Hindu Rituals: हिंदू संस्कारों में अंतिम संस्कार से पहले पैर छूने की परंपरा का गहरा अर्थ
Hindu Rituals: हिंदू धर्म में मृत्यु को अंत नहीं, बल्कि आत्मा की एक नई यात्रा की शुरुआत माना जाता है। इसी सोच के साथ अंतिम संस्कार से जुड़ी हर परंपरा का अपना आध्यात्मिक और भावनात्मक महत्व है। अंतिम संस्कार से पहले मृत व्यक्ति के पैर छूना भी ऐसी ही एक परंपरा है, जिसे केवल रस्म के रूप में नहीं देखा जाता। इसके पीछे सम्मान, कृतज्ञता, आशीर्वाद और आत्मा की शांति से जुड़े गहरे भाव छिपे होते हैं। यह परंपरा परिवार के सदस्यों को भावनात्मक रूप से जोड़ती है और दिवंगत आत्मा को शांतिपूर्ण विदाई देने का माध्यम बनती है।

सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने की परंपरा
हिंदू संस्कृति में किसी के पैर छूना सर्वोच्च सम्मान का प्रतीक माना जाता है। जीवनकाल में माता-पिता, गुरु और बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लिया जाता है। मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार से पहले पैर छूना उसी सम्मान और कृतज्ञता का अंतिम रूप होता है। इस समय परिवार के सदस्य और रिश्तेदार दिवंगत व्यक्ति के जीवन भर के त्याग, प्रेम, मार्गदर्शन और योगदान के प्रति आभार व्यक्त करते हैं। यह एक भावनात्मक क्षण होता है, जब शब्दों की जगह मौन श्रद्धा ले लेती है और पैर छूकर व्यक्ति अपने मन की सारी भावनाएं प्रकट कर देता है।
अंतिम आशीर्वाद प्राप्त करने की मान्यता
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मृत्यु के समय आत्मा एक विशेष अवस्था में होती है। माना जाता है कि इस समय आत्मा सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर परमात्मा की ओर अग्रसर होती है। अंतिम संस्कार से पहले पैर छूकर परिजन दिवंगत आत्मा से अंतिम आशीर्वाद की कामना करते हैं। यह विश्वास है कि उस क्षण आत्मा के भीतर संचित अच्छे कर्मों की सकारात्मक ऊर्जा मौजूद रहती है। उस ऊर्जा से जीवन में शांति, सुरक्षा और सकारात्मकता मिलने की आशा की जाती है। यह आस्था परिवार को मानसिक संबल प्रदान करती है।
आत्मा की शांति और सद्गति की प्रार्थना
पैर छूने की यह क्रिया केवल सम्मान तक सीमित नहीं रहती, बल्कि आत्मा की शांति की प्रार्थना का भी माध्यम बनती है। इस दौरान परिवार यह भाव व्यक्त करता है कि दिवंगत व्यक्ति ने अपने सांसारिक कर्तव्यों को पूर्ण कर लिया है और अब वह बिना किसी मोह या पीड़ा के आगे की यात्रा करे। ऐसा माना जाता है कि यह अंतिम प्रणाम आत्मा को भटकाव से मुक्त करता है और सद्गति की ओर बढ़ने में सहायक होता है। इससे परिवार को भी यह संतोष मिलता है कि उन्होंने अपने स्तर पर अंतिम कर्तव्य निभा दिया है।
ऊर्जा और आध्यात्मिक जुड़ाव का विश्वास
कुछ आध्यात्मिक धारणाओं के अनुसार, मानव शरीर में पैरों को ऊर्जा का केंद्र माना गया है। जीवित अवस्था में बड़ों के पैर छूने से उनकी सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। मृत्यु के बाद भी यही भावना बनी रहती है कि दिवंगत व्यक्ति के अच्छे कर्मों और सकारात्मक प्रभाव को अंतिम बार अनुभव किया जाए। यह परंपरा व्यक्ति को जीवन की नश्वरता का बोध कराती है और यह सिखाती है कि सम्मान और प्रेम मृत्यु के बाद भी समाप्त नहीं होते।
भावनात्मक विदाई और पारिवारिक एकता
अंतिम संस्कार से पहले पैर छूना भावनात्मक विदाई का सबसे गहरा प्रतीक माना जाता है। इस क्षण पूरा परिवार एक साथ आता है और अपने प्रिय सदस्य को अंतिम प्रणाम करता है। यह प्रक्रिया परिवार के बीच आपसी जुड़ाव और एकता को मजबूत करती है। आंसुओं और मौन के बीच किया गया यह अंतिम सम्मान मन को हल्का करता है और शोक की प्रक्रिया को स्वीकारने में मदद करता है।
परंपरा का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी हिंदू समाज में इसका पालन किया जाता है। बदलते समय के बावजूद यह संस्कार लोगों को अपनी जड़ों से जोड़े रखता है। यह केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं का भी प्रतीक है, जो जीवन और मृत्यु के बीच के संबंध को समझने में मदद करता है।
हिंदू धर्म में अंतिम संस्कार से पहले मृत व्यक्ति के पैर छूना सम्मान, कृतज्ञता, आशीर्वाद और आत्मा की शांति का संगम है। यह परंपरा हमें यह याद दिलाती है कि जीवन में रिश्तों का महत्व अंत तक बना रहता है और प्रेम व सम्मान ही सबसे बड़ा संस्कार है।



