IndiaUSTradeDeal – भारत और अमेरिका के बीच नई व्यापार समझौते की निर्णायक रूपरेखा तय
IndiaUSTradeDeal – भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच लंबे समय से चर्चा में रही व्यापार वार्ता ने आखिरकार ठोस आकार ले लिया है। सोमवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हुई टेलीफोनिक बातचीत के बाद दोनों देशों ने नए ट्रेड फ्रेमवर्क पर सहमति की औपचारिक घोषणा की। इस समझौते के तहत भारत पर लगाए गए अमेरिकी आयात शुल्क में उल्लेखनीय कटौती की गई है—जो पहले 50 प्रतिशत तक था, अब घटकर 18 प्रतिशत रह गया है। ट्रंप प्रशासन ने संकेत दिया है कि यह बदलाव भारत द्वारा रूस से कच्चे तेल की खरीद में तेज कमी लाने की प्रतिबद्धता से जुड़ा हुआ है, हालांकि नई दिल्ली की ओर से इस दावे पर अभी कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है।

बदलते समीकरणों के बीच संतुलन की कोशिश
भारत की विदेश और व्यापार नीति लंबे समय से बहुध्रुवीय दृष्टिकोण पर आधारित रही है, जिसमें किसी एक देश पर निर्भर रहने के बजाय विविध साझेदारियों को प्राथमिकता दी जाती है। रूस दशकों से रक्षा और ऊर्जा क्षेत्र में भारत का भरोसेमंद भागीदार रहा है। 2019 से 2023 के बीच भारत के कुल हथियार आयात का लगभग 36 प्रतिशत रूस से आया, जो दोनों देशों के सामरिक संबंधों की गहराई को दर्शाता है। साथ ही, पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद रूस ने भारत को रियायती दरों पर तेल उपलब्ध कराया, जिससे घरेलू ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती मिली और आयात लागत पर दबाव कम हुआ। वित्त वर्ष 2024-25 में दोनों देशों के बीच व्यापार का आकार 131 अरब डॉलर तक पहुंचना इस बढ़ते आर्थिक जुड़ाव का प्रमाण माना गया।
ऊर्जा निर्भरता और रणनीतिक बाध्यताएं
भारत अपनी कुल तेल जरूरत का करीब 88 प्रतिशत आयात के जरिए पूरा करता है, इसलिए ऊर्जा आपूर्ति उसके लिए केवल आर्थिक नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का भी सवाल है। 2024-25 में देश के कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 35 प्रतिशत रूस से आया। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों द्वारा मॉस्को पर लगाए गए प्रतिबंधों के बीच भारत ने सस्ता तेल खरीदकर घरेलू उपभोक्ताओं को राहत देने की नीति अपनाई। वॉशिंगटन ने कई मौकों पर नई दिल्ली से रूस पर निर्भरता घटाने का आग्रह किया, लेकिन भारत ने हमेशा अपने राष्ट्रीय हितों और आम जनता के कल्याण का हवाला दिया।
अमेरिकी बाजार और घरेलू अर्थव्यवस्था का गणित
दूसरी ओर, अमेरिका भारत के लिए सबसे बड़े निर्यात गंतव्यों में से एक है। ऊंचे टैरिफ के चलते भारतीय वस्तुओं की प्रतिस्पर्धात्मकता कमजोर पड़ रही थी, जिससे निर्यात में गिरावट और रोजगार पर दबाव बढ़ रहा था। 50 प्रतिशत शुल्क के कारण भारतीय निर्यात लगभग 30 अरब डॉलर तक सिमटने लगा था, जिससे वस्त्र, इंजीनियरिंग और आईटी सेवाओं जैसे क्षेत्रों में अनिश्चितता पैदा हो रही थी। ऐसे में टैरिफ में कटौती को भारतीय उद्योग जगत ने राहत भरी खबर के रूप में देखा है। विश्लेषकों के अनुसार, यह समझौता केवल व्यापार नहीं बल्कि व्यापक आर्थिक स्थिरता से भी जुड़ा हुआ है।
संकट के समय रूस का साथ
भारत की आजादी के बाद से ही रूस वैश्विक मंच पर एक भरोसेमंद साझेदार रहा है। 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान जब अमेरिका ने पाकिस्तान के समर्थन में हिंद महासागर में अपना सातवां बेड़ा भेजा, तब सोवियत संघ ने संयुक्त राष्ट्र में भारत का पक्ष लिया था। इसी तरह, 1998 में भारत के परमाणु परीक्षण के बाद भी भारी अमेरिकी दबाव के बावजूद रूस ने रक्षा सहयोग जारी रखा। यह इतिहास दोनों देशों के बीच गहरे रणनीतिक भरोसे को दर्शाता है।
भविष्य की दिशा और संतुलित कूटनीति
भारत ने हमेशा गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाई है और आज के बहुध्रुवीय विश्व में भी वह संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रहा है। रूस से तेल आयात में संभावित कमी का अर्थ यह नहीं निकाला जा सकता कि दोनों देशों के संबंध कमजोर पड़ेंगे, क्योंकि रक्षा और विज्ञान जैसे क्षेत्रों में साझेदारी बनी हुई है। दरअसल, भारत ने 2018 के बाद ही रूस से बड़े पैमाने पर तेल खरीदना शुरू किया था और 2022 के बाद इसमें तेज बढ़ोतरी हुई। इसलिए इसे दीर्घकालिक रणनीतिक बदलाव के बजाय परिस्थितिजन्य निर्णय के रूप में देखा जा रहा है।
कुल मिलाकर, यह नया भारत-अमेरिका व्यापार समझौता आर्थिक जरूरतों, भू-राजनीतिक दबावों और कूटनीतिक संतुलन के जटिल मेल का परिणाम माना जा रहा है। आने वाले महीनों में इसके वास्तविक प्रभाव निर्यात, ऊर्जा आयात और रणनीतिक साझेदारियों पर स्पष्ट रूप से दिखाई देंगे।



