Bihar Teacher Bridge Course News: 2018 से पहले वाले बीएड शिक्षकों पर भी गिरी गाज, विभाग के एक पत्र से मचा हड़कंप
Bihar Teacher Bridge Course News: बिहार के शिक्षा विभाग में इन दिनों अफरा-तफरी का माहौल है, क्योंकि साल 2018 से पहले बहाल हुए बीएड शिक्षकों की फाइलें दोबारा खुलने लगी हैं। मुजफ्फरपुर समेत राज्य के विभिन्न जिलों में उन शिक्षकों की जांच शुरू कर दी गई है जो बिना किसी (specialized training) या अनिवार्य ब्रिज कोर्स के प्राथमिक विद्यालयों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के सख्त रुख के बाद अब विभाग यह सुनिश्चित करने में जुटा है कि केवल योग्य और प्रशिक्षित शिक्षक ही क्लासरूम में बच्चों को पढ़ाएं।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश से खुली सिस्टम की पोल
यह पूरा मामला तब प्रकाश में आया जब सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने निर्देश के आलोक में प्राइमरी स्कूलों में नियुक्त बीएड धारी शिक्षकों की सूची तैयार की जाने लगी। अदालत ने स्पष्ट किया था कि प्राथमिक कक्षाओं में बीएड डिग्री के आधार पर बहाल शिक्षकों को अपनी सेवा मान्य रखने के लिए (mandatory bridge course) करना अनिवार्य होगा। विभाग की ओर से साल 2018 से 2023 के बीच बहाल शिक्षकों का ब्यौरा मांगा गया था, लेकिन जिलों ने पुरानी सूचियों को भी इसमें शामिल कर दिया, जिससे पूरी प्रक्रिया संदिग्ध हो गई है।
एनआईओएस को भेजी गई सूची में मिली बड़ी गड़बड़ी
जिलों के शिक्षा कार्यालयों ने साल 2018 से पहले नियुक्त हुए शिक्षकों का डाटा भी एनआईओएस को भेज दिया है, जिसमें भारी तकनीकी और प्रशासनिक खामियां पाई गई हैं। विभागीय सूत्रों के मुताबिक, हर जिले में बीएड डिग्री पर बहाल ऐसे शिक्षकों की संख्या सैकड़ों में है जो (legal compliance) के दायरे में सही तरीके से फिट नहीं बैठ रहे हैं। सूची में हुई इस बड़ी हेराफेरी ने अब एनआईओएस और शिक्षा विभाग के बीच पत्राचार को तेज कर दिया है, जिससे शिक्षकों के बीच नौकरी जाने का डर पैदा हो गया है।
डीईओ के जवाब से तय होगा शिक्षकों का भविष्य
प्राथमिक शिक्षा निदेशक विक्रम विरकर ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए मुजफ्फरपुर समेत कई जिलों के जिला शिक्षा अधिकारियों (DEO) से लिखित स्पष्टीकरण मांगा है। विभाग जानना चाहता है कि जब सुप्रीम कोर्ट के निर्देश (judicial guidelines) के अनुसार केवल 2018 से 2023 के बीच के शिक्षक ही कोर्स के लिए पात्र थे, तो उससे पहले के शिक्षकों का डाटा सूची में क्यों डाला गया? इस लापरवाही के पीछे कौन जिम्मेदार है, इसकी तहकीकात अब तेज कर दी गई है।
पुरानी नियुक्तियों और ब्रिज कोर्स का पेंच
विधान पार्षद वंशीधर व्रजवासी ने इस मुद्दे पर टिप्पणी करते हुए कहा कि साल 2018 से पहले नियुक्त हुए कई बीएड शिक्षकों को 2019 में ही प्रशिक्षण दिला दिया गया था। हालांकि, कई कारणों से एक बड़ी संख्या में शिक्षक उस वक्त (professional certification) या ब्रिज कोर्स को पूरा नहीं कर पाए थे। अब उन छूटे हुए शिक्षकों की सूची को वर्तमान बहाली के डाटा के साथ मिक्स करना न केवल नियमों के विरुद्ध है, बल्कि यह विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवालिया निशान खड़ा करता है।
डाटा एंट्री में भारी लापरवाही ने बढ़ाई मुश्किलें
शिक्षा विभाग ने जिलों से मिली रिपोर्ट को पूरी तरह से खारिज करते हुए कहा है कि उपलब्ध कराया गया डाटा देखने लायक भी नहीं है। अधिकारियों ने सवाल उठाया है कि शिक्षकों के डाटा की भौतिक प्रति एक्सेल फॉर्मेट में (technical documentation) के नियमों के तहत क्यों उपलब्ध नहीं कराई गई? इसके अलावा, जो परफॉर्मा विभाग द्वारा तय किया गया था, जिलों ने उसे पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया, जिससे शिक्षकों की व्यक्तिगत जानकारी और उनकी नियुक्ति तिथि को लेकर भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है।
अयोग्य शिक्षकों की छंटनी की तैयारी में सरकार
विभाग ने स्पष्ट किया है कि 28 जून 2018 से 11 अगस्त 2023 के बीच नियुक्त बीएड डिग्री धारक ही इस ब्रिज कोर्स के लिए पात्र माने जाएंगे। सरकार का मानना है कि (primary education standards) को बनाए रखने के लिए यह कोर्स करना आवश्यक है और जो शिक्षक इसे पूरा नहीं करेंगे, उनकी सेवा को अवैध घोषित किया जा सकता है। जिलों को निर्देश दिया गया है कि वे तुरंत त्रुटिहीन डाटा उपलब्ध कराएं ताकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का शत-प्रतिशत पालन सुनिश्चित किया जा सके।
शिक्षकों के बीच बढ़ता आक्रोश और अनिश्चितता
इस जांच और नोटिस के दौर ने बिहार के हजारों शिक्षकों की रातों की नींद उड़ा दी है। विशेषकर मुजफ्फरपुर जिले से सबसे अधिक आवेदन आने के कारण वहां के शिक्षक (career stability) को लेकर काफी चिंतित नजर आ रहे हैं। शिक्षकों का कहना है कि विभाग की आंतरिक गलतियों और डाटा मैनेजमेंट की कमी के कारण उनकी वर्षों की मेहनत और सेवा पर खतरा मंडरा रहा है, जबकि इसमें उनकी कोई प्रत्यक्ष गलती नहीं है।



