India-US Trade – नई वैश्विक साझेदारियों से भारत की व्यापारिक रणनीति बदली
India-US Trade – पिछले लगभग बारह महीनों में भारत की विदेश व्यापार नीति जिस तेजी से बदली है, वह केवल नीतिगत संशोधन नहीं बल्कि सोच में आया एक बड़ा बदलाव है। वर्षों तक ठहरे रहे मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) को नई गति मिली है और ये अब महज कागजी चर्चा से निकलकर वास्तविक आर्थिक साझेदारी में बदलते दिख रहे हैं। ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के साथ लंबी चली वार्ताओं में जहां पहले ठहराव नजर आता था, वहीं हाल के महीनों में स्पष्ट प्रगति दिखी। इसी बीच भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संवाद भी नए सिरे से सक्रिय हुआ, जिससे वैश्विक व्यापार के समीकरणों में भारत की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण बनती जा रही है।

अमेरिका के साथ बदलता समीकरण
भारत और अमेरिका के आर्थिक संबंध ऐतिहासिक रूप से मजबूत रहे हैं, लेकिन हाल के वर्षों में कुछ संवेदनशील मुद्दों ने रिश्तों में तनाव भी पैदा किया। रूस से कच्चे तेल की खरीद को लेकर अमेरिकी रुख और कुछ सुरक्षा संबंधी आरोपों के कारण असहजता दिखी। इस बीच भारत को 25 प्रतिशत तक के सेकेंडरी टैरिफ का भी सामना करना पड़ा, जिससे व्यापारिक समझौते की संभावना कमजोर लगने लगी थी। फिर भी दोनों देशों के बीच बातचीत पूरी तरह बंद नहीं हुई और आर्थिक सहयोग की आवश्यकता बनी रही।
कूटनीति और वार्ता का परदे के पीछे का खेल
सरकारी सूत्रों के अनुसार, राजनीतिक स्तर पर संवाद जारी रहा और तकनीकी टीमों ने भी अपने प्रयास नहीं छोड़े। प्रधानमंत्री और अमेरिकी राष्ट्रपति के बीच प्रत्यक्ष संपर्क बना रहा, जबकि वाणिज्य और विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी लगातार वाशिंगटन के साथ बातचीत करते रहे। विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिकी प्रशासन के भीतर मौजूद अनुभवी व्यापार वार्ताकारों ने भी भरोसे की कमी को दूर करने में अहम भूमिका निभाई। इसी निरंतर संवाद ने दोनों देशों को मतभेदों के बावजूद साझा आधार तलाशने में मदद की।
यूरोपीय संघ की बदली हुई सोच
दिलचस्प यह रहा कि भारत-अमेरिका के बढ़ते तालमेल ने यूरोपीय संघ की रणनीति को भी प्रभावित किया। ब्रुसेल्स में पहले जहां व्यापारिक शर्तों पर कठोर रुख दिखता था, वहीं हाल के घटनाक्रमों ने उसे अधिक लचीला बनाया। इसका परिणाम यह हुआ कि 27 जनवरी को भारत और यूरोपीय संघ के बीच लंबे समय से अटके समझौते पर सहमति बनी। इससे पहले मई की शुरुआत में भारत और ब्रिटेन ने भी अपने व्यापार समझौते को अंतिम रूप दे दिया था, जो दोनों देशों के लिए नया आर्थिक अध्याय माना जा रहा है।
द्विपक्षीय रास्ते पर भारत
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में विश्व व्यापार संगठन (WTO) की भूमिका कमजोर पड़ती दिख रही है और बहुपक्षीय सुधारों की उम्मीद धुंधली है। ऐसे में भारत ने व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए द्विपक्षीय समझौतों पर जोर बढ़ाया है। पिछले एक साल में भारतीय वार्ताकारों ने कई देशों और व्यापारिक समूहों से लगातार बैठकें कीं। अब भारत की प्राथमिकता सूची में केवल बड़े देश ही नहीं, बल्कि न्यूजीलैंड, इजराइल और मर्कोसुर जैसे व्यापारिक ब्लॉक भी शामिल हो चुके हैं।
अर्थव्यवस्था पर संभावित प्रभाव
नए समझौतों का दायरा सिर्फ वस्तुओं तक सीमित नहीं है। इसमें सेवाएं, बौद्धिक संपदा अधिकार, श्रम मानक, छोटे और मझोले उद्यम तथा पर्यावरणीय स्थिरता जैसे विषय भी शामिल किए जा रहे हैं। अनुमान है कि भारत का लगभग दो-तिहाई निर्यात अब प्रमुख मुक्त व्यापार समझौतों के दायरे में आ जाएगा, जबकि देश के करीब आधे आयात भी इन्हीं ढांचों के तहत संचालित होंगे। कृषि उत्पाद, ऑटोमोबाइल, वाइन और स्पिरिट जैसे क्षेत्रों में नए अवसर खुलने की उम्मीद है, जिससे उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प मिल सकते हैं और उद्योगों को नई बाजार पहुंच।
आगे की दिशा
वाशिंगटन में भारतीय दूतावास और वाणिज्य मंत्रालय के अधिकारियों ने तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद वार्ता प्रक्रिया को जीवित रखा, जो भारत की बढ़ती कूटनीतिक परिपक्वता को दर्शाता है। भारत ने यह संदेश दिया है कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक हितों से समझौता किए बिना भी वैश्विक अर्थव्यवस्था में जिम्मेदार साझेदार बन सकता है। आने वाले वर्षों में ये समझौते भारतीय विनिर्माण को मजबूत करने, निर्यात बढ़ाने और मेक इन इंडिया पहल को नई गति देने में सहायक हो सकते हैं।



