनशील रहा है। भारत हमेशा संतुलित रुख अपनाने की कोशिश करता रहा है, ताकि किसी भी पक्ष के साथ उसके संबंध प्रभावित न हों। यही वजह है कि भारत फिलहाल इंतजार करने के मूड में है।

संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को लेकर चिंता

अब तक जिन देशों ने बोर्ड ऑफ पीस का समर्थन किया है, उनमें इजरायल, जॉर्डन, इंडोनेशिया, मिस्र, पाकिस्तान, कतर, सऊदी अरब, तुर्की और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश शामिल हैं। इनमें से अधिकतर देशों की दिलचस्पी गाजा में शांति और वहां बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण में है। इसके बावजूद यूरोपीय यूनियन के देश इस पहल से दूर हैं।

असल चिंता यह है कि कहीं यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र जैसे बहुपक्षीय संगठन की भूमिका को कमजोर न कर दे। डोनाल्ड ट्रंप पहले भी संयुक्त राष्ट्र की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा चुके हैं। उनके कुछ बयानों से यह आशंका गहराई है कि अमेरिका के नेतृत्व वाला यह मंच भविष्य में यूएन की जगह लेने की कोशिश कर सकता है। भारत सहित कई देश नहीं चाहते कि दशकों से स्थापित बहुपक्षीय व्यवस्था को किसी एक देश के प्रभाव वाले ढांचे से बदला जाए।

ट्रंप के बाद बोर्ड ऑफ पीस का भविष्य

भारत की तीसरी और शायद सबसे बड़ी चिंता बोर्ड ऑफ पीस के भविष्य को लेकर है। डोनाल्ड ट्रंप इस परियोजना के लिए काफी उत्साही नजर आते हैं, लेकिन उनका कार्यकाल सीमित है। तीन साल बाद जब वे राष्ट्रपति पद से हटेंगे, तब इस बोर्ड की दिशा और दशा क्या होगी, यह साफ नहीं है।

भारत को यह भी चिंता है कि ट्रंप की व्यक्तिगत सोच और निर्णयों पर आधारित कोई अंतरराष्ट्रीय मंच लंबे समय तक टिकाऊ नहीं हो सकता। भारत ने हमेशा स्थायी और संस्थागत वैश्विक ढांचों का समर्थन किया है, जहां निर्णय सामूहिक सहमति से लिए जाएं। ऐसे में ट्रंप की पहल पर आधारित बोर्ड ऑफ पीस को लेकर भारत पूरी तरह आश्वस्त नहीं है।

संतुलन और बहुपक्षीयवाद पर जोर

कुल मिलाकर भारत का रुख साफ है। वह गाजा में शांति और विकास के पक्ष में है, लेकिन किसी ऐसे मंच का समर्थन नहीं करना चाहता जो भविष्य में वैश्विक संतुलन को बिगाड़े। भारत संयुक्त राष्ट्र और बहुपक्षीयवाद को वैश्विक शांति का मजबूत आधार मानता है। यही कारण है कि वह फिलहाल बोर्ड ऑफ पीस से दूरी बनाए हुए है और हालात को परखने के बाद ही कोई अंतिम फैसला लेना चाहता है।

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