ClassicCinema – ‘पड़ोसन’ के इस लोकप्रिय गीत के पीछे थी राजेंद्र कृष्ण की यादगार लेखनी
ClassicCinema – 1968 में रिलीज हुई फिल्म पड़ोसन आज भी हिंदी सिनेमा की सबसे पसंदीदा कॉमेडी फिल्मों में गिनी जाती है। सुनील दत्त, सायरा बानो, महमूद और किशोर कुमार जैसे कलाकारों से सजी इस फिल्म ने अपनी कहानी के साथ-साथ संगीत के दम पर भी दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाई। फिल्म का मशहूर गीत ‘मेरे सामने वाली खिड़की में एक चांद का टुकड़ा रहता है’ आज भी उतना ही लोकप्रिय है और नई पीढ़ी के बीच भी लगातार पसंद किया जाता है।

यादगार गीत के पीछे था राजेंद्र कृष्ण का योगदान
फिल्म में यह गीत उस दृश्य पर आधारित है, जब भोला अपनी पड़ोसन बिंदु को प्रभावित करने की कोशिश करता है। इस दौरान वह अपने गुरु की मदद से यह गीत प्रस्तुत करता है, जबकि पर्दे पर लिप-सिंक सुनील दत्त करते दिखाई देते हैं। इस गीत को किशोर कुमार की आवाज़ ने अलग पहचान दी, वहीं इसका संगीत आर.डी. बर्मन ने तैयार किया। इसके भावपूर्ण बोल वरिष्ठ गीतकार राजेंद्र कृष्ण ने लिखे थे, जिनकी लेखनी हिंदी फिल्म संगीत की अमूल्य धरोहर मानी जाती है।
फिल्म के सभी गीत बने थे लोकप्रिय
पड़ोसन के संगीत एल्बम में कुल सात गीत शामिल थे और लगभग हर गीत ने दर्शकों के बीच अलग पहचान बनाई। किशोर कुमार, मन्ना डे, लता मंगेशकर और आशा भोसले जैसे दिग्गज गायकों ने अपनी आवाज़ दी थी। ‘एक चतुर नार’, ‘कहना है आज तुमसे’, ‘मैं चली मैं चली’ और ‘मेरे सामने वाली खिड़की में’ जैसे गीत आज भी रेडियो, संगीत मंचों और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अक्सर सुनाई देते हैं। इन सभी गीतों के बोल राजेंद्र कृष्ण ने लिखे थे, जिन्होंने अपने शब्दों से फिल्म के संगीत को यादगार बना दिया।
कई कालजयी गीतों के रचयिता रहे राजेंद्र कृष्ण
राजेंद्र कृष्ण ने अपने लंबे फिल्मी सफर में हिंदी सिनेमा को अनेक लोकप्रिय गीत दिए। उनके लिखे गीत ‘तुम्हीं मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा’ के लिए उन्हें 1965 में फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इसके अलावा ‘इतना न तू मुझसे प्यार बढ़ा’, ‘सैंया दिल में आना रे’ और ‘पल पल दिल के पास’ जैसे चर्चित गीत भी उनकी रचनात्मक पहचान का हिस्सा माने जाते हैं। उनकी लेखनी ने कई दशकों तक हिंदी फिल्म संगीत को समृद्ध किया।
1968 की सफल फिल्मों में शामिल रही ‘पड़ोसन’
रिलीज के समय पड़ोसन बॉक्स ऑफिस पर भी बड़ी सफलता साबित हुई थी। वर्ष 1968 की सबसे अधिक कमाई करने वाली फिल्मों की सूची में इसे दूसरा स्थान मिला था। उस वर्ष धर्मेंद्र और माला सिन्हा अभिनीत आंखें पहले स्थान पर रही, जबकि नीलकमल, कन्यादान और शिकार भी प्रमुख सफल फिल्मों में शामिल थीं। दिलचस्प तथ्य यह है कि फिल्म के निर्माता महमूद थे, लेकिन उन्होंने अपने लिए अपेक्षाकृत छोटा किरदार चुना। गुरु के रूप में उनकी हास्य प्रस्तुति फिल्म की सबसे यादगार विशेषताओं में गिनी जाती है और आज भी दर्शकों को उतनी ही पसंद आती है।