Darbhanga Raj Family History and Contribution: महारानी कामसुंदरी देवी के निधन से शोक में डूबा दरभंगा राज, चीन युद्ध में 600 किलो सोना दान करने वाले परिवार की थीं अंतिम स्तंभ…
Darbhanga Raj Family History and Contribution: बिहार के मिथिलांचल की सांस्कृतिक धरोहर और दरभंगा राज की गरिमा को अपने व्यक्तित्व में समेटे हुए महारानी अधिरानी कामसुंदरी देवी का निधन एक युग के अंत जैसा है। वह दरभंगा राज के अंतिम महाराजा कामेश्वर सिंह की तीसरी पत्नी और राज परिवार की (Darbhanga Royal Family Legacy) मर्यादाओं की अंतिम संरक्षक थीं। उनके निधन से न केवल राज परिवार, बल्कि संपूर्ण बिहार ने एक ऐसी विभूति को खो दिया है जो सादगी, सौम्यता और त्याग की प्रतिमूर्ति थीं। महारानी का संपूर्ण जीवन राजसी वैभव के बीच रहते हुए भी मानवीय मूल्यों और लोक कल्याण के प्रति समर्पित रहा।

चीन युद्ध में जब दरभंगा राज ने दिया 600 किलो सोना
देश पर जब-जब संकट आया, दरभंगा राज ने अपना खजाना राष्ट्र रक्षा के लिए खोल दिया। इतिहासकार बताते हैं कि 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान इस राज परिवार ने (National Defense Contribution) अद्भुत मिसाल पेश की थी। दरभंगा के इंद्र भवन मैदान में करीब 15 मन यानी 600 किलो सोना तौलकर केंद्र सरकार को दान दिया गया था। केवल सोना ही नहीं, बल्कि राज परिवार ने अपने तीन निजी विमान और 90 एकड़ में फैला एयरपोर्ट भी देश को सौंप दिया था, जिस पर आज का आधुनिक दरभंगा एयरपोर्ट संचालित हो रहा है।
शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्र में अभूतपूर्व दानवीरता
दरभंगा राज केवल अपनी संपत्ति के लिए ही नहीं, बल्कि विद्या के प्रति अपने अनुराग के लिए भी जाना जाता है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के निर्माण के लिए उस दौर में राज परिवार ने (Educational Philanthropy in Bihar) 50 लाख रुपये की भारी-भरकम राशि दान की थी। इतना ही नहीं, प्राचीन संस्कृत विद्या के संरक्षण के लिए अपना भव्य आवासीय परिसर दान कर कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना कराई। वैज्ञानिक प्रगति के प्रति उनका लगाव ऐसा था कि नोबेल विजेता वैज्ञानिक डॉ. सी.वी. रमण को शोध के लिए उन्होंने एक बहुमूल्य हीरा उपहार स्वरूप प्रदान किया था।
विश्व रिकॉर्ड बनाने वाली निजी रेल लाइन का इतिहास
दरभंगा राज ने बुनियादी ढांचे के विकास में भी विश्व स्तर पर कीर्तिमान स्थापित किए थे। साल 1874 में वाजितपुर से नरगौना टर्मिनल तक (Historical Railway Connectivity) मात्र 62 दिनों में 55 मील लंबी रेल लाइन बिछाकर विश्व रिकॉर्ड बनाया गया था। यह देश का वह गौरवशाली रेलमार्ग था, जहां पहली बार तीसरे दर्जे के डिब्बों में शौचालय की सुविधा शुरू की गई थी। इस रेलखंड ने न केवल व्यापार को बढ़ावा दिया, बल्कि मिथिला के लोगों को रोजगार के लिए पलायन करने से भी बचाया।
जब महाराजा ने अपनी गारंटी पर बापू को बुलाया दरभंगा
महात्मा गांधी और दरभंगा राज के बीच का संबंध इतिहास के पन्नों में विशेष स्थान रखता है। 1934 के भूकंप के बाद जब जिला प्रशासन ने सुरक्षा कारणों से बापू को (Mahatma Gandhi Darbhanga Visit) दरभंगा आने से रोक दिया था, तब महाराजा कामेश्वर सिंह ने अपनी व्यक्तिगत गारंटी पर उन्हें आमंत्रित किया। गांधीजी की सुरक्षा का जिम्मा महाराजा ने स्वयं संभाला और उन्हें विशेष ट्रेन से नरगौना टर्मिनल लाया गया। इसी टर्मिनल पर नेहरू से लेकर देश-विदेश के कई दिग्गज राजनेता और विद्वान अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं।
महारानी कामसुंदरी देवी: त्याग और सादगी की मूरत
मधुबनी के मंगरौनी में जन्मी कल्याणी (विवाह उपरांत कामसुंदरी देवी) का व्यक्तित्व राजसी होते हुए भी अत्यंत सरल था। राज परिवार की परंपरा के अनुसार (Royal Traditions of Mithila) उन्हें तीसरी रानी के रूप में ‘कामा’ की उपाधि दी गई थी। अपने पोते कुमार कपिलेश्वर सिंह और परिवार के सदस्यों के बीच वह एक ऐसी मार्गदर्शक थीं, जिन्होंने जीवनभर अनुशासन और मानवीय मूल्यों को सर्वोपरि रखा। उनके निधन पर बिहार सरकार के मंत्रियों से लेकर विद्वानों तक ने उन्हें मिथिला की ‘मौन चेतना’ के रूप में याद किया है।
बिहार के सबसे बड़े धार्मिक ट्रस्ट की थीं अंतिम जीवित ट्रस्टी
महारानी कामसुंदरी देवी बिहार के सबसे बड़े न्यास ‘कामेश्वर सिंह रिलीजियस ट्रस्ट’ की अंतिम जीवित ट्रस्टी थीं। वर्तमान में इस (Religious Trust Assets India) ट्रस्ट के पास लगभग एक लाख एकड़ जमीन, दो हजार करोड़ का सोना और देश-विदेश में 108 मंदिर हैं। आश्चर्यजनक रूप से इस ट्रस्ट द्वारा संचालित एक मंदिर आज भी पाकिस्तान में मौजूद है। ट्रस्ट की इस विशाल संपत्ति की देखभाल अब नए ट्रस्टी करेंगे, लेकिन महारानी की देखरेख में जिस तरह इन संपत्तियों का प्रबंधन हुआ, वह बेमिसाल है।
10 हजार करोड़ की संपत्ति और परोपकार का विजन
वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, दरभंगा राज परिवार के पास 10 हजार करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति है, जिसमें ट्रस्ट और निजी संपत्तियां दोनों शामिल हैं। महारानी ने अपने पति की याद में (Kameshwar Singh Kalyani Foundation) फाउंडेशन की स्थापना की थी, जिसके माध्यम से कमजोर वर्गों के लिए स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में अनगिनत कार्य किए गए। उनके निधन से दरभंगा के मोती महल और नरगौना पैलेस में जो शून्य पैदा हुआ है, उसे कभी भरा नहीं जा सकेगा, लेकिन उनकी दानवीरता की कहानियां हमेशा स्वर्ण अक्षरों में चमकती रहेंगी।



